भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
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शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 194, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाहित्य पर ही निर्भर रहना पड़ा। इसका खेदजनक परिणाम यह हुआ कि पंजाब
का शिक्षित वर्ग अपने प्रान्त की राजनीतिक हलचलों से अलग-थलग-सा रहता
रहा। इसी कारण पंजाब के साहित्य और कला-क्षेत्र में राजनीति को स्थान नहीं मिल
सका। यही कारण है कि पंजाब में ऐसे कार्यकर्ता इने-गिने ही हैं, जो अपना सम्पूर्ण
जीवन राजनीति को दे सके हैं। इसी आधार पर इस प्रान्त पर ऐसे आरोप लगाये
जाते हैं। अपने प्रान्त की इस कमी की ओर प्रान्तीय नेताओं और पुरुष समाज का
ध्यान आकर्षित करना ही इन लेखों का उद्देश्य है।
गुरु राम सिंह जी के नेतृत्व में हुए कूका विद्रोह से लेकर आज तक पंजाब
में जो भी आन्दोलन हुए और जिस प्रकार जनता में चेतना आयी, उससे वह
स्वतन्त्रता की वेदी पर अपना सर्वसुख न्योछावर करने के लिए तैयार हो गयी। इनमें
जिन व्यक्तियों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया। उनका जीवन-चरित्र तथा इतिहास
प्रत्येक स्त्री-पुरुष के साहस को बढ़ाने वाला है जिससे वह अपने अध्ययन और
अनुभवों के प्रकाश में भावी आन्दोलनों को भी भली प्रकार चला सकेंगे। इस
इतिहास को लेखबद्ध करने में मेरा यह उद्देश्य कदापि नहीं है कि भविष्य में भी
ठीक इसी प्रकार के आन्दोलन सफल हो सकेंगे। मेरा उद्देश्य तो केवल यह है कि
जनता उन शहीदों की कुर्बानियों और उनके आजीवन देश-सेवा में लगे रहने से
प्रेरणा प्राप्त करे और उनका अनुकरण करे। समय आने पर किस तरह कार्य करना
होगा, इसका फ़ैसला देश की तत्कालीन परिस्थिति को देखते हुए कार्यकर्ता स्वयं
कर सकते हैं।
पंजाब में राजनीतिक हलचलें कैसे प्रारम्भ हुईं?
सन् 1907 से पूर्व पंजाब में बिल्कुल ही खामोशी थी। विद्रोह (कूका विद्रोह)
के बाद कोई ऐसा राजनीतिक आन्दोलन नहीं उठा जो शासकों की नींद खोल
सकता। 1908 में पंजाब में पहली बार कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। किन्तु उस
समय कांग्रेस के कार्य का आधार शासकों के प्रति वफ़ादारी प्रकट करना था।
इसलिए राजनीतिक क्षेत्र में उसका कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं पड़ा। सन्
1905-06 में बंगाल-विभाजन के विरुद्ध जो शक्तिशाली आन्दोलन उठ खड़ा
हुआ था और स्वदेशी के प्रचार तथा विदेशी के बहिष्कार की जो हलचल प्रारम्भ
हुई थी, इसका पंजाब के औद्योगिक जीवन तथा साधारण जनता पर बड़ा भारी
प्रभाव पड़ा था। उन दिनों यहाँ भी (पंजाब) स्वदेशी वस्तुएँ, विशेषतः खाण्ड
तैयार करने का सवाल पैदा हुआ और देखते-देखते एक-दो मिलें भी खुल गयीं।
यद्यपि सूबे के राजनीतिक जीवन पर इसका कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा, किन्तु
सरकार ने इस उद्योग को नष्ट करने के लिए गन्ने की खेती का लगान तीन गुना
कर दिया। पहले एक बीघे का लगान केवल 2.50 रुपये था, जबकि अब साढ़े
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