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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 788 में से

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पृष्ठ 183

साथ के और शहीदों के हालात भी लिखेंगे।
श्री गुरु तेगबहादुर साहब की जब औरंगज़ेब ने दिल्ली में हत्या करवायी थी
तब उनके साथ एक ब्राह्मण भाई मतिदास भी थे और उन्हें भी आरे से चीरकर
शहीद किया गया था। तब से इनके ख़ानदान को भाई का ख़िताब मिला हुआ है।
भाई बालमुकुन्द जी इसी ख़ानदान में से थे। आप करियाला ज़िला झेलम के रहने
वाले थे। भाई परमानन्द जी के चाचा के लड़के थे। आपने बी.ए. तक शिक्षा प्राप्त
की थी।
आप तब जोधपुर के राजा के लड़कों को पढ़ाते थे, जब आपको गिरफ़्तार
किया गया था। वहाँ आपके घर की तलाशी ली गयी। आपके गाँव में भी घर की
तलाशी हुई, लेकिन कोई चीज़ ऐसी न मिली जिससे कि आपके ख़िलाफ़ कुछ
साबित किया जा सके।
वास्तव में 1907 में जो आन्दोलन चला था उसके साथ ही कुछ आदमियों
में जोश भर गया था। 1908 की भारतमाता बुक सोसायटी और लाला हरदयाल के
प्रचार ने भी कुछ और रंग चढ़ा दिया। उसके बाद बंगाल के एक-दो आदमी इधर
आये। उन्होंने इनमें बहुत-से नौजवानों को एक ख़ुफ़िया पार्टी में शामिल किया।
1910 में श्री रासबिहारी बोस ने आकर पंजाब का काम स्वयं संगठित किया,
जिसमें कि भाई बालमुकुन्द को ही लाहौर का जत्थेदार नियत किया गया।
दिसम्बर, 1912 में दिल्ली में वायसराय का जुलूस निकल रहा था। बड़ी
शानो-शौक़त, बड़ी रौनक और हो-हल्ला मचा हुआ था। चाँदनी चौक में से जुलूस
जा रहा था। वायसराय लॉर्ड हार्डिंग चौकी पर सवार थे। अचानक एक ओर से बम
गिरा। वायसराय घायल हो गया और एक नौकर मर गया। बड़ा शोर हुआ। बड़े
हाथ-पाँव मारे गये, लेकिन कुछ पेश न चली। कुछ पता न चला कि यह काम
किसने किया। पाँच-छह महीने गुज़र गये। लाहौर के लारेन्स गार्डन के मिण्टगुमरी
हॉल में गोरों का नाच हो रहा था। हॉल से बाहर एक बम फट गया। इससे एक
हिन्दुस्तानी चपरासी मर गया। उस समय कोई गिरफ़्तारी न हो सकी। फिर कहा
जाता है कि एक बम लाहौर के क़िले में चला, उसका भी कुछ पता न चल सका।
लारेन्स बाग़ के बम चलने से कोई सात-आठ महीने बाद बंगाल में किसी
जगह तलाशी थी। अवधबिहारी का दिल्ली का पता हाथ लग गया। उनकी तलाशी
हुई और एक पत्र लाहौर से आया पकड़ा गया। उस पर मेहर सिंह के दस्तख़त थे।
पूछने पर उन्होंने बता दिया कि यह पत्र दीनानाथ का लिखा हुआ है। कई दीनानाथ
लाहौर में पकड़े गये। आख़िर में असली दीनानाथ भी मिल गया, जिसने कुछ दिनों
में पूरा भेद खोल दिया और सरकारी वायदा-माफ़ गवाह बन गया। उसके बयान
से कोई बारह आदमी और पकड़े गये। जोधपुर से भाई बालमुकुन्द जी भी पकड़े
गये।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 177