भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 188, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरने की साज़िश के लिए नौजवानों को बरगला सकते हैं और –
"One who spent his life furthering murderous schemes which he
was too timid to carry out himself."
यानी हत्या का प्रचार करने में जिसने अपनी पूरी ज़िन्दगी लगा दी, उसके बारे
में वह स्वयं साहसहीन था।
उन्हीं दिनों तख़्ता पलट पार्टी की ओर से Liberty (आज़ादी) नाम का एक
परचा बाँटा जाता था। एक परचे का मसौदा मास्टर जी के हाथ का लिखा उनके
घर में मिल गया। उसमें ऐसे वाक्य आपत्तिजनक माने गये –
We are so many that we can seize and snatch from them their
cannon.
Reforms will not do. Revolution and a general massacre of all the
foreigners specially the English will and alone can serve our purpose.
यानी, हम संख्या में इतने हैं कि हम उनकी तोपें छीन सकते हैं। ये सड़े सुधार
या योजनाएँ किसी काम नहीं आयेंगी। एक बार तख़्ता पलट दो और फिरंगी को
मार ख़त्म करो। ख़ैर, इन्हीं वाक्यों के कारण ही उन्हें बड़ा ख़ूँखार क़ातिल समझा
गया और कहा गया।
आपके चरित्र सम्बन्धी कैनन आलनट और मिस्टर एस.के. रुद्र आदि बतौर
गवाह पेश हुए। उन्होंने आपकी बहुत तारीफ़ की, लेकिन जज लिखता है कि मास्टर
अमीरचन्द्र लामिसाल देशभक्त, बड़े नेक, दर्दमन्द और ऊँचे चरित्र के थे।
मतलब यह है कि आपको उस केस में फाँसी की सज़ा दी गयी। आपने हँसते
हुए सुनी और आख़िर में बड़ी हँसी-खुशी से फाँसी पर लटककर जान दे दी।
मि. अवधबिहारी
आप बड़े होनहार नौजवान थे। बी.ए. पास कर सेण्ट्रल ट्रेनिंग कॉलेज, लाहौर से
बी.टी. पास की। आप पर कई लिबर्टी परचे लिखने का आरोप था। आपको यू.पी.
और पंजाब की पार्टी का प्रमुख नियत किया गया था। 'बन्दी जीवन' के लेखक
श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल ने आपकी बड़ी तारीफ़ की है। कहते हैं कि आप बड़े
ज़िन्दादिल थे और आमतौर पर गुनगुनाते रहते थे –
एहसान नाख़ुदा का उठाये मेरी बला,
किश्ती खुदा पे छोड़ दूँ लंगर को तोड़ दूँ।
इस शेर से ही पता चलता है कि वे कितने मस्ताने वीर थे। आप पर परचे
लिखने और लारेन्स गार्डन में बम चलाने का आरोप था। आपको भी फाँसी की
सज़ा हुई। आपने बड़ी खुशी से सुनी। कहते हैं कि फाँसी लगने के दिन आपसे पूछा
गया, "आख़िरी इच्छा क्या है?"
जवाब दिया, "यही कि अंग्रेजों का बेड़ा गर्क हो।"
182 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़