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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 788 में से

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पृष्ठ 573

भारत में डॉ. रथफ़ोर्ड¹ के शब्द : “भारत में ब्रिटिश शासन जैसे
ब्रिटिश शासन : चलाया जा रहा है वह दुनिया में सरकार की सबसे निकृष्ट
और सबसे अनैतिक प्रणाली – एक राष्ट्र द्वारा दूसरे का शोषण – है।”
— ⚬ —
आज़ादी और “अंग्रेज़ लोग आज़ादी को स्वयं अपनी ख़ातिर ही प्यार
अंग्रेज़ लोग करते हैं। वे अन्याय की सभी कार्रवाइयों से घृणा करते हैं,
सिवाय उनके जो वे स्वयं करते हैं। वे ऐसे आज़ादी-प्रेमी लोग
हैं कि कांगो में दख़लअन्दाज़ी करते हैं, और बेल्जियनों पर “शर्म-शर्म” चिल्लाते
हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि उनकी एड़ियाँ भारत की गर्दन पर हैं।”
— एक आयरिश लेखक²
पृष्ठ 14 (11)
भीड़ का प्रतिशोध
...“अब आइये हम देखें कि कैसे लोग इस ढंग से सज़ा देने के विचार के
कायल हुए।
“वे इसे उन्हीं सरकारों से सीखते हैं जिनके अन्तर्गत वे जी रहे होते हैं, और
बदले में वही सज़ा देते हैं जिसको भोगने के वे आदी हो चुके होते हैं। सूली पर
टँगे सिर, जो वर्षों तक टेम्पल बार के ऊपर लगे रहे, पेरिस में सूली पर टाँगे जाने
वाले सिरों के दृश्य की भयावहता से तनिक भी भिन्न नहीं थे; फिर भी अंग्रेज़
सरकार ने यही किया। शायद कहा जा सकता है कि इससे आदमी को कोई ख़ास
फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मरने के बाद उसके साथ क्या किया जाता है; लेकिन जीवितों
को इससे काफ़ी फ़र्क़ पड़ता है, इससे या तो उनकी भावनाएँ विदीर्ण हो जाती हैं
या उनके दिल पत्थर हो जाते हैं, और दोनों ही सूरतों में, यह उन्हें शिक्षित करता
है कि जब सत्ता उनके हाथ में आये तो वे कैसे सज़ा दें।
“तब कुल्हाड़ी से जड़ पर ही प्रहार करो, और सरकारों को मानवता सिखा
दो। ये उनकी खूँखार सज़ाएँ ही हैं जो मानवजाति को भ्रष्ट करती हैं...। जनसामान्य
के सामने प्रदर्शित इन क्रूर दृश्यों का प्रभाव संवेदनशीलता को ख़त्म करने या
प्रतिशोध भड़काने के रूप में सामने आता है, तथा विवेक के बजाय आतंक के

  1. डॉ. वी.एच. रदरफ़ोर्ड की पुस्तक मॉडर्न इण्डिया : इट्स प्रोब्लम्स एण्ड देयर सोल्यूशंस,
    लन्दन, 1927 से
  2. सम्भवतः उपरोक्त पुस्तक में उद्धृत
    शहीदेआज़म की जेल नोटबुक / 567