सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 788 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 185

हाथों से ही फाँसी की रस्सी को गले में डाल लिया।
भाई बालमुकुन्द जी की अपनी शहादत बड़ी ऊँची और पूजा योग्य है, लेकिन
उनके बलिदान को उनकी धर्मपत्नी के अतुलनीय प्रेम से, सती होने से और भी
चार चाँद लग गये।
भाई बालमुकुन्द जी जेल में बन्द थे। उनकी धर्मपत्नी श्रीमती रामरखी उनसे
मिलने आयीं। पूछा, “रोटी कैसी मिलती है?” उत्तर मिला, “आधी रेत और आधे
आटे की जली हुई और बिल्कुल कच्ची रोटी मिलती है।” नमूना ले लिया। घर
जाकर वैसा आटा तैयार किया, वैसी ही रोटी पकायी। कहा – “जब मेरे प्रीतम
आप ऐसी रोटी खाते हैं तो मैं इससे अच्छी कैसे खा सकती हूँ।” वैसी ही रोटी
खाती रहीं। फिर एक बार मुलाक़ात हुई। पूछा, “इतनी सख्त़ गर्मी में सोते कहाँ हैं?”
जवाब मिला, “अँधेरी कोठरी में, सख्त़ गर्मी में दो कम्बल मिलते हैं।” घर आ
गयीं। घर की सबसे पिछली कोठरी में जाकर सो गयीं। मच्छर काट-काटकर खाते
थे। क्या करतीं? वहीं सोना था। सखी-सहेलियों ने कहा, “पगली, यह भी कोई
ज़िन्दा रहने वालों का तरीक़ा है?” श्रीमती रामरखी ने पूछा, “तो क्या ऐसे रहने वाले
बचते नहीं?” सखियों ने कहा, “और क्या। इस तरह करने वाले भी क्या बचे हैं?”
उनकी आँखें भर आयीं। सहेलियाँ चुप होकर बैठ गयीं, वह वहीं सोती रहीं। एक
दिन वे भीतर निढाल पड़ी थीं कि बाहर से औरतों के रोने-चिल्लाने की आवाजें
आयीं। सब समझ लिया कि उनके प्रीतम भाई बालमुकुन्द जी को फाँसी हो चुकी
है। उनकी लाश भी नहीं दी गयी। उठीं। नहायी-धोयी, सुन्दर-सुन्दर कपड़े और
आभूषण पहनकर फ़र्श पर उनके ध्यान में मग्न होकर बैठ गयीं। फिर वे उठीं नहीं।
धन्य थे भाई बालमुकुन्द और धन्य श्रीमती रामरखी। उन्होंने हिन्दुस्तानी क्रान्ति को
कितना सुन्दर बना दिया।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 179