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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 788 में से

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पृष्ठ 196

के शुरू में ही अशान्ति के समस्त कारण उपस्थित थे। इस वर्ष के शुरू में ही पंजाब
के गवर्नर सर डांकिज़ल ऐबिटसन ने कहा भी था कि इस समय यद्यपि प्रकट रूप
से तो शान्ति है, किन्तु जनता के हृदय में असन्तोष बढ़ता जा रहा है।
इन दिनों देशभर में एक ख़ामोशी छायी हुई थी। 'ठहरो और देखो' की
मनःस्थिति में जनता थी। यह ख़ामोशी तूफ़ान आने से पहले की शान्ति थी। बेचैनी
पैदा होने के सभी कारण उपस्थित थे, विशेषतः पंजाब में तो ऐसी परिस्थितियाँ थीं
कि अशान्ति उत्पन्न हो जाना सर्वथा उचित और आवश्यक ही था।
सन् 1906 की कांग्रेस
1906 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन कलकत्ता में हुआ। दादा भाई नौरोजी उसके
सभापति थे। इस अधिवेशन में उन्होंने सर्वप्रथम अपने भाषण में 'स्वराज्य' शब्द
का उच्चारण किया। British Parliament के अपने निजी अनुभवों के आधार पर
स्व. दादा भाई ने कहा था कि यदि हम कुछ प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें अपने
अन्दर ताक़त पैदा करनी होगी। अपने पाँवों के बल पर ही हमें खड़ा होना होगा,
पत्थरों की तरह स्थिर दृष्टि से देखतेभर रहने से ही काम नहीं चलेगा।
लाला लाजपत राय
ठीक यही बात एक वर्ष पूर्व बनारस के कांग्रेस अधिवेशन में पंजाब केसरी लाला
लाजपत राय जी ने कही थी। पूज्य लाला जी कांग्रेस के प्रधान स्वर्गीय गोखले के
साथ एक डेपूटेशन में इंग्लैण्ड भेजे गये थे। वहाँ से लौटकर उन्होंने एक बहुत ही
गरम भाषण दिया था।
लोकमान्य तिलक
1906 के कांग्रेस अधिवेशन में लोकमान्य तिलक का बोलबाला था, नवयुवक
समुदाय उनकी खरी और स्पष्ट बातों के कारण उनका भक्त बन गया था। उनकी
निर्भीकता, कुछ कर गुज़रने की भावना और बड़े से बड़े कष्ट सहने के लिए हर
क्षण तैयार रहने के कारण नवयुवक उनकी ओर खिंचे चले आ रहे थे। कांग्रेस
अधिवेशन के अतिरिक्त कांग्रेस के पण्डाल से बाहर भी लोकमान्य के अनेक
भाषण इस अवसर पर हुए थे।
सरदार किशन सिंह और सरदार अजीत सिंह
जो युवक लोकमान्य के प्रति विशेष रूप से आकर्षित हुए थे, उनमें कुछ पंजाबी
नौजवान भी थे। ऐसे ही दो पंजाबी जवान किशन सिंह और मेरे आदरणीय चाचा
स. अजीत सिंह जी थे।
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