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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 788 में से

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पृष्ठ 187

लौट आये। आपने यहाँ आकर एक तरह के संन्यासी वालण्टियर पैदा करने का
विचार किया और उन्होंने बहुत-से विद्यार्थियों को शिक्षा से हटाया और उन्हें साथ
लेकर संन्यासी जीवन व्यतीत करने लगे। 1908 के आख़िर में ही लाला हरदयाल
को हिन्दुस्तान छोड़कर चले जाना पड़ा। सरकार कहती है कि जब वे जाने लगे तो
उन्होंने अपनी सम्पत्ति मा. अमीरचन्द जी के हवाले कर दी, जिन्होंने कि उनकी
शिक्षा जारी रखी। पहले-पहल दीनानाथ और जितेन्द्रनाथ चटर्जी उनके पास गये।
बाद में अवधबिहारी आदि से उनका परिचय हुआ। लेकिन असल में तो
अवधबिहारी पहले ही दिल्ली के रहने वाले थे और पहले से ही परिचित थे। ख़ैर!
मास्टर अमीरचन्द बड़े ज़िन्दादिल, बड़े नेकदिल और कट्टर आज़ादी-परस्त
थे। आप कहा करते थे कि दिल्ली में ‘बन्दर मास्टर’ का घर पूछते ही मेरा घर
मिल जायेगा।
दिल्ली में वायसराय पर बम चल गया, लेकिन सरकार हाथ मलती रह गयी।
कुछ भी पता न चला। बाद में एक बम लाहौर लारेन्स गार्डन में चल गया, लेकिन
उसका भी कुछ पता न चला। आख़िर राजा बाज़ार, कलकत्ता की तलाशी में श्री
अवधबिहारी का नाम व पता निकल आया। मा. अमीरचन्द को पहले ही शक की
निगाह से देखा जाता था। अवधबिहारी उन्हीं के पास रहते थे।
एक दिन अवधबिहारी की तलाशी हुई। बम की टोपी मिल गयी और लाहौर
का एक पत्र मिल गया, जिस पर कि मेहर सिंह की ओर से एम.एस.आई. दस्तख़त
किये गये थे। पूछने पर आपने बता दिया कि यह ख़त दीनानाथ की ओर से है।
दीनानाथ की गिरफ़्तारी की गयी। वह फूट पड़ा और उसने वह सारा भेद खोल
दिया। उसने बताया कि लारेन्स गार्डन का बम श्री अवधबिहारी और वसन्तकुमार
ने रखा था। ख़ैर, मुक़दमा चला।
मास्टर अमीरचन्द ने अपने भतीजे सुल्तानचन्द को उत्तराधिकारी बनाया था
और उससे अपने पुत्रों जैसा प्यार करते थे। उसे अपनी इच्छानुसार शिक्षा देते
थे। देशभक्त बनाना चाहते थे। आप पर मुक़दमा चला। वही पुत्र आपके
ख़िलाफ़ गवाह बन गया। ज़रा सोचो बेचारे मास्टर अमीरचन्द जी के बारे में,
जिसे अपना पुत्र बनाया था वही सरकारी गवाह बनकर आपके ख़िलाफ़ गवाही
दे रहा है! कैसी दर्दनाक स्थिति है। आज जब मुसीबत का समय आया तो
अपने दिल का टुकड़ा अपना पुत्र भी साथ न दे सका। उर्दू के एक शायर ने
क्या ख़ूब कहा है –
बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मेरे,
जिनपे तकिया था, वही पत्ते हवा देने लगे!
मुक़दमा चलता रहा। गवाह भुगतते रहे। सबूत मिला कि वह एक साज़िश के
सदस्य भी हैं और चूँकि वह बड़े लायक और बुद्धिमान हैं, इसलिए हत्या आदि
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 181