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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 788 में से

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पृष्ठ 184

दिल्ली में मुक़दमा चला। सबसे बड़ा आरोप था, ‘लारेन्स गार्डन का बम और
तख़्ता पलटने के परचों की योजना।’ भाई बालमुकुन्द चूँकि लाहौर के जत्थेदार थे
और बड़े योग्य व कट्टर देशभक्त थे, इसलिए आपके ख़िलाफ़ कुछ भी सबूत न
होने के बावजूद फाँसी की सज़ा दे दी गयी।
चीफ़ कोर्ट का जज अपील के फैसले में स्वयं लिखता है –
"Firstly, it is pointed out rightly enough that the search of his houses
at Jodhpur and Karyala, his home in the Jhelum district, failed to reveal
anything in his possession any conditions literature. Secondly admit-
tedly he had no direct connection with the Lahore bomb outrage or the
July leaflets."
यानी, यह तर्क पेश किया गया है कि उनके घरों की तलाशी से कोई काग़ज़
ऐसा नहीं निकला जोकि विद्रोह का प्रचार करने वाला हो। और दूसरी बात यह भी
ठीक है कि लाहौर बम से और जुलाई में बाँटे गये तख़्ता पलट परचों से भी उनका
कोई सम्बन्ध प्रमाणित नहीं होता और इस मुक़दमे में और किसी बम का ज़िक्र
भी नहीं, फिर भी उन्हें मौत की सज़ा क्यों दी गयी? जज लिखता है कि क्या हुआ
यदि उनसे लाहौर में बम चलाने से पहले नहीं पूछा गया, क्या हुआ कि यदि वे
उन दिनों लाहौर में नहीं थे, क्या हुआ यदि इस बात का भी प्रमाण नहीं कि बाद
में भी उन्हें बम चलाने की ख़बर दी गयी। आख़िर वह षड्यन्त्र का सदस्य तो था
ही, वह साज़िश में शामिल तो हो ही चुका था। बस, इसी से वह हत्या का ज़िम्मेदार
है और क़ानून के अनुसार उसे फाँसी की सज़ा मिलनी चाहिए। क़ानून की
विशेषताओं का अब क्या ज़िक्र करें? हद ही हो गयी है। आपको फाँसी की सज़ा
दी गयी, क्योंकि आप बड़े कट्टर तख़्ता पलटने वाले थे और बड़े योग्य थे।
देशभक्ति की भावना बड़े ज़ोरों से भरी हुई थी और दूसरी बात यह थी कि दिल्ली
बम के चल जाने के बाद भी उसके चलाने वालों का पता न चल सकने से सरकार
का रोब ख़त्म हो गया था। O-Dyer (ओडायर) नया-नया लाट बनकर आया था,
वह यह बरदाश्त नहीं कर सका। वह सारा क्रोध इसी मुक़दमे में निकाला गया।
एक सज्जन बड़े सुन्दर शब्दों में ओडायर की पॉलिसी का ज़िक्र करते थे। वे कहते
हैं कि ओडायर की पॉलिसी थी –
"Guilty or not guilty, a few must be punished to maintain the
prestige of the Govt."
यानी, चाहे अपराधी हों या निर्दोष कुछ आदमियों को सज़ा ज़रूर दी जाये,
ताकि सरकार के रोब में कमी न हो।
ख़ैर! आपको फाँसी की सज़ा हुई। आपने बड़ी प्रसन्नता से सुनी। अपील
ख़ारिज हो चुकने के बाद आपको 1915 में फाँसी पर लटका दिया गया। लोग बताते
हैं कि आप बड़े चाव से दौड़े-दौड़े गये। फाँसी के तख़्ते पर चढ़ गये और अपने
178 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़