भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 192, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहुँचे। आकर पूरी तरह काम को सफल बनाने का प्रयत्न करने लगे। कॉलेजों के
लड़कों ने नंगे सिर बड़े-बड़े जुलूस ‘हाय-हाय रोल्ट एक्ट’ कहते हुए निकाले थे।
यह सब आपके ही यत्नों का फल था। दो-चार दिन बड़ी रौनक रही। 12 अप्रैल
को बादशाही मस्जिद, लाहौर में जलसा हुआ। भीड़ का कोई शुमार न था। हज़ारों
आदमी थे। गर्मागर्म भाषण हुए। धुआँधार भाषणों के बाद जुलूस बनाकर लोग शहर
को चल पड़े। हीरामण्डी जब पहुँचे और शहर में घुसने लगे, उसी समय नवाब
मुहम्मद अली सेना के साथ आगे तैनात था। उसने हुक्म दिया कि जुलूस भंग कर
दो। लेकिन वे दिन बड़े अजीब थे। श्री खुशीराम आगे-आगे झण्डा उठाये जा रहे
थे। कहा, “यह जुलूस कभी वापस नहीं लिया जा सकता और जुलूस की शक्ल
में ही शहर में घुसेगा।” नवाब ने हवा में गोली चला दी। लोग भाग छूटे। शेरमर्द
लाला खुशीराम ने गरजकर एक बार तो लोगों को ख़ूब लानत दी। कहा, “तुम्हें शर्म
नहीं आती इस तरह गीदड़ों की तरह भागते हो।” लोग एकत्र हो गये। लाला
खुशीराम आगे जा रहे थे। नवाब ने फिर गोली चलायी। इस बार गोली हवा में नहीं,
बल्कि सीधे महाशय खुशीराम की छाती में लगी। गोली लगी, आप ज़ख़्मी शेर की
तरह झपटकर आगे बढ़े। और गोली लगी तो आप और आगे बढ़े। एक-एक कर
सात गोलियाँ छाती में लगीं, लेकिन खुशीराम का क़दम आगे ही आगे बढ़ता चला
गया। आख़िर आठवीं गोली माथे के दायीं ओर और नवीं बायीं ओर आ लगी। शेर
तड़पकर गिर पड़ा। खुशीराम सदा की नींद सो गये, लेकिन आज उनका नाम ज़िन्दा
है। उनकी बहादुरी व हिम्मत आज भी उसी तरह ताज़ा है। ख़ैर!
आपकी लाश का बड़ा भारी जुलूस निकला। आम ख़याल किया जाता है कि
कम से कम पचास हज़ार लोग इस जुलूस में शामिल थे।
इस तरह उस वीर ने अपने और अपने राष्ट्र के गौरव के लिए प्राणों की बाज़ी
लगा दी और अपना नाम अमर कर गया। कुछ वर्षों बाद एक कवि ने एक बड़ी
दर्दभरी कविता लिखी थी, जिसका एक मिसरा यों है –
हाय! खुशीराम की बरसी मनाई न गयी!
क्या खुशीराम की मौत को हम भूल गये?
उसके मक़सद पे चढ़ाने को हम भूल गये।
186 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़