भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 583, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंदान : “मेरे पीछे आओ”, ईसा मसीह ने धनी युवक को कहा।
लेकिन अपने व्यवसाय में लगे रहना और अपनी कुछ दौलत को
दान-कर्म में लगाना तुलनात्मक रूप से आसान था। परोपकार हरेक युग का चलन
रहा है। दान ग़रीबी के विद्रोही तेवर को नष्ट कर देता है। अतः परोपकारी धनी
आदमी अपने सरीखे दौलतमन्दों का ही हितैषी होता है, और उन्हीं की एहसानमन्दी
महसूस करता है; उसके लिए सभ्य समाज के सारे दरवाज़े खुले होते हैं। इसीलिए
उन्होंने (यानी ईसा मसीह ने – स.) भिक्षा-दान को सामाजिक काया के गहरे घावों
की मरहम-पट्टी के रूप में स्वीकार्यता देने से इन्कार कर दिया...। परोपकार को
न्याय के एक विकल्प के रूप में उन्होंने कतई तरजीह नहीं दी।
[पृष्ठ 25 (22) पर जारी]
दान दोहरा अभिशाप है – यह दाता को संगदिल और प्राप्तकर्ता को
नरमदिल बनाता है। यह ग़रीबों का शोषण से कहीं अधिक नुक़सान करता है,
क्योंकि यह उन्हें शोषित होने का इच्छुक बनाता है। यह दास भावना को जन्म
देता है, जो नैतिक आत्महत्या ही है। ईसा मसीह ने अथाह दौलत के लिए सिर्फ़
एक ही इजाज़त दी थी और वह यह थी कि उसे क्रान्तिकारी प्रचार के लिए
समर्पित कर दिया जाये, ताकि बाद में अथाह दौलत का जमा होना ही हमेशा के
लिए असम्भव हो जाये...।
– बक ह्वाइट, पादरी, जन्म 1870, यू.एस.ए. पृष्ठ(353)¹
मुक्ति-युद्ध
फ़ौजों की ताक़त एक दिखायी देने वाली चीज़ है
सुस्पष्ट, और देश काल में आबद्ध,
लेकिन कौन खोज सकता उस शक्ति की सीमाओं को
जिसे एक बहादुर जनता ही प्रकट कर सकती है
या चाहे तो, छिपा सकती है – मुक्ति-युद्ध में।
भड़क उठे न्यायसंगत प्रतिरोध का – कोई पाँव पीछा नहीं कर सकता,
कोई आँख नहीं देख सकती उस जानलेवा जगह को,
यह ताक़त चाहे तो उड़ान भरे पंख लगाकर
प्रचण्ड वायु की भाँति, या सोये मन्द वायु की भाँति
अपनी डरावनी गुफाओं में – साल दर साल
फैलाती मिट्टी से जन्मे इस विचार को – निकट और दूर,
- बक ह्वाइट (1874-1951) : अमेरिकी समाजवादी और लेखक
शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 577