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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 180, कुल 788 में से

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पृष्ठ 180

बड़ी सज-धज से मनाया गया और लोगों में बड़ा जोश आ गया कि अंग्रेज़ किस
प्रकार हमारे राष्ट्रीय वीरों को बदनाम करते हैं। उन्होंने रोष के रूप में मीटिंगें कीं
और उनकी याद में 10 मई का दिन हर वर्ष मनाना शुरू कर दिया। काफ़ी समय
बाद अभिनव भारत सोसायटी टूट गयी और इंग्लैण्ड में यह दिन मनाना बन्द हो
गया, लेकिन कुछ समय बाद अमेरिका में हिन्दुस्तान ग़दर पार्टी स्थापित हो गयी
और उसने उसे हर बरस मनाना शुरू कर दिया। ग़दर पार्टी के स्थापित होने के दिन
से लेकर अब तक अमेरिका में यह दिन सज-धज से मनाया जाता है। बड़ी भारी
मीटिंग होती है, जिसमें सब हिन्दुस्तानी एकत्र होते हैं। उसमें इन 1857 के शूरवीरों
के जीवन और कारनामे बताये जाते हैं। इस तरह इन शहीदों की याद साल दर साल
ताज़ा की जाती है और ऐसी कविताएँ –
‘ओ दर्द-मन्द दिल, दर्द दे चाहे हज़ार
दस मई का दिन भुलाना नहीं।
इस रोज़ छिड़ी जंग आज़ादी की
बात खुशी की ग़मी लाना नहीं।’
आदि पढ़ी जाती हैं। विशेषतः 1914-15 में ये पंक्तियाँ प्रत्येक पुरुष की जीभ
पर चढ़ी हुई थीं, क्योंकि उस समय वे एक और आज़ादी की जंग लड़कर
हिन्दुस्तान को आज़ाद करवाना चाहते थे। लेकिन वह प्रयास भी असफल हुआ,
जिसमें हज़ारों नौजवानों ने भारतमाता पर शीश वार दिये, लेकिन हमारी गुलामी को
न काटा जा सका।
दस मई का दिन क्यों मनाया जाता है? इसका कारण यह है कि दस मई के
दिन ही असली जंग शुरू हुई थी। 10 मई को मेरठ छावनी के 85 वीरों ने चर्बी
वाले कारतूस इस्तेमाल करने से इन्कार कर दिया था। उनका कोर्ट मार्शल किया
गया और प्रत्येक जवान को 10 साल सख़्त कैद की सज़ा दी गयी। बाद में ग्यारह
सिपाहियों की कैद कम कर पाँच साल कर दी गयी थी। लेकिन यह सारी कार्रवाई
ही इस तरीक़े से की गयी थी कि जिसमें हिन्दुस्तानी सिपाहियों के गर्व और मान
को भारी चोट पहुँचती थी, वह दृश्य बड़ा दर्दनाक था। देखने वालों की आँखों से
टप-टप आँसू गिरते थे। सारे के सारे बुत बने हुए थे। वे 85 सिपाही जो उनके भाई
थे, सब दुखों-सुखों में शरीक थे, उनके पैरों में बेड़ियाँ डाली हुई थीं। उनका
अपमान सहन करना मुश्किल था, लेकिन कुछ बन नहीं सकता था।
अगले दिन “घुड़सवार और पैदल सेना ने जाकर जेल तोड़ दी, अपने साथियों
को छुड़ा लिया, अफ़सरों के घरों को फूँक डाला। जिस यूरोपीय को पकड़ सके,
उसे मार डाला और दिल्ली की ओर चढ़ाई कर दी। ग़दर का आरम्भ इसी दिन
हुआ और 10 मई से ही गिना जाता है।”
(ऑक्सफ़ोर्ड हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया, पृष्ठ 715)
174 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़