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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 788 में से

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पृष्ठ 178

आज वे हिन्दुस्तान की आज़ादी के देवता माने जाते और सारे हिन्दुस्तान में उनके
सम्मान में राष्ट्रीय त्यौहार मनाया जाता।
हिन्दुस्तान के मौजूदा इतिहासों को, जोकि हमारे हाथों में दिये जाते हैं, पढ़कर
हिन्दुस्तानियों के दिलों में उन शूर-वीरों के लिए कोई अच्छी भावनाएँ पैदा नहीं
होतीं, क्योंकि उन 'आज़ादी की जंग' के नायकों को क़ातिल, डाकू, खूनी, धार्मिक
जनूनी व अन्य कई बुरे-बुरे शब्दों में याद किया गया है और उनके विरोधियों को
राष्ट्रीय नायक बनाया गया है। कारण यह है कि 1857 की 'आज़ादी की जंग' के
जितने इतिहास लिखे गये हैं, वे सारे के सारे ही या तो अंग्रेज़ों ने लिखे हैं जोकि
ज़बरदस्ती तलवार के ज़ोर पर, लोगों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ हिन्दुस्तान पर क़ब्ज़ा
जमाये बैठे हैं और या अंग्रेज़ों के चाटुकारों ने। जहाँ तक हमें पता है, इस आज़ादी
की जंग का एकमात्र स्वतन्त्र इतिहास लिखा गया, जोकि बैरिस्टर सावरकर ने
लिखा था और जिसका नाम '1857 की आज़ादी की जंग का इतिहास' (The
history of the Indian war of Independence of 1857) था। यह इतिहास बड़े
परिश्रम से लिखा गया था और इण्डिया ऑफिस की लाइब्रेरी से छान-बीनकर, कई
उद्धरण दे-देकर सिद्ध किया गया था कि यह राष्ट्रीय संग्राम था और अंग्रेज़ों के
राज से आज़ाद होने के लिए लड़ा गया था। लेकिन अत्याचारी सरकार ने इसे छपने
ही नहीं दिया और अग्रिम रूप से ज़ब्त कर लिया। इस तरह लोग सच्चे हालात पढ़ने
से वंचित रह गये।
इस जंग की असफलता के बाद जो ज़ुल्म और अत्याचार निर्दोष हिन्दुस्तानियों
पर किया गया, उसे लिखने की न तो हमारे में हिम्मत है और न ही किसी और
में। यह सबकुछ हिन्दुस्तान के आज़ाद होने पर ही लिखा जायेगा। हाँ, यदि किसी
को इस ज़ुल्म, अत्याचार और अन्याय का थोड़ा-सा नमूना देखना हो तो उन्हें मिस्टर
एडवर्ड थामसन की पुस्तक, 'तस्वीर का दूसरा पहलू' (The Other Side of the
Medal) पढ़नी चाहिए, जिसमें उसने सभ्य अंग्रेज़ों की करतूतों को उघाड़ा है और
जिसमें बताया गया है कि किस तरह नील हेवलाक, हडसन कूपर और लारेन्स ने
निर्दोष हिन्दुस्तानी स्त्री-बच्चों तक पर ऐसे-ऐसे कहर ढाये थे कि सुनकर रोंयें खड़े
हो जाते हैं और शरीर काँपने लगता है!
लेकिन इस बात का ख़याल करके स्वतन्त्र व्यक्तियों को शर्म आयेगी कि वे
लोग भी, जिनके बुजुर्ग इस जंग में लड़े थे, जिन्होंने हिन्दुस्तान की आज़ादी की
बाज़ी पर सबकुछ लगा दिया था और जिन्हें इस पर गर्व होना चाहिए था, वे भी,
इस जंग को आज़ादी की जंग कहने से डरते हैं। कारण यह कि अंग्रेज़ी अत्याचार
ने उन्हें इस क़दर दबा दिया था कि वे सर छुपाकर ही दिन काटते थे। इसलिए
उन बुजुर्गों की यादगार मनानी या स्थापित करनी तो दूर, उनका नाम लेना भी गुनाह
समझा जाता था।
172 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़