भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 177, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंदस मई का शुभ दिन
अप्रैल, 1928 में 'किरती' के 1857 के ग़दर सम्बन्धी अंक में '10 मई का
शुभ दिन' नाम से लेख छपा। इसके लेखक का नाम तो नहीं दिया गया, लेकिन यह
शहीद भगतसिंह के साथियों का ही लेख है। सम्भवतः भगवतीचरण वोहरा का। वे
बहुत अच्छे लेखक थे और 'किरती' से गहरे रूप में जुड़े हुए थे। मार्च, 1925 से
लेकर जुलाई 1928 तक भगतसिंह ने 'किरती' के सम्पादकीय विभाग में बहुत ही
लगन से काम किया था। यह लेख उसी समय छपा था। – स.
“ओ दर्दवाले दिल, दर्द हों चाहे हज़ार
दस मई का दिन भुलाना नहीं,
इसी रोज़ छिड़ी 'आज़ादी की जंग'
वक़्त खुशी का ग़मी लाना नहीं।”
दस मई वह शुभ दिन है जिस दिन कि 'आज़ादी की जंग' शुरू हुई थी।
भारतवासियों का गुलामी की ज़ंजीरें तोड़ने के लिए यह प्रथम प्रयास था। यह प्रयास
भारत के दुर्भाग्य से सफल नहीं हुआ, इसीलिए हमारे दुश्मन इस 'आज़ादी की जंग'
को 'ग़दर' और बग़ावत के नाम से याद करते हैं और इस 'आज़ादी की जंग' में
लड़ने वाले नायकों को कई तरह की गालियाँ देते हैं। विश्व के इतिहास में ऐसी
कई घटनाएँ मिलती हैं, जहाँ आज़ादी की जंग को कई बुरे शब्दों में याद किया जाता
है। कारण यही है कि वह जंग जीती न जा सकी। यदि विजय हासिल होती तो
उन जंगों के नायकों को बुरा-भला न कहा जाता, बल्कि वे विश्व के महापुरुषों
में माने जाते और संसार उनकी पूजा करता।
आज दुनिया गैरीबाल्डी और वाशिंगटन की क्यों बढ़ाई व इज़्ज़त करती है,
इसलिए कि उन्होंने आज़ादी की जंग लड़ी और उसमें सफल हुए। यदि वे सफल
न होते तो वे भी 'बाग़ी' और 'ग़दरी' आदि भद्दे शब्दों में याद किये जाते। लेकिन
वे सफल हुए, इसलिए वे महापुरुषों में माने जाने लगे। इसी तरह यदि 1857 की
आज़ादी की जंग में ताँत्या टोपे, नाना साहिब, झाँसी की महारानी, कुमार सिंह
(कुँवर सिंह), और मौलवी अहमद साहिब आदि वीर जीत हासिल कर लेते तो
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 171