भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
दस मई का शुभ दिन
अप्रैल, 1928 में 'किरती' के 1857 के ग़दर सम्बन्धी अंक में '10 मई का
शुभ दिन' नाम से लेख छपा। इसके लेखक का नाम तो नहीं दिया गया, लेकिन यह
शहीद भगतसिंह के साथियों का ही लेख है। सम्भवतः भगवतीचरण वोहरा का। वे
बहुत अच्छे लेखक थे और 'किरती' से गहरे रूप में जुड़े हुए थे। मार्च, 1925 से
लेकर जुलाई 1928 तक भगतसिंह ने 'किरती' के सम्पादकीय विभाग में बहुत ही
लगन से काम किया था। यह लेख उसी समय छपा था। – स.
“ओ दर्दवाले दिल, दर्द हों चाहे हज़ार
दस मई का दिन भुलाना नहीं,
इसी रोज़ छिड़ी 'आज़ादी की जंग'
वक़्त खुशी का ग़मी लाना नहीं।”
दस मई वह शुभ दिन है जिस दिन कि 'आज़ादी की जंग' शुरू हुई थी।
भारतवासियों का गुलामी की ज़ंजीरें तोड़ने के लिए यह प्रथम प्रयास था। यह प्रयास
भारत के दुर्भाग्य से सफल नहीं हुआ, इसीलिए हमारे दुश्मन इस 'आज़ादी की जंग'
को 'ग़दर' और बग़ावत के नाम से याद करते हैं और इस 'आज़ादी की जंग' में
लड़ने वाले नायकों को कई तरह की गालियाँ देते हैं। विश्व के इतिहास में ऐसी
कई घटनाएँ मिलती हैं, जहाँ आज़ादी की जंग को कई बुरे शब्दों में याद किया जाता
है। कारण यही है कि वह जंग जीती न जा सकी। यदि विजय हासिल होती तो
उन जंगों के नायकों को बुरा-भला न कहा जाता, बल्कि वे विश्व के महापुरुषों
में माने जाते और संसार उनकी पूजा करता।
आज दुनिया गैरीबाल्डी और वाशिंगटन की क्यों बढ़ाई व इज़्ज़त करती है,
इसलिए कि उन्होंने आज़ादी की जंग लड़ी और उसमें सफल हुए। यदि वे सफल
न होते तो वे भी 'बाग़ी' और 'ग़दरी' आदि भद्दे शब्दों में याद किये जाते। लेकिन
वे सफल हुए, इसलिए वे महापुरुषों में माने जाने लगे। इसी तरह यदि 1857 की
आज़ादी की जंग में ताँत्या टोपे, नाना साहिब, झाँसी की महारानी, कुमार सिंह
(कुँवर सिंह), और मौलवी अहमद साहिब आदि वीर जीत हासिल कर लेते तो
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 171
आज वे हिन्दुस्तान की आज़ादी के देवता माने जाते और सारे हिन्दुस्तान में उनके
सम्मान में राष्ट्रीय त्यौहार मनाया जाता।
हिन्दुस्तान के मौजूदा इतिहासों को, जोकि हमारे हाथों में दिये जाते हैं, पढ़कर
हिन्दुस्तानियों के दिलों में उन शूर-वीरों के लिए कोई अच्छी भावनाएँ पैदा नहीं
होतीं, क्योंकि उन 'आज़ादी की जंग' के नायकों को क़ातिल, डाकू, खूनी, धार्मिक
जनूनी व अन्य कई बुरे-बुरे शब्दों में याद किया गया है और उनके विरोधियों को
राष्ट्रीय नायक बनाया गया है। कारण यह है कि 1857 की 'आज़ादी की जंग' के
जितने इतिहास लिखे गये हैं, वे सारे के सारे ही या तो अंग्रेज़ों ने लिखे हैं जोकि
ज़बरदस्ती तलवार के ज़ोर पर, लोगों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ हिन्दुस्तान पर क़ब्ज़ा
जमाये बैठे हैं और या अंग्रेज़ों के चाटुकारों ने। जहाँ तक हमें पता है, इस आज़ादी
की जंग का एकमात्र स्वतन्त्र इतिहास लिखा गया, जोकि बैरिस्टर सावरकर ने
लिखा था और जिसका नाम '1857 की आज़ादी की जंग का इतिहास' (The
history of the Indian war of Independence of 1857) था। यह इतिहास बड़े
परिश्रम से लिखा गया था और इण्डिया ऑफिस की लाइब्रेरी से छान-बीनकर, कई
उद्धरण दे-देकर सिद्ध किया गया था कि यह राष्ट्रीय संग्राम था और अंग्रेज़ों के
राज से आज़ाद होने के लिए लड़ा गया था। लेकिन अत्याचारी सरकार ने इसे छपने
ही नहीं दिया और अग्रिम रूप से ज़ब्त कर लिया। इस तरह लोग सच्चे हालात पढ़ने
से वंचित रह गये।
इस जंग की असफलता के बाद जो ज़ुल्म और अत्याचार निर्दोष हिन्दुस्तानियों
पर किया गया, उसे लिखने की न तो हमारे में हिम्मत है और न ही किसी और
में। यह सबकुछ हिन्दुस्तान के आज़ाद होने पर ही लिखा जायेगा। हाँ, यदि किसी
को इस ज़ुल्म, अत्याचार और अन्याय का थोड़ा-सा नमूना देखना हो तो उन्हें मिस्टर
एडवर्ड थामसन की पुस्तक, 'तस्वीर का दूसरा पहलू' (The Other Side of the
Medal) पढ़नी चाहिए, जिसमें उसने सभ्य अंग्रेज़ों की करतूतों को उघाड़ा है और
जिसमें बताया गया है कि किस तरह नील हेवलाक, हडसन कूपर और लारेन्स ने
निर्दोष हिन्दुस्तानी स्त्री-बच्चों तक पर ऐसे-ऐसे कहर ढाये थे कि सुनकर रोंयें खड़े
हो जाते हैं और शरीर काँपने लगता है!
लेकिन इस बात का ख़याल करके स्वतन्त्र व्यक्तियों को शर्म आयेगी कि वे
लोग भी, जिनके बुजुर्ग इस जंग में लड़े थे, जिन्होंने हिन्दुस्तान की आज़ादी की
बाज़ी पर सबकुछ लगा दिया था और जिन्हें इस पर गर्व होना चाहिए था, वे भी,
इस जंग को आज़ादी की जंग कहने से डरते हैं। कारण यह कि अंग्रेज़ी अत्याचार
ने उन्हें इस क़दर दबा दिया था कि वे सर छुपाकर ही दिन काटते थे। इसलिए
उन बुजुर्गों की यादगार मनानी या स्थापित करनी तो दूर, उनका नाम लेना भी गुनाह
समझा जाता था।
172 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
लेकिन हालात कुछ ऐसे बन गये कि जिनसे विदेशों में बसे हिन्दुस्तानी
नौजवान 10 मई के दिन को राष्ट्रीय त्यौहार बनाकर मनाने लगे। और कुछ हिन्दी
(हिन्दुस्तानी) नौजवान यहाँ भारत में भी यही त्यौहार मनाने की कुछ कोशिशें करते
रहे हैं। सबसे पहले, जहाँ तक पता चलता है, यह त्यौहार इंग्लैण्ड में 'अभिनव
भारत' ने बैरिस्टर सावरकर के नेतृत्व में सन् 1907 में मनाया। इस त्यौहार को मनाने
का ख़याल कैसे आया, वह कथा इस तरह है (गुलामों में खुद तो ऐसे यादगारी-दिन
मनाने के ख़याल कम ही पैदा होते हैं) –
“1907 में अंग्रेज़ों ने विचार किया कि 1857 के ग़दरियों पर जीत हासिल
करने की पचासवीं वर्षगाँठ मनानी चाहिए। 1857 की याद ताज़ा करने के लिए
हिन्दुस्तान और इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध अंग्रेज़ों के अख़बारों ने अपने-अपने विशेषांक
निकाले, ड्रामे किये गये और लैक्चर दिये गये और हर तरह से इन कथित ग़दरियों
को बुरी तरह कोसा गया। यहाँ तक कि जो कुछ भी इनके मन में आया, सब
ऊल-जलूल इन्होंने ग़दरियों के ख़िलाफ़ कहा और कई कुफ़्र किये। इन गालियों
और बदनाम करने वाली कार्रवाई के विपरीत सावरकर ने 1857 के हिन्दुस्तानी
नेताओं – नाना साहिब, महारानी झाँसी, ताँत्या टोपे, कुँवर सिंह, मौलवी अहमद
साहिब की याद मनाने के लिए काम शुरू कर दिया, ताकि राष्ट्रीय जंग के
सच्चे-सच्चे हालात बताये जायें। यह बड़ी बहादुरी का काम था और शुरू भी
अंग्रेज़ी राजधानी में किया गया। आम अंग्रेज़ नाना साहिब और ताँत्या टोपे को शैतान
के वर्ग में समझते थे, इसलिए लगभग सभी हिन्दुस्तानी नेताओं ने इस आज़ादी की
जंग को मनाने वाले दिन में कोई हिस्सा न लिया। लेकिन मि. सावरकर के साथ
सभी नौजवान थे। हिन्दुस्तानी घर में एक बड़ी भारी यादगारी मीटिंग बुलायी गयी।
उपवास किये गये और क़समें ली गयीं कि उन बुजुर्गों की याद में एक हफ़्ते तक
कोई ऐयाशी की चीज़ इस्तेमाल नहीं की जायेगी। छोटे-छोटे पैम्फ़लेट 'ओह शहीदो'
(Oh! Martyrs) नाम से इंग्लैण्ड और हिन्दुस्तान में बाँटे गये। छात्रों ने आक्सफ़ोर्ड,
कैम्ब्रिज और उच्चकोटि के कॉलेजों में छातियों पर बड़े-बड़े, सुन्दर-सुन्दर बैज
लगाये जिन पर लिखा था, '1857 के शहीदों की इज़्ज़त के लिए।' गलियों-बाज़ारों
में कई जगह झगड़े हो गये। एक कॉलेज में एक प्रोफ़ेसर आपे से बाहर हो गया
और हिन्दुस्तानी विद्यार्थियों ने माँग की कि वह माफ़ी माँगे, क्योंकि उसने उन
विद्यार्थियों के राष्ट्रीय नेताओं का अपमान किया है और विरोध में सारे के सारे
विद्यार्थी कॉलेज से निकल आये। कई की छात्रवृत्तियाँ मारी गयीं, कइयों ने इन्हें खुद
ही छोड़ दिया। कइयों को उनके माँ-बाप ने बुलवा लिया। इंग्लिस्तान में राजनीतिक
वायुमण्डल बड़ा गर्म हो गया और हिन्दुस्तानी सरकार बड़ी हैरान व बेचैन हो गयी।”
(बैरिस्टर सावरकर का जीवन, पृष्ठ 45-46, चित्रगुप्त रचित)
इन हालात की ख़बर जहाँ भी पहुँची, विदेशों में, वहाँ-वहाँ दस मई का दिन
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 173
बड़ी सज-धज से मनाया गया और लोगों में बड़ा जोश आ गया कि अंग्रेज़ किस
प्रकार हमारे राष्ट्रीय वीरों को बदनाम करते हैं। उन्होंने रोष के रूप में मीटिंगें कीं
और उनकी याद में 10 मई का दिन हर वर्ष मनाना शुरू कर दिया। काफ़ी समय
बाद अभिनव भारत सोसायटी टूट गयी और इंग्लैण्ड में यह दिन मनाना बन्द हो
गया, लेकिन कुछ समय बाद अमेरिका में हिन्दुस्तान ग़दर पार्टी स्थापित हो गयी
और उसने उसे हर बरस मनाना शुरू कर दिया। ग़दर पार्टी के स्थापित होने के दिन
से लेकर अब तक अमेरिका में यह दिन सज-धज से मनाया जाता है। बड़ी भारी
मीटिंग होती है, जिसमें सब हिन्दुस्तानी एकत्र होते हैं। उसमें इन 1857 के शूरवीरों
के जीवन और कारनामे बताये जाते हैं। इस तरह इन शहीदों की याद साल दर साल
ताज़ा की जाती है और ऐसी कविताएँ –
‘ओ दर्द-मन्द दिल, दर्द दे चाहे हज़ार
दस मई का दिन भुलाना नहीं।
इस रोज़ छिड़ी जंग आज़ादी की
बात खुशी की ग़मी लाना नहीं।’
आदि पढ़ी जाती हैं। विशेषतः 1914-15 में ये पंक्तियाँ प्रत्येक पुरुष की जीभ
पर चढ़ी हुई थीं, क्योंकि उस समय वे एक और आज़ादी की जंग लड़कर
हिन्दुस्तान को आज़ाद करवाना चाहते थे। लेकिन वह प्रयास भी असफल हुआ,
जिसमें हज़ारों नौजवानों ने भारतमाता पर शीश वार दिये, लेकिन हमारी गुलामी को
न काटा जा सका।
दस मई का दिन क्यों मनाया जाता है? इसका कारण यह है कि दस मई के
दिन ही असली जंग शुरू हुई थी। 10 मई को मेरठ छावनी के 85 वीरों ने चर्बी
वाले कारतूस इस्तेमाल करने से इन्कार कर दिया था। उनका कोर्ट मार्शल किया
गया और प्रत्येक जवान को 10 साल सख़्त कैद की सज़ा दी गयी। बाद में ग्यारह
सिपाहियों की कैद कम कर पाँच साल कर दी गयी थी। लेकिन यह सारी कार्रवाई
ही इस तरीक़े से की गयी थी कि जिसमें हिन्दुस्तानी सिपाहियों के गर्व और मान
को भारी चोट पहुँचती थी, वह दृश्य बड़ा दर्दनाक था। देखने वालों की आँखों से
टप-टप आँसू गिरते थे। सारे के सारे बुत बने हुए थे। वे 85 सिपाही जो उनके भाई
थे, सब दुखों-सुखों में शरीक थे, उनके पैरों में बेड़ियाँ डाली हुई थीं। उनका
अपमान सहन करना मुश्किल था, लेकिन कुछ बन नहीं सकता था।
अगले दिन “घुड़सवार और पैदल सेना ने जाकर जेल तोड़ दी, अपने साथियों
को छुड़ा लिया, अफ़सरों के घरों को फूँक डाला। जिस यूरोपीय को पकड़ सके,
उसे मार डाला और दिल्ली की ओर चढ़ाई कर दी। ग़दर का आरम्भ इसी दिन
हुआ और 10 मई से ही गिना जाता है।”
(ऑक्सफ़ोर्ड हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया, पृष्ठ 715)
174 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सो पाठकों ने ऊपर लिखी घटनाओं से देख लिया है कि दस मई का दिन
क्यों और कब से मनाना शुरू किया गया। पाठक यह सब हाल पढ़कर देख सकते
हैं कि उनका क्या फ़र्ज़ है। क्या उन्होंने उस आज़ादी के लिए, जिसलिए कि
हज़ारों-लाखों हिन्दुस्तानियों ने सर लगा दिये थे और हज़ारों लगाने के लिए तैयार
बैठे थे, आज तक कुछ किया है या नहीं? यदि आज तक उन्होंने कुछ नहीं किया
तो वे कौन-सा मुहूर्त देख रहे हैं? आज़ादी की जंग में शामिल होने के लिए तो
साल के 365 दिनों में से 365 ही पवित्र हैं। हर पल भारतमाता तुम्हारा इन्तज़ार
कर रही है कि तुम उसकी ज़ंजीरें तोड़ने के लिए अपना फ़र्ज़ पूरा करते हो या
नहीं। क्या इन्सान बनकर आज़ादी हासिल करोगे? इसी सवाल के जवाब से भारत
का भविष्य निर्भर करता है।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 175
भाई बालमुकुन्द जी
अगस्त, 1928 के 'किरती' में प्रकाशित यह लेख भगतसिंह या उनके किसी
साथी का लिखा हुआ है। – स.
अब तक हम पंजाबी शहीदों के जीवन 'किरती' में बिना क्रम के ही छापते रहे
हैं। कभी बब्बर अकाली शहीदों के जीवन छापे तो कभी 1914-15 वाले ग़दर पार्टी
के शहीदों के। कभी 1908 वाले मदनलाल जी का ही जीवन छापा। अब हमारा
इरादा है कि उनके जीवन-वृत्तान्त को उसी तरह छापते हुए भी उन आन्दोलनों का
क्रमशः हाल लिखें ताकि हमारे पाठक समझ सकें कि पंजाब में जागृति कैसे पैदा
हुई और फिर काम कैसे होता रहा और किन कामों के लिए, किन विचारों के लिए,
उन शहीदों ने अपने प्राण तक उत्सर्ग कर दिये।
वास्तव में अब का आन्दोलन 1907 से ही चलता है और फिर वह कभी
किसी रंग में और कभी किसी ढंग से चलता चला गया। 1907 में बड़ा भारी
आन्दोलन हुआ। जोश में आये लोगों ने कई जगह दंगे, झगड़े किये, उनकी कुछ
बातें सरकार ने मान लीं और फिर आन्दोलन को कुचल डाला। बाद में 1908-09
में लिटरेचर पैदा करने और अच्छे-अच्छे विचारों को पक्का करने का काम होता
रहा। बाद में एक खुफ़िया सोसायटी बन गयी, जिसका परिणाम दिल्ली बम केस
से प्रकट हुआ। इसमें चार सज्जनों – श्री अमीरचन्द जी, श्री अवध बिहारी, श्री
बालमुकुन्द जी और श्री बसन्तकुमार बिस्वास को फाँसी हुई। बाद में कामागाटामारू
की बजबज घटना हो गयी और 1914-15 यानी अगले ही वर्ष ग़दर-लहर की
रौनक हुई और तीन-चार साल तक यही हंगामा रहा। 1919 में विद्रोह हुए और
मार्शल लॉ लगा। फिर असहयोग आन्दोलन चला और अकाली आन्दोलन चले और
आख़िर में बब्बर अकाली आन्दोलन चला, जिसमें 10-12 लोग फाँसी पर लटकाये
गये या लड़ते-लड़ते शहीद हो गये। पंजाब में बलिदानों और आन्दोलनों का इतिहास
हिन्दुस्तान में सब प्रान्तों से अधिक सुन्दर और गर्व योग्य है, लेकिन अफ़सोस है
कि उसे अभी तक किसी ने क्रमिक रूप में लिखा ही नहीं।
आज हम दिल्ली-षड्यन्त्र के शहीद, शहीद भाई बालमुकुन्द जी का जीवन
लिख रहे हैं। अगली बार हम दिल्ली-षड्यन्त्र का इतिहास भी देंगे और हम उनके
176 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
साथ के और शहीदों के हालात भी लिखेंगे।
श्री गुरु तेगबहादुर साहब की जब औरंगज़ेब ने दिल्ली में हत्या करवायी थी
तब उनके साथ एक ब्राह्मण भाई मतिदास भी थे और उन्हें भी आरे से चीरकर
शहीद किया गया था। तब से इनके ख़ानदान को भाई का ख़िताब मिला हुआ है।
भाई बालमुकुन्द जी इसी ख़ानदान में से थे। आप करियाला ज़िला झेलम के रहने
वाले थे। भाई परमानन्द जी के चाचा के लड़के थे। आपने बी.ए. तक शिक्षा प्राप्त
की थी।
आप तब जोधपुर के राजा के लड़कों को पढ़ाते थे, जब आपको गिरफ़्तार
किया गया था। वहाँ आपके घर की तलाशी ली गयी। आपके गाँव में भी घर की
तलाशी हुई, लेकिन कोई चीज़ ऐसी न मिली जिससे कि आपके ख़िलाफ़ कुछ
साबित किया जा सके।
वास्तव में 1907 में जो आन्दोलन चला था उसके साथ ही कुछ आदमियों
में जोश भर गया था। 1908 की भारतमाता बुक सोसायटी और लाला हरदयाल के
प्रचार ने भी कुछ और रंग चढ़ा दिया। उसके बाद बंगाल के एक-दो आदमी इधर
आये। उन्होंने इनमें बहुत-से नौजवानों को एक ख़ुफ़िया पार्टी में शामिल किया।
1910 में श्री रासबिहारी बोस ने आकर पंजाब का काम स्वयं संगठित किया,
जिसमें कि भाई बालमुकुन्द को ही लाहौर का जत्थेदार नियत किया गया।
दिसम्बर, 1912 में दिल्ली में वायसराय का जुलूस निकल रहा था। बड़ी
शानो-शौक़त, बड़ी रौनक और हो-हल्ला मचा हुआ था। चाँदनी चौक में से जुलूस
जा रहा था। वायसराय लॉर्ड हार्डिंग चौकी पर सवार थे। अचानक एक ओर से बम
गिरा। वायसराय घायल हो गया और एक नौकर मर गया। बड़ा शोर हुआ। बड़े
हाथ-पाँव मारे गये, लेकिन कुछ पेश न चली। कुछ पता न चला कि यह काम
किसने किया। पाँच-छह महीने गुज़र गये। लाहौर के लारेन्स गार्डन के मिण्टगुमरी
हॉल में गोरों का नाच हो रहा था। हॉल से बाहर एक बम फट गया। इससे एक
हिन्दुस्तानी चपरासी मर गया। उस समय कोई गिरफ़्तारी न हो सकी। फिर कहा
जाता है कि एक बम लाहौर के क़िले में चला, उसका भी कुछ पता न चल सका।
लारेन्स बाग़ के बम चलने से कोई सात-आठ महीने बाद बंगाल में किसी
जगह तलाशी थी। अवधबिहारी का दिल्ली का पता हाथ लग गया। उनकी तलाशी
हुई और एक पत्र लाहौर से आया पकड़ा गया। उस पर मेहर सिंह के दस्तख़त थे।
पूछने पर उन्होंने बता दिया कि यह पत्र दीनानाथ का लिखा हुआ है। कई दीनानाथ
लाहौर में पकड़े गये। आख़िर में असली दीनानाथ भी मिल गया, जिसने कुछ दिनों
में पूरा भेद खोल दिया और सरकारी वायदा-माफ़ गवाह बन गया। उसके बयान
से कोई बारह आदमी और पकड़े गये। जोधपुर से भाई बालमुकुन्द जी भी पकड़े
गये।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 177
दिल्ली में मुक़दमा चला। सबसे बड़ा आरोप था, ‘लारेन्स गार्डन का बम और
तख़्ता पलटने के परचों की योजना।’ भाई बालमुकुन्द चूँकि लाहौर के जत्थेदार थे
और बड़े योग्य व कट्टर देशभक्त थे, इसलिए आपके ख़िलाफ़ कुछ भी सबूत न
होने के बावजूद फाँसी की सज़ा दे दी गयी।
चीफ़ कोर्ट का जज अपील के फैसले में स्वयं लिखता है –
"Firstly, it is pointed out rightly enough that the search of his houses
at Jodhpur and Karyala, his home in the Jhelum district, failed to reveal
anything in his possession any conditions literature. Secondly admit-
tedly he had no direct connection with the Lahore bomb outrage or the
July leaflets."
यानी, यह तर्क पेश किया गया है कि उनके घरों की तलाशी से कोई काग़ज़
ऐसा नहीं निकला जोकि विद्रोह का प्रचार करने वाला हो। और दूसरी बात यह भी
ठीक है कि लाहौर बम से और जुलाई में बाँटे गये तख़्ता पलट परचों से भी उनका
कोई सम्बन्ध प्रमाणित नहीं होता और इस मुक़दमे में और किसी बम का ज़िक्र
भी नहीं, फिर भी उन्हें मौत की सज़ा क्यों दी गयी? जज लिखता है कि क्या हुआ
यदि उनसे लाहौर में बम चलाने से पहले नहीं पूछा गया, क्या हुआ कि यदि वे
उन दिनों लाहौर में नहीं थे, क्या हुआ यदि इस बात का भी प्रमाण नहीं कि बाद
में भी उन्हें बम चलाने की ख़बर दी गयी। आख़िर वह षड्यन्त्र का सदस्य तो था
ही, वह साज़िश में शामिल तो हो ही चुका था। बस, इसी से वह हत्या का ज़िम्मेदार
है और क़ानून के अनुसार उसे फाँसी की सज़ा मिलनी चाहिए। क़ानून की
विशेषताओं का अब क्या ज़िक्र करें? हद ही हो गयी है। आपको फाँसी की सज़ा
दी गयी, क्योंकि आप बड़े कट्टर तख़्ता पलटने वाले थे और बड़े योग्य थे।
देशभक्ति की भावना बड़े ज़ोरों से भरी हुई थी और दूसरी बात यह थी कि दिल्ली
बम के चल जाने के बाद भी उसके चलाने वालों का पता न चल सकने से सरकार
का रोब ख़त्म हो गया था। O-Dyer (ओडायर) नया-नया लाट बनकर आया था,
वह यह बरदाश्त नहीं कर सका। वह सारा क्रोध इसी मुक़दमे में निकाला गया।
एक सज्जन बड़े सुन्दर शब्दों में ओडायर की पॉलिसी का ज़िक्र करते थे। वे कहते
हैं कि ओडायर की पॉलिसी थी –
"Guilty or not guilty, a few must be punished to maintain the
prestige of the Govt."
यानी, चाहे अपराधी हों या निर्दोष कुछ आदमियों को सज़ा ज़रूर दी जाये,
ताकि सरकार के रोब में कमी न हो।
ख़ैर! आपको फाँसी की सज़ा हुई। आपने बड़ी प्रसन्नता से सुनी। अपील
ख़ारिज हो चुकने के बाद आपको 1915 में फाँसी पर लटका दिया गया। लोग बताते
हैं कि आप बड़े चाव से दौड़े-दौड़े गये। फाँसी के तख़्ते पर चढ़ गये और अपने
178 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हाथों से ही फाँसी की रस्सी को गले में डाल लिया।
भाई बालमुकुन्द जी की अपनी शहादत बड़ी ऊँची और पूजा योग्य है, लेकिन
उनके बलिदान को उनकी धर्मपत्नी के अतुलनीय प्रेम से, सती होने से और भी
चार चाँद लग गये।
भाई बालमुकुन्द जी जेल में बन्द थे। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती रामरखी उनसे
मिलने आयीं। पूछा, “रोटी कैसी मिलती है?” उत्तर मिला, “आधी रेत और आधे
आटे की जली हुई और बिल्कुल कच्ची रोटी मिलती है।” नमूना ले लिया। घर
जाकर वैसा आटा तैयार किया, वैसी ही रोटी पकायी। कहा – “जब मेरे प्रीतम
आप ऐसी रोटी खाते हैं तो मैं इससे अच्छी कैसे खा सकती हूँ।” वैसी ही रोटी
खाती रहीं। फिर एक बार मुलाक़ात हुई। पूछा, “इतनी सख्त़ गर्मी में सोते कहाँ हैं?”
जवाब मिला, “अँधेरी कोठरी में, सख्त़ गर्मी में दो कम्बल मिलते हैं।” घर आ
गयीं। घर की सबसे पिछली कोठरी में जाकर सो गयीं। मच्छर काट-काटकर खाते
थे। क्या करतीं? वहीं सोना था। सखी-सहेलियों ने कहा, “पगली, यह भी कोई
ज़िन्दा रहने वालों का तरीक़ा है?” श्रीमती रामरखी ने पूछा, “तो क्या ऐसे रहने वाले
बचते नहीं?” सखियों ने कहा, “और क्या। इस तरह करने वाले भी क्या बचे हैं?”
उनकी आँखें भर आयीं। सहेलियाँ चुप होकर बैठ गयीं, वह वहीं सोती रहीं। एक
दिन वे भीतर निढाल पड़ी थीं कि बाहर से औरतों के रोने-चिल्लाने की आवाजें
आयीं। सब समझ लिया कि उनके प्रीतम भाई बालमुकुन्द जी को फाँसी हो चुकी
है। उनकी लाश भी नहीं दी गयी। उठीं। नहायी-धोयी, सुन्दर-सुन्दर कपड़े और
आभूषण पहनकर फ़र्श पर उनके ध्यान में मग्न होकर बैठ गयीं। फिर वे उठीं नहीं।
धन्य थे भाई बालमुकुन्द और धन्य श्रीमती रामरखी। उन्होंने हिन्दुस्तानी क्रान्ति को
कितना सुन्दर बना दिया।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 179
दिल्ली-केस के शहीद!
सितम्बर, 1928 के 'किरती' में प्रकाशित। - स.
पिछली बार हमने दिल्ली-साज़िश का कुछ हाल भाई बालमुकुन्द जी के जीवन
से दिया। भाई बालमुकुन्द जी, जैसाकि पिछली बार बताया गया था, गिरफ़्तारी के
समय महाराजा जोधपुर के लड़कों को पढ़ाते थे। एक दिन मोटर में राजकुमार के
साथ बैठे सैर को जा रहे थे कि अंग्रेज़ अधिकारी उनके गिरफ़्तारी के वारण्ट लेकर
पहुँच गया। वहीं गिरफ़्तार कर लिये गये। वहीं आपके घर की तलाशी ली गयी।
सरकारी गवाह दीनानाथ ने पहले ही जो बयान दिया था, उसके मुताबिक़ भाई
बालमुकुन्द जी पंजाब के नेता चुने गये थे और उन्हें दो बम दिये गये थे। दीनानाथ
के कथनानुसार वे दो बम भाई बालमुकुन्द जी के पास ही थे। कहीं लौटाये नहीं
गये। इसी ख़याल में घर की तलाशी हुई। सारा घर कमर तक खोद डाला गया।
छतें उधेड़ दी गयीं, लेकिन बम नहीं मिले। ख़ैर! उनके पास से कोई काग़ज़-पत्र
भी ऐसा-वैसा नहीं मिला, जिससे कोई ख़ास सबूत मिल सकता, लेकिन फिर भी
उन्हें फाँसी की सज़ा मिली। भाई बालमुकुन्द जी पहले लाला लाजपतराय के अछूतों
के कार्यक्रम में काम करते रहे थे और पहाड़ों में जहाँ कि छूत-छात बहुत मानी
जाती है, वहीं वे प्रचार के लिए निकल गये थे। वहाँ के उनके साथी उनकी योग्यता
की बड़ी प्रशंसा करते हैं।
मास्टर अमीरचन्द जी
इस केस में चार आदमियों को फाँसी की सज़ा हुई थी। उनमें से मास्टर अमीरचन्द
जी कोई 50 साल की उम्र के थे। वे बड़े लायक और योग्य आदमी थे। आप
दिल्ली के रहने वाले थे। उच्च शिक्षा प्राप्त थे। बड़े धर्मात्मा थे। मिशन स्कूल,
दिल्ली में पढ़ाते थे। आपके दिल में हिन्दुस्तान की उन्नति का बहुत ख़याल था।
आप उर्दू और अंग्रेज़ी के बड़े अच्छे लेखक थे। पहले जब स्वामी रामतीर्थ पंजाब
में आये तब आपने उनके धार्मिक और देशभक्तिपूर्ण विचारों का प्रचार बड़े ज़ोरों
से किया। आपने 'ख़तूते राम' आदि कई पुस्तकें छपवायीं। बाद में लाला हरदयाल
जी एम.ए. अपनी छात्रवृत्ति छोड़ विलायत से अंग्रेज़ी शिक्षा का बहिष्कार कर भारत
180 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
लौट आये। आपने यहाँ आकर एक तरह के संन्यासी वालण्टियर पैदा करने का
विचार किया और उन्होंने बहुत-से विद्यार्थियों को शिक्षा से हटाया और उन्हें साथ
लेकर संन्यासी जीवन व्यतीत करने लगे। 1908 के आख़िर में ही लाला हरदयाल
को हिन्दुस्तान छोड़कर चले जाना पड़ा। सरकार कहती है कि जब वे जाने लगे तो
उन्होंने अपनी सम्पत्ति मा. अमीरचन्द जी के हवाले कर दी, जिन्होंने कि उनकी
शिक्षा जारी रखी। पहले-पहल दीनानाथ और जितेन्द्रनाथ चटर्जी उनके पास गये।
बाद में अवधबिहारी आदि से उनका परिचय हुआ। लेकिन असल में तो
अवधबिहारी पहले ही दिल्ली के रहने वाले थे और पहले से ही परिचित थे। ख़ैर!
मास्टर अमीरचन्द बड़े ज़िन्दादिल, बड़े नेकदिल और कट्टर आज़ादी-परस्त
थे। आप कहा करते थे कि दिल्ली में ‘बन्दर मास्टर’ का घर पूछते ही मेरा घर
मिल जायेगा।
दिल्ली में वायसराय पर बम चल गया, लेकिन सरकार हाथ मलती रह गयी।
कुछ भी पता न चला। बाद में एक बम लाहौर लारेन्स गार्डन में चल गया, लेकिन
उसका भी कुछ पता न चला। आख़िर राजा बाज़ार, कलकत्ता की तलाशी में श्री
अवधबिहारी का नाम व पता निकल आया। मा. अमीरचन्द को पहले ही शक की
निगाह से देखा जाता था। अवधबिहारी उन्हीं के पास रहते थे।
एक दिन अवधबिहारी की तलाशी हुई। बम की टोपी मिल गयी और लाहौर
का एक पत्र मिल गया, जिस पर कि मेहर सिंह की ओर से एम.एस.आई. दस्तख़त
किये गये थे। पूछने पर आपने बता दिया कि यह ख़त दीनानाथ की ओर से है।
दीनानाथ की गिरफ़्तारी की गयी। वह फूट पड़ा और उसने वह सारा भेद खोल
दिया। उसने बताया कि लारेन्स गार्डन का बम श्री अवधबिहारी और वसन्तकुमार
ने रखा था। ख़ैर, मुक़दमा चला।
मास्टर अमीरचन्द ने अपने भतीजे सुल्तानचन्द को उत्तराधिकारी बनाया था
और उससे अपने पुत्रों जैसा प्यार करते थे। उसे अपनी इच्छानुसार शिक्षा देते
थे। देशभक्त बनाना चाहते थे। आप पर मुक़दमा चला। वही पुत्र आपके
ख़िलाफ़ गवाह बन गया। ज़रा सोचो बेचारे मास्टर अमीरचन्द जी के बारे में,
जिसे अपना पुत्र बनाया था वही सरकारी गवाह बनकर आपके ख़िलाफ़ गवाही
दे रहा है! कैसी दर्दनाक स्थिति है। आज जब मुसीबत का समय आया तो
अपने दिल का टुकड़ा अपना पुत्र भी साथ न दे सका। उर्दू के एक शायर ने
क्या ख़ूब कहा है –
बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मेरे,
जिनपे तकिया था, वही पत्ते हवा देने लगे!
मुक़दमा चलता रहा। गवाह भुगतते रहे। सबूत मिला कि वह एक साज़िश के
सदस्य भी हैं और चूँकि वह बड़े लायक और बुद्धिमान हैं, इसलिए हत्या आदि
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 181
करने की साज़िश के लिए नौजवानों को बरगला सकते हैं और –
"One who spent his life furthering murderous schemes which he
was too timid to carry out himself."
यानी हत्या का प्रचार करने में जिसने अपनी पूरी ज़िन्दगी लगा दी, उसके बारे
में वह स्वयं साहसहीन था।
उन्हीं दिनों तख़्ता पलट पार्टी की ओर से Liberty (आज़ादी) नाम का एक
परचा बाँटा जाता था। एक परचे का मसौदा मास्टर जी के हाथ का लिखा उनके
घर में मिल गया। उसमें ऐसे वाक्य आपत्तिजनक माने गये –
We are so many that we can seize and snatch from them their
cannon.
Reforms will not do. Revolution and a general massacre of all the
foreigners specially the English will and alone can serve our purpose.
यानी, हम संख्या में इतने हैं कि हम उनकी तोपें छीन सकते हैं। ये सड़े सुधार
या योजनाएँ किसी काम नहीं आयेंगी। एक बार तख़्ता पलट दो और फिरंगी को
मार ख़त्म करो। ख़ैर, इन्हीं वाक्यों के कारण ही उन्हें बड़ा ख़ूँखार क़ातिल समझा
गया और कहा गया।
आपके चरित्र सम्बन्धी कैनन आलनट और मिस्टर एस.के. रुद्र आदि बतौर
गवाह पेश हुए। उन्होंने आपकी बहुत तारीफ़ की, लेकिन जज लिखता है कि मास्टर
अमीरचन्द्र लामिसाल देशभक्त, बड़े नेक, दर्दमन्द और ऊँचे चरित्र के थे।
मतलब यह है कि आपको उस केस में फाँसी की सज़ा दी गयी। आपने हँसते
हुए सुनी और आख़िर में बड़ी हँसी-खुशी से फाँसी पर लटककर जान दे दी।
मि. अवधबिहारी
आप बड़े होनहार नौजवान थे। बी.ए. पास कर सेण्ट्रल ट्रेनिंग कॉलेज, लाहौर से
बी.टी. पास की। आप पर कई लिबर्टी परचे लिखने का आरोप था। आपको यू.पी.
और पंजाब की पार्टी का प्रमुख नियत किया गया था। 'बन्दी जीवन' के लेखक
श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल ने आपकी बड़ी तारीफ़ की है। कहते हैं कि आप बड़े
ज़िन्दादिल थे और आमतौर पर गुनगुनाते रहते थे –
एहसान नाख़ुदा का उठाये मेरी बला,
किश्ती खुदा पे छोड़ दूँ लंगर को तोड़ दूँ।
इस शेर से ही पता चलता है कि वे कितने मस्ताने वीर थे। आप पर परचे
लिखने और लारेन्स गार्डन में बम चलाने का आरोप था। आपको भी फाँसी की
सज़ा हुई। आपने बड़ी खुशी से सुनी। कहते हैं कि फाँसी लगने के दिन आपसे पूछा
गया, "आख़िरी इच्छा क्या है?"
जवाब दिया, "यही कि अंग्रेजों का बेड़ा गर्क हो।"
182 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
कहा गया, “शान्त रहो। आज तो शान्ति से प्राण दो।” कहने वाला एक अंग्रेज़
था। उससे आपने कहा, “देखो जी! आज शान्ति कैसी? मैं तो चाहता हूँ कि आग
भड़के। चारों ओर आग भड़के। तुम भी जलो, हम भी जलें। हमारी गुलामी भी जले।
आख़िर में हिन्दुस्तान कुन्दन बनकर रहे।” आपने झट उछलकर स्वयं गले में फाँसी
का फन्दा डाल लिया। इस तरह वह वीर भी आज़ादी-देवी के चरणों में अपने प्राण
बलिदान कर गया।
जज आपके बारे में लिखता है –
"Awadh Behari is a youngman of great intellectual ability.
He stood second in the Ist division of the Punjab University B.T.
Examination."
कि अवधबिहारी (25 वर्ष का) नौजवान है और बहुत ही योग्य है। वह पंजाब
विश्वविद्यालय की बी.टी. की परीक्षा में पंजाबभर में दूसरे स्थान पर रहा है। उनके
ख़िलाफ़ यह सबूत भी पेश हुआ कि आपके साथ मास्टर अमीरचन्द का बहुत प्रेम
भी इस बात का प्रमाण है कि वे साज़िश के सदस्य थे और प्रेम का सबूत यह
है कि आपको मास्टर अमीरचन्द जी (ने) 'Dear Awadhji' (प्यारे अवध जी)
लिखा था।
श्री बसन्तकुमार बिस्वास
आप नदिया ज़िला (बंगाल) के रहने वाले नौजवान थे। आपकी उम्र 23 वर्ष थी।
अच्छे पढ़े-लिखे सज्जन थे। पहले आपको रासबिहारी अपने साथ ले आये व अपने
घर में कर्मचारी बनाकर रखा। बाद में आपको लाहौर भेज दिया गया और वहाँ वह
पापुलर डिस्पेंसरी में कम्पाउण्डर भरती हो गये। दिल्ली में बम के दिनों आप लाहौर
से कई दिन ग़ायब रहे।
कहा जाता है कि लारेन्स गार्डन का बम आपने ही अवधबिहारी के साथ
मिलकर रखा था। बाद में आप दो और बम लाये, जोकि दीनानाथ के कथनानुसार
भाई बालमुकुन्द के पास थे। दिसम्बर, 1913 में आप बंगाल लौट गये और 1914
में वहीं से पकड़कर लाहौर लाये गये। ओडायर को दिल्ली में बम चलाने वालों
का पता न चलने से बड़ा गुस्सा आ रहा था, इसीलिए जब आपको उम्रकैद की
सज़ा हुई तो उन्होंने सज़ा बढ़ाने की अपील की। ओडायर ने खुद माना है कि उसने
भी सज़ा बढ़ाने की सिफ़ारिश की। चीफ़ कोर्ट के जज ने लिखा है कि कहा जाता
है, वह कोई बहुत बुद्धिमान आदमी नहीं था। साधारण बुद्धि का आदमी था, इसलिए
उसे टूल बनाकर उससे काम लिया जाता था और वह रासबिहारी के हाथों में
खेलता था। वह ग़लत है। वह लिखता है –
"He is not a boy, for at 23 an Indian has long reached maturity....
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 183
He looked to me a man of some force of character, without the familiar
marks of weakness in his face."
यानी वह लड़का नहीं, 23 वर्ष की उम्र में हिन्दुस्तानी पूरा आदमी हो जाता
है। वह बड़ा दिलेर, समझदार और दिल का मज़बूत आदमी है। उसके चेहरे पर
कोई कमज़ोरी के निशान नज़र नहीं आते।
और इस सवाल पर कि आपका केन्द्रीय कमेटी में कोई ज़िक्र नहीं है, इसलिए
उन्हें बड़ा मामूली आदमी समझकर टूल बनाया गया था, जज कहता है –
"Basant Kumar Biswas had a long training and was quite ready for
anything, though he was kept purposely outside of the inner circle, so
that, if caught, he would not be able to give much information to his
captors."
यानी, बसन्तकुमार को चूँकि बहुत दिनों से सारा काम सिखाया गया था,
इसलिए उसे सिर्फ़ किसी ख़तरनाक काम के लिए ही अलग रखा गया था, ताकि
यदि कहीं पकड़ा भी जाये तो ज़्यादा ख़बरें न दे सके।
खैर! चीफ़ कोर्ट के जज ने आपको फाँसी की सज़ा सुना दी, और आपने बड़ी
खुशी से सुनी। एक बात ख़ास क़ाबिले-ग़ौर है कि आपके मुक़दमे के लिए बंगाल
से एक वकील मि. सेन आया था, जबकि हमारे लोगों का यह हाल था कि महात्मा
हंसराज को एक और आदमी, जिसका पुत्र इनके लड़के बलराज के साथ इसी
मामले में पकड़ा हुआ था, मिलने आया ताकि मुक़दमे सम्बन्धी सलाह कर सके।
महात्मा जी के मकान से उसे धक्के मार बाहर निकाल दिया गया और आर्यसमाज
के लाइफ़ मेम्बर या जिन्होंने अपनी पूरी उम्र आर्यसमाज को दे दी थी, ने भी उनकी
कोई मदद न की। यह बात ज़रा ख़ास क़ाबिले-ग़ौर है।
सर माइकल ओडायर कहता है कि फाँसी लगने से एक दिन पहले
बसन्तकुमार ने मान लिया था कि दिल्ली में वायसराय के ऊपर बम उसने ही फेंका
था। क्या जाने सच है या नहीं। जो भी हो, आख़िर इनमें से ही किसी का काम
था।
आपने भी बड़ी वीरता से फाँसी पर लटककर अपने प्राण देश और क़ौम की
आज़ादी के लिए बलिदान कर दिये।
184 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
शहीद खुशीराम!
अक्टूबर, 1928 के 'किरती' में प्रकाशित। - स.
1919 का वर्ष भी हिन्दुस्तान के इतिहास में हमेशा ही याद रहेगा। ताज़ी-ताज़ी
लड़ाई ख़त्म हुई थी। हिन्दुस्तानियों और विशेषतः पंजाबियों ने प्राणों पर खेलकर
अंग्रेज़ों को जीत हासिल करवायी थी, लेकिन अहंकारी अंग्रेज़ों ने अहसान का ख़ूब
बदला चुकाया। रोल्ट एक्ट पास कर दिया। तूफ़ान मच गया। पंजाब में तो ख़ासतौर
पर जोश बढ़ गया। पंजाब में तो अभी पिछले युद्ध की याद ताज़ा थी, उन्हें रोल्ट
एक्ट देखकर हद दर्जे की हैरानी हुई। हड़तालें, जुलूस व मीटिंगें होने लगीं। जोश
बहुत बढ़ा। नौबत जलियाँवाला और मार्शल लॉ तक की आ गयी।
लोग डर गये। कौन कहता था कि निहत्थों पर भी गोली चलायी जा सकती
है। आम लोगों ने गिरते-पड़ते पीठ में ही गोलियाँ खायीं। लेकिन उनमें भी
श्री खुशीराम जी शहीद ने छाती पर गोलियाँ खा-खाकर क़दम आगे ही बढ़ाया और
बहादुरी की लाजवाब मिसाल क़ायम कर दी।
आपका जन्म 27 सावन, संवंत 1957 में गाँव सैदपुर, ज़िला झेलम में लाला
भगवानदास के घर हुआ था। आपकी जाति अरोड़ा थी। पैदा होने पर आपकी
जन्म-पत्री बनायी गयी और बताया गया कि यह बालक बड़ा बहादुर और तगड़ा
होगा और इसका नाम भी ख़ूब प्रसिद्ध होगा। इसलिए उस समय आपका नाम
श्री भीमसेन रखा गया, लेकिन बाद में आप श्री खुशीराम के नाम से ही प्रसिद्ध
हुए। आप अभी बहुत छोटे ही थे, जब आपके पिता का देहान्त हो गया। आपका
ख़ानदान बहुत ग़रीब था और आपका पालन-पोषण लाहौर नवाँकोट अनाथालय में
हुआ था। वहीं पहले-पहल आपकी शिक्षा शुरू हुई। वक़्त गुज़रता चला गया। आप
फिर डी.ए.वी. कॉलेज, लाहौर में पढ़ने लगे। 1919 में 19 वर्ष की आयु में आपने
पंजाब विश्वविद्यालय से शास्त्री की परीक्षा दी थी और छुट्टियाँ बिताने जम्मू चले
गये।
सुना कि तीस मार्च के बाद महात्मा गाँधीजी ने आदेश दिया कि 3 अप्रैल को
देशभर में हड़ताल की जाय और जलसे-जुलूस निकाले जायें। आप भी लाहौर
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 185
पहुँचे। आकर पूरी तरह काम को सफल बनाने का प्रयत्न करने लगे। कॉलेजों के
लड़कों ने नंगे सिर बड़े-बड़े जुलूस ‘हाय-हाय रोल्ट एक्ट’ कहते हुए निकाले थे।
यह सब आपके ही यत्नों का फल था। दो-चार दिन बड़ी रौनक रही। 12 अप्रैल
को बादशाही मस्जिद, लाहौर में जलसा हुआ। भीड़ का कोई शुमार न था। हज़ारों
आदमी थे। गर्मागर्म भाषण हुए। धुआँधार भाषणों के बाद जुलूस बनाकर लोग शहर
को चल पड़े। हीरामण्डी जब पहुँचे और शहर में घुसने लगे, उसी समय नवाब
मुहम्मद अली सेना के साथ आगे तैनात था। उसने हुक्म दिया कि जुलूस भंग कर
दो। लेकिन वे दिन बड़े अजीब थे। श्री खुशीराम आगे-आगे झण्डा उठाये जा रहे
थे। कहा, “यह जुलूस कभी वापस नहीं लिया जा सकता और जुलूस की शक्ल
में ही शहर में घुसेगा।” नवाब ने हवा में गोली चला दी। लोग भाग छूटे। शेरमर्द
लाला खुशीराम ने गरजकर एक बार तो लोगों को ख़ूब लानत दी। कहा, “तुम्हें शर्म
नहीं आती इस तरह गीदड़ों की तरह भागते हो।” लोग एकत्र हो गये। लाला
खुशीराम आगे जा रहे थे। नवाब ने फिर गोली चलायी। इस बार गोली हवा में नहीं,
बल्कि सीधे महाशय खुशीराम की छाती में लगी। गोली लगी, आप ज़ख़्मी शेर की
तरह झपटकर आगे बढ़े। और गोली लगी तो आप और आगे बढ़े। एक-एक कर
सात गोलियाँ छाती में लगीं, लेकिन खुशीराम का क़दम आगे ही आगे बढ़ता चला
गया। आख़िर आठवीं गोली माथे के दायीं ओर और नवीं बायीं ओर आ लगी। शेर
तड़पकर गिर पड़ा। खुशीराम सदा की नींद सो गये, लेकिन आज उनका नाम ज़िन्दा
है। उनकी बहादुरी व हिम्मत आज भी उसी तरह ताज़ा है। ख़ैर!
आपकी लाश का बड़ा भारी जुलूस निकला। आम ख़याल किया जाता है कि
कम से कम पचास हज़ार लोग इस जुलूस में शामिल थे।
इस तरह उस वीर ने अपने और अपने राष्ट्र के गौरव के लिए प्राणों की बाज़ी
लगा दी और अपना नाम अमर कर गया। कुछ वर्षों बाद एक कवि ने एक बड़ी
दर्दभरी कविता लिखी थी, जिसका एक मिसरा यों है –
हाय! खुशीराम की बरसी मनाई न गयी!
क्या खुशीराम की मौत को हम भूल गये?
उसके मक़सद पे चढ़ाने को हम भूल गये।
186 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
स्वाधीनता के आन्दोलन में
पंजाब का पहला उभार
भगतसिंह ने जेल में पंजाब की राजनीतिक जागृति का इतिहास लिखा था,
जिसका निम्नलिखित अंश 1931 में लाहौर के साप्ताहिक 'बन्देमातरम्' में
धारावाहिक छपा था। यह उर्दू अनुवाद का हिन्दी रूपान्तर है। – स.
पंजाब के भूतपूर्व गवर्नर सर माइकेल ओडायर ने अपनी पुस्तक 'India: As I Saw'
में एक अप्रिय किन्तु साथ ही अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सच्चाई को प्रकट किया है। उन्होंने
कहा है कि पंजाब राजनीतिक हलचलों में सबसे पीछे है। पंजाब के राजनीतिक
आन्दोलनों का जिन्हें थोड़ा-सा भी ज्ञान है, वह इस सच्चाई को भली प्रकार समझ
सकते हैं।
आज तक का इतिहास देखिये। भारत को स्वाधीन करने के लिए सर्वाधिक
बलिदान इस प्रान्त ने किया है। इसके लिए बड़े भारी-भारी संकट इस प्रान्त की
जनता को सहन करने पड़े हैं। राजनीतिक, धार्मिक आदि आन्दोलनों में पंजाब भारत
के अन्य प्रान्तों से आगे रहा है, और देश के लिए जानो-माल की कुर्बानी सबसे
ज़्यादा इसी सूबे के लोगों ने दी है, किन्तु इस पर भी हमें सिर झुकाकर यह स्वीकार
करना पड़ता है कि राजनीतिक क्षेत्र में पंजाब सबसे पीछे है।
इसका कारण केवल यह है कि राजनीतिक आन्दोलन यहाँ की जनता के
व्यक्तिगत जीवन का एक आवश्यक अंग नहीं बन सका। साहित्यिक क्षेत्र में भी
इस प्रान्त ने यथायोग्य स्थान प्राप्त नहीं किया। शिक्षित वर्ग के लिए उस समय तक
– ओडायर के इस पुस्तक के लिखने तक – स्वदेश की स्वाधीनता का प्रश्न
सबसे अधिक आवश्यक और महत्त्वपूर्ण नहीं बना था, इसलिए बहुधा कहा जाता
है कि यह सूबा बहुत पीछे है। हिन्दुस्तान में और भी बहुत-से ऐसे सूबे हैं जो पंजाब
से बहुत पीछे हैं, किन्तु खेद है कि यह अभागा सूबा इस प्रकार के आरोप सहकर
भी पीछे ही है।
पंजाब की विशेष अपनी कोई भाषा नहीं। भाषा न होने के कारण साहित्य-
सृजन के क्षेत्र में भी कोई प्रगति नहीं हो सकी। अतः शिक्षित समुदाय को पश्चिमी
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 187
साहित्य पर ही निर्भर रहना पड़ा। इसका खेदजनक परिणाम यह हुआ कि पंजाब
का शिक्षित वर्ग अपने प्रान्त की राजनीतिक हलचलों से अलग-थलग-सा रहता
रहा। इसी कारण पंजाब के साहित्य और कला-क्षेत्र में राजनीति को स्थान नहीं मिल
सका। यही कारण है कि पंजाब में ऐसे कार्यकर्ता इने-गिने ही हैं, जो अपना सम्पूर्ण
जीवन राजनीति को दे सके हैं। इसी आधार पर इस प्रान्त पर ऐसे आरोप लगाये
जाते हैं। अपने प्रान्त की इस कमी की ओर प्रान्तीय नेताओं और पुरुष समाज का
ध्यान आकर्षित करना ही इन लेखों का उद्देश्य है।
गुरु राम सिंह जी के नेतृत्व में हुए कूका विद्रोह से लेकर आज तक पंजाब
में जो भी आन्दोलन हुए और जिस प्रकार जनता में चेतना आयी, उससे वह
स्वतन्त्रता की वेदी पर अपना सर्वसुख न्योछावर करने के लिए तैयार हो गयी। इनमें
जिन व्यक्तियों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। उनका जीवन-चरित्र तथा इतिहास
प्रत्येक स्त्री-पुरुष के साहस को बढ़ाने वाला है जिससे वह अपने अध्ययन और
अनुभवों के प्रकाश में भावी आन्दोलनों को भी भली प्रकार चला सकेंगे। इस
इतिहास को लेखबद्ध करने में मेरा यह उद्देश्य कदापि नहीं है कि भविष्य में भी
ठीक इसी प्रकार के आन्दोलन सफल हो सकेंगे। मेरा उद्देश्य तो केवल यह है कि
जनता उन शहीदों की कुर्बानियों और उनके आजीवन देश-सेवा में लगे रहने से
प्रेरणा प्राप्त करे और उनका अनुकरण करे। समय आने पर किस तरह कार्य करना
होगा, इसका फ़ैसला देश की तत्कालीन परिस्थिति को देखते हुए कार्यकर्ता स्वयं
कर सकते हैं।
पंजाब में राजनीतिक हलचलें कैसे प्रारम्भ हुईं?
सन् 1907 से पूर्व पंजाब में बिल्कुल ही खामोशी थी। विद्रोह (कूका विद्रोह)
के बाद कोई ऐसा राजनीतिक आन्दोलन नहीं उठा जो शासकों की नींद खोल
सकता। 1908 में पंजाब में पहली बार कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। किन्तु उस
समय कांग्रेस के कार्य का आधार शासकों के प्रति वफ़ादारी प्रकट करना था।
इसलिए राजनीतिक क्षेत्र में उसका कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ा। सन्
1905-06 में बंगाल-विभाजन के विरुद्ध जो शक्तिशाली आन्दोलन उठ खड़ा
हुआ था और स्वदेशी के प्रचार तथा विदेशी के बहिष्कार की जो हलचल प्रारम्भ
हुई थी, इसका पंजाब के औद्योगिक जीवन तथा साधारण जनता पर बड़ा भारी
प्रभाव पड़ा था। उन दिनों यहाँ भी (पंजाब) स्वदेशी वस्तुएँ, विशेषतः खाण्ड
तैयार करने का सवाल पैदा हुआ और देखते-देखते एक-दो मिलें भी खुल गयीं।
यद्यपि सूबे के राजनीतिक जीवन पर इसका कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा, किन्तु
सरकार ने इस उद्योग को नष्ट करने के लिए गन्ने की खेती का लगान तीन गुना
कर दिया। पहले एक बीघे का लगान केवल 2.50 रुपये था, जबकि अब साढ़े
188 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
सात रुपये देने पड़ते थे। इससे किसानों पर एक भारी बोझ आ पड़ा और वह
एकदम हतबुद्धि-से रह गये।
नया कलोनी एक्ट
दूसरी ओर सरकार ने लायलपुर इत्यादि में कई नहरें खुदवाकर और जालन्धर,
अमृतसर, होशियारपुर के निवासियों को बहुत-सी सुविधाओं का लालच देकर इस
क्षेत्र में बुला लिया था। ये लोग अपनी पुरानी ज़मीन-जायदाद छोड़कर आये और
कई वर्ष तक अपना ख़ून-पसीना एक करके इन्होंने इस जंगल को गुलज़ार कर
दिया। लेकिन अभी ये चैन भी न ले पाये थे कि नया कलोनी एक्ट इनके सर पर
आ गया। यह एक्ट क्या था, किसानों के अस्तित्व को ही मिटा देने का एक तरीक़ा
था। इस एक्ट के अनुसार हर व्यक्ति की जायदाद का वारिस केवल उसका बड़ा
लड़का ही हो सकता था। छोटे पुत्रों का उसमें कोई हिस्सा नहीं रखा गया था। बड़े
लड़के के मरने पर वह ज़मीन या अन्य जायदाद छोटे लड़कों को नहीं मिल सकती
थी, जिससे उस पर सरकार का अधिकार हो जाता था।
कोई आदमी अपनी ज़मीन पर खड़े वृक्षों को नहीं काट सकता था। उनसे वह
एक दातुन तक नहीं तोड़ सकता था। जो ज़मीनें उनको मिली थीं उन पर वह
केवल खेती कर सकते थे। किसी प्रकार का मकान या झोंपड़ा, यहाँ तक कि
पशुओं को चारा डालने के लिए खुरली तक नहीं बना सकते थे। क़ानून का
थोड़ा-सा भी उल्लंघन करने पर 24 घण्टे का नोटिस देकर तथाकथित अपराधी
की ज़मीन ज़ब्त की जा सकती थी। कहा जाता है कि ऐसा क़ानून बनाकर सरकार
चाहती थी कि थोड़े-से विदेशियों को तमाम ज़मीन का मालिक बना दिया जाये
और ज़मीन के हिन्दोस्तानी काश्तकार उनके सहारे पर रहें। इसके अतिरिक्त सरकार
यह भी चाहती थी कि अन्य प्रान्तों की भाँति पंजाब में थोड़े-से बड़े-बड़े ज़मींदार
हों और बाक़ी निहायत ग़रीब काश्तकार हों। इस प्रकार जनता दो वर्गों में विभक्त
हो जाये। मालदार कभी भी और किसी भी हालत में सरकार-विरोधियों का साथ
देने का साहस नहीं कर सकेंगे और निर्धन कृषकों को, जो दिन-रात मेहनत करके
भी पेट नहीं भर सकेंगे, इसका अवसर ही नहीं मिलेगा। इस प्रकार सरकार खुले
हाथों जो चाहेगी, करेगी।
अशान्ति के बीज
उन दिनों उत्तर प्रदेश और बिहार वग़ैरह सूबों में किसानों की हालत ऐसी ही है
(थी) लेकिन पंजाब के लोग जल्द ही सँभल गये। सरकार की इस नीति के विरुद्ध
उन्होंने ज़बरदस्त आन्दोलन प्रारम्भ किया। रावलपिण्डी की तरफ़ भी इन दिनों ही
नया बन्दोबस्त ख़त्म हुआ था और लगान बढ़ाया गया था। इस प्रकार सन् 1907
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 189
के शुरू में ही अशान्ति के समस्त कारण उपस्थित थे। इस वर्ष के शुरू में ही पंजाब
के गवर्नर सर डांकिज़ल ऐबिटसन ने कहा भी था कि इस समय यद्यपि प्रकट रूप
से तो शान्ति है, किन्तु जनता के हृदय में असन्तोष बढ़ता जा रहा है।
इन दिनों देशभर में एक ख़ामोशी छायी हुई थी। 'ठहरो और देखो' की
मनःस्थिति में जनता थी। यह ख़ामोशी तूफ़ान आने से पहले की शान्ति थी। बेचैनी
पैदा होने के सभी कारण उपस्थित थे, विशेषतः पंजाब में तो ऐसी परिस्थितियाँ थीं
कि अशान्ति उत्पन्न हो जाना सर्वथा उचित और आवश्यक ही था।
सन् 1906 की कांग्रेस
1906 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन कलकत्ता में हुआ। दादा भाई नौरोजी उसके
सभापति थे। इस अधिवेशन में उन्होंने सर्वप्रथम अपने भाषण में 'स्वराज्य' शब्द
का उच्चारण किया। British Parliament के अपने निजी अनुभवों के आधार पर
स्व. दादा भाई ने कहा था कि यदि हम कुछ प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें अपने
अन्दर ताक़त पैदा करनी होगी। अपने पाँवों के बल पर ही हमें खड़ा होना होगा,
पत्थरों की तरह स्थिर दृष्टि से देखतेभर रहने से ही काम नहीं चलेगा।
लाला लाजपत राय
ठीक यही बात एक वर्ष पूर्व बनारस के कांग्रेस अधिवेशन में पंजाब केसरी लाला
लाजपत राय जी ने कही थी। पूज्य लाला जी कांग्रेस के प्रधान स्वर्गीय गोखले के
साथ एक डेपूटेशन में इंग्लैण्ड भेजे गये थे। वहाँ से लौटकर उन्होंने एक बहुत ही
गरम भाषण दिया था।
लोकमान्य तिलक
1906 के कांग्रेस अधिवेशन में लोकमान्य तिलक का बोलबाला था, नवयुवक
समुदाय उनकी खरी और स्पष्ट बातों के कारण उनका भक्त बन गया था। उनकी
निर्भीकता, कुछ कर गुज़रने की भावना और बड़े से बड़े कष्ट सहने के लिए हर
क्षण तैयार रहने के कारण नवयुवक उनकी ओर खिंचे चले आ रहे थे। कांग्रेस
अधिवेशन के अतिरिक्त कांग्रेस के पण्डाल से बाहर भी लोकमान्य के अनेक
भाषण इस अवसर पर हुए थे।
सरदार किशन सिंह और सरदार अजीत सिंह
जो युवक लोकमान्य के प्रति विशेष रूप से आकर्षित हुए थे, उनमें कुछ पंजाबी
नौजवान भी थे। ऐसे ही दो पंजाबी जवान किशन सिंह और मेरे आदरणीय चाचा
स. अजीत सिंह जी थे।
190 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़