भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
खण्ड दो
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक
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भूमिका
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक को हिन्दी पाठकों के हाथों में देते हुए हमें मिश्रित
अनुभूति हो रही है। इतिहास की इस अनमोल धरोहर को आप तक पहुँचाकर हम
गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं, पर साथ ही इसमें हुई देरी की कचोट भी है।
भारतीय इतिहास के इस दुर्लभ दस्तावेज़ का महत्त्व सिर्फ़ इसकी ऐतिहासिकता
में ही नहीं है। भगतसिंह के अधूरे सपने को पूरा करने वाली भारतीय क्रान्ति आज
एक ऐसे पड़ाव पर है जहाँ से नये, प्रचण्ड वेग से आगे बढ़ने के लिए इसके
सिपाहियों को 'इन्क़लाब की तलवार को विचारों की सान पर' नयी धार देनी है।
यह नोटबुक उन सबके लिए विचारों की रोशनी से दमकता एक प्रेरणापुंज है जो
इस विरासत को आगे बढ़ाने का जज़्बा रखते हैं।
आज जब भारतीय क्रान्ति सामने उपस्थित सवालों-चुनौतियों से जूझ रही है,
युवा क्रान्तिकारियों की नयी पीढ़ी के कन्धों पर रास्ता निकालने और उस पर बढ़ने
का कार्यभार है तथा एक नये सर्वहारा नवजागरण और प्रबोधन का काम इतिहास
के एजेण्डे पर है, तो इस नोटबुक को पढ़ते हुए हमारी आँखों के सामने बार-बार
उस नौजवान की छवि उभरती है जो फाँसी के फन्दे के साये में बैठकर भारतीय
इन्क़लाब के रास्ते की सही समझ हासिल करने और उसे लोगों तक पहुँचाने के
लिए आख़िरी पल तक अध्ययन-मनन और लेखन में जुटा रहा।
जेल में भगतसिंह ने चार पुस्तकें लिखी थीं। हो सकता है ये नोट्स इन पुस्तकों
की तैयारी में लिये गये हों। चारों पाण्डुलिपियाँ आज नष्ट हो चुकी हैं। लेकिन आज
भी उनके बारे में न तो कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध है और न ही किसी ने
भारतीय इतिहास के इस अँधेरे पक्ष पर शोध करने की ज़रूरत समझी है।
नोट बुक के महान ऐतिहासिक महत्त्व और आज इसकी विशेष प्रासंगिकता को
रेखांकित करने के लिए हमने आलोक रंजन और एल. वी. मित्रोखिन के दो लेख
भी शामिल किये हैं। हम चाहेंगे कि आप नोटबुक से पहले इन लेखों को अवश्य
पढ़ें। नोटबुक को सही परिप्रेक्ष्य और पृष्ठभूमि में समझने में इन लेखों से काफ़ी
मदद मिलेगी। भारत के क्रान्तिकारी आन्दोलन के वैचारिक विकास पर हमने
भगतसिंह के साथी शिववर्मा का विस्तृत लेख भी शामिल किया है।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 547
नोटबुक की प्रस्तुति के बारे में कुछ बातें
हमारी इच्छा थी कि जहाँ तक सम्भव हो हस्तलिखित नोटबुक की मूल
शक्ल बनी रहे, भगतसिंह ने जिस तरीक़े से नोट्स लिये हैं उन्हें लगभग उसी ढंग
से प्रस्तुत किया जाये। लेकिन किताब की शक्ल में प्रस्तुत करने के लिए कुछ
बदलाव करने पड़े हैं।
पूरी नोटबुक भगतसिंह के छोटे अक्षरों वाली लिखावट में लिखी गयी है।
ज़्यादातर नोट्स के भगतसिंह ने छोटे पर सटीक और सारगर्भित शीर्षक दिये हैं।
अनेक शीर्षक हाशिये पर भी दिये गये हैं। कहीं-कहीं कुछ महत्त्वपूर्ण वाक्यों या
वाक्यांशों को भी हाशिये में लिखा गया है।
— हमने सभी शीर्षकों तथा हाशिये पर अंकित वाक्यों को टेक्स्ट के साथ
ही रखा है पर भगतसिंह द्वारा दिये गये महत्त्व के अनुसार उन्हें छोटे या बड़े अक्षरों
में दिया गया है।
— भगतसिंह द्वारा रेखांकित किये गये हिस्सों को मोटे अक्षरों में दिया गया
है।
— भगतसिंह ने कई जगहों पर कुछ हिस्सों पर अतिरिक्त बल देने के लिए
बायीं ओर खड़ी लकीर खींची है। इसे पुस्तक में ऐसे ही दिखाया गया है।
नोटबुक में आये अधिकांश सन्दर्भों की जानकारी हमने पाठकों को देने की
कोशिश की है, फिर भी कुछ सन्दर्भ अज्ञात रह गये हैं। पाठकों से अनुरोध है कि
यदि उन्हें इस बारे में जानकारी हो तो हमें बतायें। इस सम्बन्ध में हमें श्री भूपेन्द्र
हूजा के सम्पादन में ‘इण्डियन बुक क्रॉनिकल’ द्वारा सर्वप्रथम अंग्रेज़ी में प्रकाशित
A Martyr's Notebook से काफ़ी मदद मिली जिसके लिए हम उनका आभार
व्यक्त करते हैं।
सत्यम
नई दिल्ली
548 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
प्रस्तावना
भगतसिंह की जेल नोटबुक
जो शहादत के तिरसठ वर्षों बाद छप सकी
आलोक रंजन
रूसी विद्वान एल.वी. मित्रोखिन वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 1981 में प्रकाशित
अपनी पुस्तक 'Lenin and India' में पहली बार, एक अलग अध्याय में, भगतसिंह
की दुर्लभ जेल नोटबुक से विस्तृत हवाले देते हुए उनके द्वारा अन्तिम दिनों में किये
गये क्रान्तिकारी और मार्क्सवादी साहित्य के गहन अध्ययन पर प्रकाश डाला था
और उन योजक-सूत्रों को संयोजित करने की कोशिश की थी, जो भगतसिंह के
चिन्तन के संघटक अवयव थे।
भगतसिंह और उनके साथियों ने 1928 में ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट
रिपब्लिकन एसोसिएशन' की स्थापना के समय ही समाजवाद को लक्ष्य और
सिद्धान्त के रूप में स्वीकार कर लिया था, पर कमोबेश 1929 के मध्य तक
समाजवाद और मार्क्सवाद के प्रति उनका लगाव भावात्मक ही था, बुद्धिसंगत नहीं।
भगतसिंह के सहयोगी क्रान्तिकारी शिववर्मा सहित अनेक इतिहासकारों ने इस बात
का उल्लेख किया है कि 1929 में गिरफ़्तारी के बाद एच.एस.आर.ए. के युवा
क्रान्तिकारियों के एक धड़े ने, और विशेषकर भगतसिंह ने जेल में बड़ी मुश्किलों
से जुटाकर, क्रान्तिकारी साहित्य और मार्क्सवाद का गहन अध्ययन और उस पर
विचार-विमर्श किया। इसके परिणामस्वरूप वे अराजकतावादी और मध्यवर्गीय
दुस्साहसवाद को छोड़कर तेज़ी से सर्वहारा क्रान्ति के मार्क्सवादी सिद्धान्तों को
अपनाने की दिशा में आगे बढ़े। वैयक्तिक शौर्य एवं बलिदान से जनता को जगाने
और आतंकवादी रणनीति द्वारा उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष का रास्ता छोड़कर
उन्होंने अपने अतीत की आलोचना व समाहार किया तथा इस बात पर बल दिया
कि क्रान्ति की मुख्य शक्ति मज़दूर और किसान हैं, साम्राज्यवाद को केवल सर्वहारा
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 549
क्रान्ति द्वारा ही शिकस्त दी जा सकती है, मुख्यतः पेशेवर क्रान्तिकारियों पर
आधारित सर्वहारा वर्ग की क्रान्तिकारी पार्टी के मार्गदर्शन में व्यापक मेहनतकश
जनता व मध्यवर्ग के जनसंगठन खड़ा करके जनान्दोलन का मार्ग अपनाया जाना
चाहिए और यह कि, इसके बाद ही सशस्त्र क्रान्ति द्वारा सत्ता पलटकर सर्वहारा
अधिनायकत्व की स्थापना की जा सकती है। एच.एस.आर.ए. के सिद्धान्तकारों में
भगतसिंह सर्वोपरि थे और उनकी पूरी विचार-यात्रा को 1929 से मार्च 1931 तक
(यानी फाँसी चढ़ने तक) के उनके दस्तावेज़ों, लेखों, पत्रों और वक्तव्यों में देखा
जा सकता है। भगतसिंह के सर्वोन्नत विचार फ़रवरी 1931 के दो भाग के उस
मसविदा दस्तावेज़ में देखने को मिलते हैं जो 'क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसविदा'
नाम से 'भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज़' (सं. – जगमोहन सिंह,
चमनलाल, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली) में संकलित है।
भगतसिंह की जेल नोटबुक मिलने के बाद भगतसिंह के चिन्तक व्यक्तित्व
की व्यापकता और गहराई पर और अधिक स्पष्ट रोशनी पड़ी है, उनकी विकास
की प्रक्रिया समझने में मदद मिली है और यह सच्चाई और अधिक पुष्ट हुई है
कि भगतसिंह ने अपने अन्तिम दिनों में, सुव्यवस्थित एवं गहन अध्ययन के बाद
बुद्धिसंगत ढंग से मार्क्सवाद को अपना मार्गदर्शक सिद्धान्त बनाया था। एकबारगी
तो यह बात अविश्वसनीय-सी लगती है कि क्रान्तिकारी जीवन और जेल की
बीहड़ कठिनाइयों में भगतसिंह ने ब्रिटिश सेंसरशिप की तमाम दिक्क़तों के बावजूद
पुस्तकें जुटाकर इतना गहन और व्यापक अध्ययन कर डाला। महज 23 वर्ष की
छोटी-सी उम्र में चिन्तन का जो धरातल उन्होंने हासिल कर लिया था, वह उनके
युगद्रष्टा युगपुरुष होने का ही प्रमाण था। ऐसे महान चिन्तक ही इतिहास की दिशा
बदलने और गति तेज़ करने का माद्दा रखते हैं। भगतसिंह की शहादत भारतीय जनता
को आज भी क्षितिज पर अनवरत जलती मशाल की तरह प्रेरणा देती है, पर यह
भी सच है कि उनकी फाँसी ने इतिहास की दिशा बदल दी। यह सोचना ग़लत
नहीं है कि भगतसिंह को 23 वर्ष की अल्पायु में यदि फाँसी नहीं हुई होती तो
राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष का इतिहास और भारतीय सर्वहारा क्रान्ति का इतिहास शायद
कुछ और ही ढंग से लिखा जाता।
बहरहाल, इतिहास की उतनी ही दुखद विडम्बना यह भी है कि आज भी इस
देश के शिक्षित लोगों का एक बड़ा हिस्सा भगतसिंह को एक महान वीर तो मानता
है, पर यह नहीं जानता कि 23 वर्ष का वह युवा एक महान चिन्तक भी था।
राजनीतिक आज़ादी मिलने के पचास वर्षों बाद भी सम्पूर्ण गाँधी वाङ्मय, नेहरू
वाङ्मय से लेकर सभी राष्ट्रपतियों के अनुष्ठानिक भाषणों के विशद्ग्रन्थ तक
प्रकाशित होते रहे पर किसी भी सरकार ने भगतसिंह और उनके साथियों के सभी
दस्तावेज़ों को अभिलेखागार, पत्र-पत्रिकाओं और व्यक्तिगत संग्रहों से निकालकर
550 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
छापने की सुध नहीं ली।
छुटपुट पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों, अजय कुमार घोष, शिव वर्मा,
सोहन सिंह जोश, जितेन्द्र नाथ सान्याल आदि भगतसिंह के समकालीन
क्रान्तिकारियों की विभिन्न पुस्तकों-लेखों, भगतसिंह के अनुज की पुत्री वीरेन्द्र
सिन्धु की पुस्तकों तथा गोपाल ठाकुर, जी. देवल, मन्मथनाथ गुप्त, बिपन
चन्द्र, हंसराज रहबर, कमलेश मोहन आदि इतिहासकारों-लेखकों के विभिन्न
लेखों एवं पुस्तकों से भगतसिंह के विचारक व्यक्तित्व पर रोशनी अवश्य पड़ती रही
है, पर बहुसंख्यक शिक्षित आबादी भी इससे बहुत कम ही परिचित रही है।
भगतसिंह के कुछ ऐतिहासिक बयानों-दस्तावेज़ों को सत्तर के दशक के पूर्वार्द्ध में
दिल्ली से कुछ क्रान्तिकारी वामपन्थी संस्कृतिकर्मियों की पहल पर प्रकाशित होने
वाली ‘मुक्ति’ पत्रिका ने प्रकाशित किया। इसके बाद कई पत्रिकाओं ने और
क्रान्तिकारी ग्रुपों ने पुस्तिकाओं के रूप में भगतसिंह के चुने हुए कुछ लेखों को
छापने का काम किया। भगतसिंह के साथी शिववर्मा ने उनके चुनिन्दा लेखों का
संकलन अंग्रेज़ी और हिन्दी में प्रकाशित किया।
सबसे पहले जगमोहन सिंह (भगतसिंह की बहन के पुत्र) और चमनलाल
ने भगतसिंह और उनके साथियों के अधिकांश वक्तव्यों, लेखों, पत्रों और दस्तावेज़ों
को एक जगह संकलित किया (हालाँकि यह संकलन भी सम्पूर्ण नहीं है) जो
1986 में राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित हुआ।
इस तथ्य की चर्चा भगतसिंह के कई साथियों और इतिहासविदों ने की
है कि जेल में उन्होंने चार और पुस्तकें लिखी थीं : ‘आत्मकथा’, ‘समाजवाद
का आदर्श’, ‘भारत में क्रान्तिकारी आन्दोलन’ तथा ‘मृत्यु के द्वार पर’।
दुर्भाग्यवश इनकी पाण्डुलिपियाँ आज उपलब्ध नहीं हैं और माना यही जाता है कि
वे नष्ट हो चुकी हैं। हालाँकि इनके ग़ायब होने की कहानी भी रहस्यमय है और
इसमें भी किसी साज़िश से पूरी तरह इन्कार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, यह
भारतीय इतिहास के सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंगों में से एक है।
अब हम भगतसिंह की उस ऐतिहासिक जेल नोटबुक की चर्चा पर आते हैं
जो पहली बार 1993 में जयपुर से ‘इण्डियन बुक क्रॉनिकल’ से 'A Martyrs
Notebook' नाम से प्रकाशित हुई। इसका सम्पादन भूपेन्द्र हूजा ने किया था। इस
डायरी के प्रारम्भ में दी गयी परिचयात्मक टिप्पणी के अनुसार, इसकी हस्तलिखित/
डुप्लीकेटेड प्रतिलिपि एक पैकेट के रूप में पहली बार जी.बी. कुमार हूजा
(गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार के तत्कालीन कुलपति) को 1981 में गुरुकुल, इन्द्रप्रस्थ
के दौरे के समय स्वामी अग्निवेश से मिली थी।
पर इससे भी पहले यह डायरी 1977 में एल.वी. मित्रोखिन ने फ़रीदाबाद में
रह रहे भगतसिंह के भाई कुलबीर सिंह के पास देखी थी और उसका विस्तृत
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 551
अध्ययन करके एक लेख लिखा था, जो 1981 में अंग्रेज़ी में प्रकाशित उनकी
पुस्तक 'Lenin and India' में एक अध्याय के रूप में शामिल किया गया। पुनः
1990 में इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद भी प्रगति प्रकाशन, मास्को से 'लेनिन
और भारत' नाम से प्रकाशित हुआ।
अब तक इस डायरी के सम्बन्ध में प्राप्त जानकारी को हम यहाँ सिलसिलेवार
प्रस्तुत कर रहे हैं।
1968 में भारतीय इतिहासकार जी. देवल ने 'पीपुल्स पाथ' पत्रिका में
भगतसिंह पर एक लेख लिखा था जिसमें 200 पन्नों की एक कापी का ज़िक्र
किया गया है। उक्त कापी में पूँजीवाद, समाजवाद, राज्य की उत्पत्ति, मार्क्सवाद,
कम्युनिज़्म, धर्म, दर्शन, क्रान्तियों के इतिहास आदि पर विभिन्न पुस्तकों के
अध्ययन के दौरान भगतसिंह द्वारा जेल में लिये गये नोट्स हैं। यह नोटबुक भगतसिंह
की फाँसी के बाद उनके परिवार वालों को सौंप दी गयी थी। देवल ने इसे
फ़रीदाबाद में रह रहे भगतसिंह के छोटे भाई कुलबीर सिंह के पास देखा था और
अध्ययन करके नोट्स लिये थे। अपने लेख में देवल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि
यह डायरी प्रकाशित की जानी चाहिए, पर ऐसा हुआ नहीं।
उक्त डायरी की जानकारी होने पर 1977 में रूसी विद्वान मित्रोखिन भारत
आये और कुलबीर सिंह के हवाले से उक्त डायरी के विस्तृत अध्ययन के बाद
एक लेख लिखा जो उनकी पुस्तक 'Lenin and India' का एक अध्याय बना।
हमें उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 1979 के बाद इतिहास के कई शोधार्थियों
ने 404 पृष्ठों की उक्त जेल नोटबुक की एक फ़ोटो प्रतिलिपि तीन मूर्ति भवन
स्थित जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम व लायब्रेरी में भी देखी-पढ़ी। पर
इस पर अलग से कोई शोध निबन्ध कहीं भी प्रकाशित नहीं हुआ।
गुरुकुल कांगड़ी के तत्कालीन कुलपति जी.बी. कुमार हूजा 1981 में गुरुकुल
इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली से 20 किलोमीटर दक्षिण तुगलकाबाद रेलवे स्टेशन के निकट)
के दौरे पर गये थे। वहाँ संस्था के तत्कालीन मुख्य अधिष्ठाता स्वामी शक्तिवेश
ने गुरुकुल के 'हॉल ऑफ़ फ़ेम' के तहख़ाने में सुरक्षित इस ऐतिहासिक धरोहर की
एक हस्तलिखित/डुप्लीकेटेड प्रतिलिपि दिखलायी, जिसे जी.बी. कुमार हूजा ने
कुछ दिनों के लिए माँग लिया। बाद में स्वामी शक्तिवेश की हत्या हो गयी और
उक्त डायरी (प्रतिलिपि) हूजा जी के पास ही रह गयी।
1989 में भगतसिंह की शहादत के दिन 23 मार्च को जयपुर में कुछ
बुद्धिजीवियों ने 'हिन्दोस्तानी मंच' का गठन किया। उसी की प्रारम्भिक बैठकों
में जी.बी. कुमार हूजा ने भगतसिंह की जेल डायरी की जानकारी दी और
'हिन्दोस्तानी मंच' ने इसे प्रकाशित करने का निश्चय किया।
'इण्डियन बुक क्रॉनिकल' पत्रिका (जयपुर) के सम्पादक भूपेन्द्र हूजा को इस
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परियोजना के सम्पादन की ज़िम्मेदारी दी गयी और 'हिन्दोस्तानी मंच' के महासचिव
सरदार ओबेराय, प्रो. आर.पी. भटनागर और डॉ. आर.सी. भारतीय ने उनके
सहयोगी की भूमिका निभायी। दुर्भाग्यवश, अर्थाभाव के कारण यह योजना खटाई
में पड़ गयी।
इसी दौरान डॉ. आर.सी. भारतीय को उक्त जेल नोटबुक की एक और टाइप
की हुई प्रतिलिपि प्राप्त हुई जो एक स्थानीय विद्वान डॉ. प्रकाश चतुर्वेदी मास्को
अभिलेखागार से फ़ोटो-प्रतिलिपि कराकर लाये थे। 'मास्को प्रति' और 'गुरुकुल
प्रति' शब्दशः एक-दूसरे से मिल रहे थे।
1991 में भूपेन्द्र हूजा ने नोटबुक को किश्तों में अपनी पत्रिका 'इण्डियन बुक
क्रॉनिकल' में प्रकाशित करना शुरू किया। भगतसिंह की जेल नोटबुक इस रूप
में पहली बार व्यापक पाठक समुदाय तक पहुँची। डॉ. चमनलाल ने भी भूपेन्द्र हूजा
को सूचित किया कि उक्त नोटबुक की एक प्रतिलिपि उन्होंने भी नेहरू म्यूजियम
लायब्रेरी, नई दिल्ली में देखी थी।
इस तरह भूपेन्द्र हूजा व उनके सहयोगियों की नज़र में उक्त जेल नोटबुक की
आधिकारिकता और अधिक पुष्ट हुई। पहली बार 1994 में उक्त जेल नोटबुक
'इण्डियन बुक क्रॉनिकल' की ओर से ही भूपेन्द्र हूजा और जी.बी. कुमार हूजा
(बलभद्र भारती) की भूमिकाओं के साथ पुस्तकाकार प्रकाशित हुई। उक्त दोनों
भूमिकाओं से भी स्पष्ट है कि जी.बी.कुमार हूजा और भूपेन्द्र हूजा को इस तथ्य
की जानकारी नहीं थी कि उक्त डायरी की मूल प्रति भगतसिंह के भाई कुलबीर
सिंह के पास फ़रीदाबाद में भी मौजूद है। उन्हें जी. देवल के उस लेख की भी
सम्भवतः जानकारी नहीं थी जिन्होंने सबसे पहले 1968 में यह तथ्य उद्घाटित
किया था, न ही उन्हें मित्रोखिन का वह लेख (1981) ही मिला था जो उक्त
डायरी के विशद अध्ययन के बाद लिखा गया था।
बहरहाल, मित्रोखिन ने कुलबीर सिंह के पास उपलब्ध नोटबुक/डायरी से लिये
गये हवालों पर जो पृष्ठ अंकित किये हैं, उन्हें देखने से स्पष्ट हो जाता है कि जी.
बी. कुमार हूजा को प्राप्त 'गुरुकुल टेक्स्ट' उक्त मूल डायरी की ही
डुप्लीकेट/हस्तलिखित प्रतिलिपि है।
ऐसा सम्भव है कि डॉ. प्रकाश चतुर्वेदी ने डायरी/नोटबुक की जो प्रतिलिपि
मास्को अभिलेखागार में देखी थी, वह मित्रोखिन ही भारत से ले गये हों। या यह
भी हो सकता है कि किसी और रूसी विद्वान ने भी डायरी का अध्ययन किया
हो।
बहरहाल, इन तथ्यों से डायरी की आधिकारिकता ही और अधिक पुष्ट होती
है।
'भगतसिंह और उनके साथियों के दस्तावेज' पुस्तक के सम्पादक-द्वय
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 553
जगमोहन सिंह और चमनलाल ने भी पुस्तक के दूसरे संस्करण की भूमिका (23
मार्च '89) में लिखा है : "भगतसिंह की जेल में लिखित 404 पृष्ठों की डायरी,
जिसमें महत्त्वपूर्ण राजनीतिक व दार्शनिक नोट्स हैं, अब भी सामान्य पाठकों की
पहुँच से बाहर है, हालाँकि इसकी फ़ोटो प्रति तीन मूर्ति स्थित जवाहरलाल नेहरू
मेमोरियल म्यूज़ियम व लायब्रेरी में सुरक्षित है। इस पर क्या कहा जा सकता है,
पाठक स्वयं ही सोचें।"
इस टिप्पणी से ऐसा लगता है कि जगमोहन सिंह और चमनलाल को भी यह
तथ्य ज्ञात नहीं था कि भगतसिंह की मूल जेल नोटबुक उनके भाई कुलबीर सिंह
के पास मौजूद है, जिसका अध्ययन 1968 में जी. देवल ने और 1977 में मित्रोखिन
ने किया था। यह विशेष आश्चर्य की बात इसलिए भी है क्योंकि जगमोहन सिंह
भी स्वयं भगतसिंह के परिवार के सदस्य हैं। वे भगतसिंह की बहन बीबी अमर
कौर के पुत्र हैं। भगतसिंह के दूसरे भाई कुलतार सिंह की पुत्री वीरेन्द्र सिन्धू ने भी
भगतसिंह पर दो पुस्तकें लिखी हैं। उन्होंने भी इसका उल्लेख नहीं किया है कि
भगतसिंह की जेल नोटबुक उनके परिवार के ही एक सदस्य के पास मौजूद है।
यदि इन परिवार-जनों को भी यह तथ्य नहीं पता था तो इस बारे में हमें कुछ नहीं
कहना। न ही इसकी अन्तर्कथा को जानने में हमारी कोई रुचि है।
यह सवाल हम यहाँ इसलिए उठा रहे हैं कि यह भारत में इतिहास की एक
गम्भीर समस्या है। आज़ाद भारत की कांग्रेसी सरकार ही नहीं, किसी भी पूँजीवादी
संसदमार्गी दल से हम यह अपेक्षा नहीं रखते कि उनकी सरकारें भगतसिंह के
विचारों को जनता तक पहुँचाने का काम करेंगी। उनका बस चलता तो वे भगतसिंह
की स्मृति तक को दफ़्न कर देतीं। पर यह उनके बस के बाहर की बात है।
लेकिन शहीदे-आजम भगतसिंह के परिवार-जनों का उनकी वैचारिक विरासत
के बारे में जो रुख रहा, उसके बारे में क्या कहा जाये? सीधा सवाल यह है कि
कुलबीर सिंह के पास यदि भगतसिंह की जेल नोटबुक मौजूद थी, तो उन्होंने उसे
भारतीय जनता तक पहुँचाने के लिए क्या कोशिश की? उन्होंने अख़बारों में,
इतिहासकारों को पत्र लिखकर इसे छपाने और जनता तक पहुँचाने की कोई कोशिश
क्यों नहीं की? क्या इसे प्रकाशित करने के लिए प्रकाशक नहीं मिलते? या जनता
से स्रोत-संसाधन नहीं जुटते? हमारी जानकारी के अनुसार, शहीदेआजम के परिवार
के लोग स्वयं भी इतने विपन्न नहीं हैं। उन्हें यदि भगतसिंह के आदर्शों से प्यार होता
और उनके विचारों को जन-जन तक पहुँचाने की चिन्ता होती तो वे उक्त डायरी
स्वयं छपवा सकते थे। आश्चर्य तो तब होता है जब लगता है कि जेल नोटबुक के
कुलबीर सिंह के पास उपलब्ध होने का तथ्य स्वयं जगमोहन सिंह या वीरेन्द्र सिन्धू
को ही नहीं पता था। क्या यह एक शर्मनाक विडम्बना नहीं है कि भगतसिंह की
जेल नोटबुक पर आधारित पहला विस्तृत शोध-निबन्ध 1981 में एक रूसी विद्वान
554 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
मित्रोखिन की पुस्तक में संकलित होकर सामने आया? वैसे इस काहिली और
गैरज़िम्मेदारी के लिए उन इतिहासकारों को भी माफ़ नहीं किया जा सकता जो
इतिहास को केवल प्रोफ़ेसरी का जरिया बनाये हुए हैं और इतिहास की बहुमूल्य
विरासत को भी जनता तक पहुँचाने की जिन्हें रत्तीभर चिन्ता नहीं है। और भला
क्यों हो? वे इतिहास पढ़ाने वाले मुदर्रिस हैं, इतिहास बनाने से उनका भला क्या
सरोकार?
जहाँ तक भगतसिंह के परिवार के उन सदस्यों का सवाल है, जिन्होंने आज़ादी
के इतने वर्षों बाद तक इतिहास की एक बहुमूल्य धरोहर को पारिवारिक सम्पत्ति
की तरह दाबे रखा और उसे जनता तक पहुँचाने की कोई कोशिश नहीं की; वे
भी अपनी इस करनी के चलते इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं। वैसे हमारे
देश में यह कोई नई बात नहीं है। क्रान्तिकारी राजनीति और साहित्य में ऐसे कई
उदाहरण हैं कि महान विभूतियों के रक्त-सम्बन्धी उत्तराधिकारी उनसे जुड़े होने के
नाते इज़्ज़त तो खूब पा रहे हैं पर उनके आदर्शों और सपनों से उन्हें कुछ भी नहीं
लेना-देना। उनकी रुचि या तो सम्मान-प्रतिष्ठा-सुविधा में है या फिर रायल्टी की
मोटी रक़म में। भगतसिंह हों या राहुल सांकृत्यायन, उनका कृतित्व आज पूरे राष्ट्र
की, पूरी जनता की या उनके वैचारिक उत्तराधिकारियों की धरोहर न बनकर
परिवार-जनों की निजी सम्पत्ति बन गयी है। क्रान्तिकारियों के तमाम
बेटे-भतीजे-भांजे आज क्रान्तिकारियों के रक्त-सम्बन्धी होने के नाते स्वाभाविक
तौर पर जनता से इज़्ज़त पाते हैं और सीना फुलाते हैं। पर उन्हें इस बात में कोई
दिलचस्पी नहीं कि क्या उन क्रान्तिकारियों के सपने पूरे हुए? इसके विपरीत वे
उसी सत्ता से सुविधाएँ लेने और उन्हीं राजनीतिक दलों की राजनीति करने तक
का काम करते हैं, जिन्होंने क्रान्तिकारियों के सपनों के साथ विश्वासघात किया।
क्रान्तिकारियों के ऐसे वारिस भी क्या अपने महान पूर्वजों के आदर्शों का व्यापार
नहीं कर रहे हैं?
बहरहाल, 1994 में भूपेन्द्र हूजा और उनके साथियों ने भगतसिंह की जेल
नोटबुक का मूल अंग्रेज़ी संस्करण छापकर भारत की जनता और क्रान्तिकारी
आन्दोलन के लिए जो उपयोगी कार्य किया उसे कभी भी भुलाया नहीं सकता।
आम जनता को इतिहास की बहुमूल्य धरोहर से परिचित कराने के महत्त्वपूर्ण
कार्यभारों में से यह भी एक है कि भगतसिंह की जेल नोटबुक और उनके तथा
उनके साथियों के सभी दस्तावेज़ों को सभी भारतीय भाषाओं में अनूदित करके
जन-जन तक पहुँचाया जाये।
भगतसिंह की जेल नोटबुक स्कूली कापी की सामान्य साइज (17.50 से.मी.
ग 21 से.मी) की पुस्तिका है। नोटबुक खोलते ही पहले पेज (टाइटिल पेज) पर
अंग्रेज़ी में लिखा है : “भगतसिंह के लिए/चार सौ चार (404) पृष्ठ...” नीचे एक
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 555
हस्ताक्षर है और 12.9.29 की तिथि दी गयी है। स्पष्ट है कि यह प्रविष्टि जेल
अधिकारियों द्वारा भगतसिंह को कापी देते समय की गयी है। जेल मैनुअल/
नियमावली के जानकार जानते होंगे कि जब भी कोई क़ैदी लिखने के लिए कापी
माँगता है तो जेल अधिकारी को कापी के शुरू और अन्त में ऐसा लिखना होता
है और क़ैदी को भी प्राप्त करते समय वहाँ हस्ताक्षर करना होता है। भगतसिंह के
हस्ताक्षर (अंग्रेज़ी में) टाइटल पेज पर भी मौजूद हैं और 12.9.29 की तिथि के
साथ कापी के अन्त में भी। नोटबुक की जो डुप्लीकेटेड/हस्तलिखित प्रतिलिपि
जी.बी. कुमार हूजा को गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ में मिली, उसमें नीचे बायें कोने पर अंग्रेज़ी
में यह भी लिखा हुआ था : “प्रतिलिपि शहीद भगतसिंह के भतीजे अभय कुमार
सिंह द्वारा तैयार।”
मूल नोटबुक के पृष्ठ भगतसिंह की छोटे अक्षरों वाली लिखाई से भरे हुए हैं।
ज्यादा नोट्स अंग्रेज़ी में लिये गये हैं, लेकिन कहीं-कहीं उर्दू का भी इस्तेमाल किया
गया है।
556 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक
भगतसिंह द्वारा जेल में (1929-31)
अध्ययन के दौरान लिये गये
नोट्स और उद्धरण
नोटबुक खोलते ही पहले पेज (टाइटिल पेज) पर अंग्रेज़ी में लिखा
है:
“ भगतसिंह के लिए
चार सौ चार (404) पृष्ठ...”
नीचे एक हस्ताक्षर है और 12.9.29 की तिथि दी गयी है। स्पष्ट है
कि यह प्रविष्टि जेल अधिकारियों द्वारा भगतसिंह को कापी देते समय की
गयी है।
इसके नीचे भगतसिंह के दो पूरे और दो लघु हस्ताक्षर हैं।
पृष्ठ के ऊपरी दायें किनारे पर भी अंग्रेज़ी में भगतसिंह का नाम
लिखा है। (देखें सामने का पृष्ठ)
जेल मैनुअल/नियमावली के जानकार जानते होंगे कि जब भी कोई
क़ैदी लिखने के लिए कापी माँगता है तो जेल अधिकारी को कापी के
शुरू और अन्त में ऐसा लिखना होता है और क़ैदी को भी प्राप्त करते
समय वहाँ हस्ताक्षर करना होता है। भगतसिंह के हस्ताक्षर (अंग्रेज़ी में)
टाइटिल पेज पर भी मौजूद हैं और 12.9.29 की तिथि के साथ कापी के
अन्त में भी।
नोटबुक की जो डुप्लीकेटेड/हस्तलिखित प्रतिलिपि जी.बी. कुमार
हूजा को गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ में मिली, उसमें नीचे बायें कोने पर अंग्रेज़ी
में यह भी लिखा हुआ था : “प्रतिलिपि शहीद भगतसिंह के भतीजे अभय
कुमार सिंह द्वारा तैयार।”
नोटबुक आम स्कूली कॉपी के आकार की थी, लगभग
6.75 X 8.50 इंच या 17.50 X 21 सेण्टीमीटर।
— सम्पादक
558 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
Bhagat Singh Paper
For S Bhagat Singh
four hundred & four pages
[404 Pages]
Line
12/9/29
Bhagat Singh
Bhagat Singh
Copy by Abhey Kumar Singh
Nephew of Shaheed Bhagat Singh
पृष्ठ 2 (2)¹
ज़मीन के माप² :
जर्मन 20 हेक्टेयर – 50 एकड़ अर्थात 1 हेक्टेयर = 2½ एकड़
- नोटबुक की पृष्ठ संख्या टाइटल पृष्ठ से गिनी गयी है। कोष्ठक में दी गयी संख्या उन
पृष्ठों की है जिन पर लिखा हुआ है। उदाहरण के लिए पृष्ठ 2 (2) के बाद तीन पृष्ठ सादे
हैं और अगली लिखावट पृष्ठ 6 (3) पर है। नोटबुक में बीच-बीच में कुछ पृष्ठ नहीं हैं तथा
कई पृष्ठ ख़ाली छोड़े हुए हैं। कुल 145 पृष्ठों पर भगतसिंह ने नोट्स लिये हैं। - नोटबुक के पृष्ठ दो पर ज़मीन की माप सम्बन्धी सिर्फ़ इन्हीं दो इकाइयों – हेक्टेयर और
एकड़ की आपसी तुलना अंकित है।
560 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
<u>पृष्ठ 6 (3)</u>
सम्पत्ति से मुक्ति – “सम्पत्ति की स्वतन्त्रता”...जहाँ तक छोटे पूँजीपति और
किसान सम्पत्तिधारकों का सवाल है, “सम्पत्ति से मुक्ति” बन गयी।
विवाह अपनेआप में, पहले की भाँति ही, वेश्यावृत्ति का क़ानूनी तौर पर
स्वीकृत रूप, औपचारिक आवरण, बना रहा...।
(सोशलिज़्म, साइण्टिफ़िक एण्ड यूटोपिया)¹
―――――○―――――
दिमाग़ी गुलामी – “एक शाश्वत सत्ता ने मानवसमाज को वैसा ही रचा, जैसा
आज वह है, तथा ‘श्रेष्ठतर’ और ‘सत्ता’ के प्रति समर्पण दैवी इच्छा से ही
‘निम्नतर’ वर्गों पर लागू किया गया है।” उपदेशक गण, उपदेश मंच और प्रेस की
ओर से दिये जाने वाले इस सन्देश ने आदमी के दिमाग़ को सम्मोहित कर रखा
है और यह शोषण के सबसे मज़बूत स्तम्भों में से एक है।
(ओरिजिन ऑफ़ द फ़ैमिली में अनुवादक की भूमिका)²
<u>पृष्ठ 7 (4)</u>
एंगेल्स कृत द ओरिजिन ऑफ़ द फ़ैमिली...
आदिम समाज के इतिहास में एक तर्कसंगत व्यवस्था प्रस्तुत करने का प्रयास
सबसे पहले मार्गन ने किया।³
वह इसे तीन मुख्य युगों में बाँटता है :
- असभ्यता, 2. बर्बरता, 3. सभ्यता
1. असभ्यता पुनः तीन अवस्थाओं में विभाजित : - निम्नतर; 2. मध्य; 3. उच्चतर
1. असभ्यता की निम्नतर अवस्था : मानवजाति की शैशवावस्था।
- फ़्रेडरिक एंगेल्स; समाजवाद, काल्पनिक एवं वैज्ञानिक
- फ़्रेडरिक एंगेल्स; परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति
- लुइस एच. मार्गन (1818–1881); अमेरिकी समाजशास्त्री जिन्होंने 1877 में प्रकाशित
अपनी पुस्तक प्राचीन समाज (Ancient Society, or Researches in the Lines of Human
Progress from Savagery through Barbarism to Civilization) में विस्तृत सामाजिक
अध्ययन के आधार पर इतिहास विकास की भौतिकवादी धारणा को पुष्ट किया था। एंगेल्स
ने अपनी पुस्तक परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति लिखने में मुख्य रूप से मार्गन
द्वारा प्रस्तुत सामग्री को आधार बनाया था।
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 561
- पेड़ों पर रहना। 2. भोजन था फल, गिरीफल और कन्दमूल। 3. सुसंगत बोली
का विकास इस काल की प्रधान उपलब्धि। - मध्य अवस्था : 1. आग की खोज। 2. मछली भोजन के रूप में प्रयुक्त।
- शिकार के लिए पत्थर के औज़ार आविष्कृत। 4. मानव मांसभक्षण अस्तित्व में
आ जाता है।¹ - उच्चतर अवस्था : 1. धनुष और बाण, कुम्हारी नहीं। 2. ग्रामीण बस्तियाँ।
- घर बनाने में इमारती लकड़ी का इस्तेमाल। 4. कपड़े बुने जाने लगे।
असभ्यता की अवस्था में धनुष और बाण वैसे ही थे, जैसे बर्बरता की अवस्था
में लोहे की तलवार, और सभ्यता की अवस्था में आग्नेयास्त्र – यानी, प्रभुत्व के
हथियार।
पृष्ठ १ (5) - बर्बरता :
- निम्नतर अवस्था : 1. कुम्हारी का आरम्भ। पहले लकड़ी के बरतनों पर
मिट्टी की परतें चढ़ायी जाती थीं, लेकिन बाद में चलकर मिट्टी के बरतन
आविष्कृत कर लिये गये। - मानवजातियाँ दो स्पष्ट वर्गों में विभाजित :
(i) पूर्वी, जो जानवर पालती थीं और अनाज पैदा करती थीं;
(ii) पश्चिमी, जिनके पास सिर्फ़ 'मक्का' था। - मध्य अवस्था :
(अ) पश्चिमी गोलार्द्ध : अर्थात अमेरिका में वे खाद्य-फ़सलें उगाते थे, (खेती
और सिंचाई), और घर बनाने के लिए ईंटें पकाते थे।
(ब) पूर्वी : वे दूध और मांस के लिए पशुपालन करती थीं। इस अवस्था में
कोई खेती नहीं। - उच्चतर अवस्था :
- कच्चे लोहे को गलाना।
- दस्तावेज़ लिखने के लिए अक्षर-लिपि का विकास और उसका इस्तेमाल।
इस अवस्था में अनेक आविष्कार होते हैं। यूनानी नायकों का यही काल है। - बड़े पैमाने पर मक्का की खेती करने के लिए पशुओं द्वारा लोहे के हल
खींचे जाते हैं। - जंगलों की कटाई, तथा लोहे की कुल्हाड़ियाँ एवं लोहे की कुदालें इस्तेमाल
में आने लगीं। - यहाँ भगतसिंह ने हाशिये पर लिखा है : वेनिज़न = शिकार से प्राप्त पशु-मांस
562 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
- महान उपलब्धियाँ : (i) लोहे के उन्नत औज़ार, (ii) भाथियाँ, (iii) जान्ता,
(iv) कुम्हार का चाक, (v) तेल और शराब निकालना, (vi) धातुओं की ढलाई,
(vii) गाड़ी और रथ (viii) जहाज़-निर्माण [पृष्ठ 9 (6)] (ix) कलात्मक
वास्तु-शिल्प, (x) शहर और क़िलों का निर्माण, (xi) होमर युग और सम्पूर्ण
मिथकशास्त्र
इन उपलब्धियों के साथ ही, यूनानी तीसरी अवस्था – “सभ्यता” – में
प्रवेश कर जाते हैं।
संक्षेप में : - असभ्यता : मुख्य तौर पर तैयारशुदा प्राकृतिक उत्पादों के विनियोजन का
काल; मानवीय बुद्धि-कुशलता मुख्यतः इस विनियोजन में सहायक सिद्ध होने वाले
उपयोगी औज़ारों का आविष्कार करती है। - बर्बरता : पशुपालन, कृषि एवं मानवीय अभिकर्ता द्वारा प्रकृति की
उत्पादकता बढ़ाने के नये-नये तरीक़ों का ज्ञान हासिल करने का काल। - सभ्यता : प्राकृतिक उत्पादों के व्यापकतर उपयोग सीखने का,
मैन्युफ़ैक्चरिंग का, तथा कला का काल।
इस प्रकार, हमें, मानव-विकास की तीन मुख्य अवस्थाओं से आमतौर पर मेल
खाते हुए परिवार के तीन मुख्य रूप मिलते हैं : - असभ्यता के काल में : “यूथ विवाह”
- बर्बरता के काल में : युग्म परिवार
- सभ्यता के काल में : एकनिष्ठ विवाह के साथ-साथ व्यभिचार और
वेश्यावृत्ति। युग्म परिवार और एकनिष्ठ विवाह के दरम्यान, बर्बरता की उच्चतर
अवस्था में, दासियों के ऊपर पुरुषों के शासन और बहुपत्नी-विवाह का प्रवेश।
(पृष्ठ 90)
पृष्ठ 10 (7)
विवाह के दोष
ख़ासतौर से एक दीर्घकालिक लगाव, दस मामलों में से नौ में, व्यभिचार का
एक पक्का प्रशिक्षण स्कूल होता है। (पृष्ठ 91)
समाजवादी क्रान्ति और विवाह संस्था
अब हम एक ऐसी सामाजिक क्रान्ति की ओर अग्रसर हो रहे हैं जिसके
परिणामस्वरूप एकनिष्ठ विवाह का वर्तमान आर्थिक आधार उतने ही निश्चित रूप
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 563
से मिट जायेगा, जितने निश्चित रूप से एकनिष्ठ विवाह के अनुपूरक का,
वेश्यावृत्ति का आर्थिक आधार मिट जायेगा। एकनिष्ठ विवाह की प्रथा एक व्यक्ति
के – और वह भी एक पुरुष के – हाथों में बहुत-सा धन एकत्रित हो जाने के
कारण और इस इच्छा के फलस्वरूप उत्पन्न हुई थी कि वह यह धन किसी दूसरे
की सन्तान के लिए नहीं, केवल अपनी सन्तान के लिए छोड़ जाये। इस उद्देश्य
के लिए स्त्री की एकनिष्ठता आवश्यक थी, पुरुष की नहीं। इसलिए नारी की
एकनिष्ठता से पुरुष के खुले या छिपे बहुपत्नीत्व में कोई बाधा नहीं पड़ती थी।
परन्तु आने वाली सामाजिक क्रान्ति स्थायी दायाद्य धन-सम्पदा के अधिकतर
भाग को – यानी उत्पादन के साधनों को – सामाजिक सम्पत्ति बना देगी और ऐसा
करके सम्पत्ति की विरासत के बारे में इस सारी चिन्ता को अल्पतम कर देगी। पर
एकनिष्ठ विवाह चूँकि आर्थिक कारणों से उत्पन्न हुआ था, इसलिए क्या इन कारणों
के मिट जाने पर वह भी मिट जायेगा? (पृष्ठ 91)¹
पृष्ठ 11 (8)
“भर दो प्याला हे प्रिय मेरे, जो दूर करे
आज विगत के दुख औ' आगत के भय को –
कल? – क्यों, कल हो सकता मैं हो जाऊँ
सात हज़ार वर्षों के कल का अतीत।
... ... ...
यहाँ घने गाछ के नीचे, साथ में रोटी,
मदिरा की सुराही, शायरी की किताब – और तुम
गा रही बगल में मेरे इस निर्जन बीहड़ में!
अब तो स्वर्ग बना यह निर्जन बीहड़ ही!
“उमर ख़य्याम”
राज्य : राज्य की पूर्वापेक्षा है बल प्रयोग की एक सार्वजनिक सत्ता, जो अपने
सदस्यों के सम्पूर्ण निकाय से पृथक हो चुकी हो।
– (एंगेल्स) (पृष्ठ 116)²
- एंगेल्स; परिवार, निजी सम्पत्ति और राज्य की उत्पत्ति
- वही
564 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़