बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
काशी केन्द्र की कहानी / 91
बिलकुल ही असहाय थे, इनका एकमात्र बल और भरोसा था केवल अपना
असीम विश्वास तथा चित्त की अद्भुत दृढ़ता; किन्तु अपने घर में ही ये अपने
स्वदेशवासियों से उपेक्षित थे। ऐसे दो दलों के असम द्वन्द्व में विप्लव-दल ने
बहुत दिनों तक केवल आत्मरक्षा ही नहीं की थी, बल्कि उसने अंग्रेज़ी सरकार
को भी कितने ही नाच नचा दिए थे और इस प्रकार अंग्रेजी साम्राज्य की प्रबल
शक्ति जो रासबिहारी को गिरफ्तार नहीं कर सकी इसका प्रधान कारण था
हमारे संघ की व्यापकता और बहुत बढ़िया बन्दोबस्त। उपयुक्त शक्तिशाली सुनि-
यन्त्रित संघ न होता तो रासबिहारी को बचा लेना कदापि सम्भव न होता।
इसमें सन्देह नहीं कि इतने पर भी रासबिहारी की कुशलता और उनका भाग्य
कुछ कम सहायक नहीं हुआ। कितने ही भीषण संकट के अवसरों पर वे उनमें से
सहज ही बच निकले थे। अब उन बातों का ख्याल होने से ही देह में रोमांच हो
आता है। इसे भगवान् की विशेष कृपा के सिवा और क्या कहा जाय! इन सब
बातों का वर्णन दूसरे भाग में होगा। केवल रासबिहारी ही इस प्रकार अपने को
छिपाने में सफल न हुए थे, अपितु और भी कितने ही युवक इसी समय से, तथा
इसके पश्चात् भी प्रबल प्रतिद्वन्द्वी की सारी शक्ति को व्यर्थ करके तीन-चार वर्ष
तक—कोई-कोई तो इससे भी अधिक समय तक—छिपे रहने में समर्थ हुए थे।
यदि उन छिपे हुए लोगों का रहस्यपूर्ण इतिहास लिखा जाय तो भारत के साहित्य
को एक नई सम्पत्ति प्राप्त हो।
रासबिहारी रात की गाड़ी से दिल्ली होते हुए पंजाब को रवाना हुए। इस
समय से प्रायः हर वक्त हम लोगों में से कोई-न-कोई रासबिहारी के साथ-साथ
रहता था। दिल्ली पहुँचने तक कोई खास घटना नहीं हुई। गाड़ी जिस समय
दिल्ली स्टेशन को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने लगी उस समय रासबिहारी ने अक-
स्मात् देखा कि उनके छोटे से डिब्बे में उन्हीं की पहचान का खुफिया पुलिस का
दारोगा बैठा हुआ है। उस समय रासबिहारी के मन की जो दशा हुई होगी उसकी
हमें कल्पना से ही जान लेना चाहिए। जो हो, सौभाग्य से उस रात को वे अपने
सिर पर टोपी लगाये रहने की बदौलत साफ बच गए, और अगला स्टेशन आने
पर वे उस डिब्बे से निकलकर दूसरे डिब्बे में जा बैठे, किन्तु गए वे उसी गाड़ी से;
इसी से समझ लीजिए कि उनमें कितना साहस था। इस प्रकार बड़ी शान्ति से,
किन्तु दृढ़ता के साथ, रासबिहारी सब बातों को जानते रहने पर भी दहकती हुई
आग में कूद पड़े। वे अमृतसर पहुँच गए।
इधर युक्तप्रदेश, बिहार और बंगाल की भिन्न-भिन्न छावनियों में हमारे
आदमियों ने अपना आना-जाना आरम्भ कर दिया। थोड़े ही दिनों में पंजाब से
करतारसिंह तथा और भी कई सिक्ख पंजाब का समाचार लेकर काशी आए।
उस समय उत्तर भारत की तमाम छावनियों का हाल हमने मालूम कर लिया
था। सब स्थानों का समाचार मिलने पर समझ में आ गया था कि उस समय देश
में गोरी सेना बहुत ही थोड़ी थी और जितने गोरे थे भी, वे निरे रंगरूट थे। टेली-
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टोरियल सेना के छोकरों और दुबले-पतले लम्बे नौजवान सिपाहियों को देखकर
हम लोग चाहते थे कि अब बहुत जल्द हमें शक्ति की जाँच करने का मौका मिल
जाय । उन दिनों समूचे उत्तर भारत की दो-तीन बड़ी-बड़ी छावनियों और
काबुल के सीमान्त देश के सिवा कहीं भी तीन सौ से अधिक गोरे सिपाही न थे ।
बड़ी-बड़ी छावनियों में भी इनकी तादाद एक और दो हज़ार के बीच में थी ।
भिन्न-भिन्न छावनियों में जितने अस्त्र-शस्त्र थे उनकी सहायता से कम-से-कम
वर्षभर तक तो मज़े में युद्ध जारी रक्खा जा सकता था। हम लोगों ने उन सब
बातों का रत्ती-रत्ती पता लगा लिया था जिनका कि लग सकता था । जैसे—
किस रेजिमेंट में कितने बाक्स राइफलें हैं ? कारतूसों के कितने बक्स हैं ? मेग-
ज़ीन पर किनका पहरा रहता है और कैसा पहरा रहता है ? इत्यादि । हिन्दुस्तानी
फ़ौजों की मानसिक दशा उस समय बहुत ही ख़राब थी। उन्हें हर घड़ी यह
खटका बना रहता था कि बस अब यूरोप जाने का हुक्म होता ही है। जो दम
गुज़रता था ग़नीमत समझा जाता था। छावनियों में पहुँचते ही हमारे युवकों का
सिपाही लोग बड़ा आदर-सत्कार करते और बड़े आग्रह से उनकी बातें सुनते थे ।
एक बार एक युवक किसी छावनी में गया; तब उसी दिन, रात को वहाँ सिपाहियों
की बैठक हुई। उस बैठक में बड़े ओहदेदारों के सिवा और सभी सिपाही एकत्र
हुए, उस विदेश से आये हुए युवक की बातें उन लोगों ने बड़े आग्रह से सुनीं ।
अन्त में उन लोगो ने कहा कि इस विद्रोह मे हम लोग अगुआ न बनेंगे; हाँ, हम लोग
ऐसा ज़रूर करेंगे जिसमें विप्लव के समय हमारे हाथ से मेगज़ीन न निकल जाने
पाए, जब गदर सचमुच मच जाएगा तब हम भी उसमें शामिल हो जाएँगे ।
काशी की रेजिमेंट में मैं और भी कई बार गया था। इस रेजिमेंट में दिल्ला-
सिंह के सिवा और सभी अच्छे आदमी थे। वे लोग सचमुच देश के भले के लिए
विप्लव में शामिल होने को तैयार थे। दिल्लासिंह ने एक दिन हम लोगों से पूछा
—'बाबू, देश के स्वाधीन हो जाने पर क्या हम लोगों को कुछ जागीर या माफ़ी
वगैरह मिलेगी ?' एक दिन गनकाटन ले जाकर उसे हम लोगों ने अपनी करामात
दिखलाई और कहा कि देखो यह मामूली रूई नहीं है, इसमें आग छूते ही किस
प्रकार भक से सारी की सारी जल उठती है, तनिक-सी भी बाकी नहीं रहती । यह
लीला देखकर वे लोग अचरज करते थे । इस प्रकार हम लोग कई तरह से दिल्ला-
सिंह और उसके अनुयायी साथियों को अपने मत में लाने की कोशिश करते थे ।
इस रेजिमेंट के कुछ आदमियों से बाद को मेरी भेंट हुई । उन्होंने बड़े भक्तिभाव
से माथा झुकाकर मुझसे बातचीत की थी। इनमें एक सिपाही की उम्र पचास
से ऊपर थी । उसने मुझसे कहा--बाबू मेरे साथ जान-पहचान वाले अब कोई
भी जीवित नहीं। एक मैं ही रह गया हूँ । सो मेरा समय नजदीक है । बाबू अब
मैं मौत से नहीं डरता, तुम्हीं मेरे गुरु हो गए, क्योंकि दुनिया के झमेलों से मेरे
चित्त को हटाकर तुम्हीं ने भगवान् की ओर कर दिया है ।
जितनी ही रेजिमेंटों में हमारी पहुँच हो चुकने पर उनकी अन्य स्थानों में
काशी केन्द्र की कहानी / 93
बदली हो गई। इससे यह हुआ कि हमारे कार्य का प्रचार देश में बहुत दूर तक
हो गया।
रेजिमेंटों के प्रचार करने के अलावा इसी समय हमने देहात में जाकर वहाँ
की जनता मे भी अपनी रसाई करने की कोशिश की। युक्तप्रदेश में कुछ ऐसे गाँव
हैं जहाँ केवल ठाकुरों की ही बस्ती है। ऐसे अनेक केन्द्रों में अंग्रेजों की फ़ौजों के
लिए रंगरूट चुने जाते थे । युक्तप्रदेश और पंजाब के अपढ़ लोग बंगाल की
अशिक्षित जनता की भांति नहीं हैं। एक तो वे बंगालियों की अपेक्षा शरीर से
बहुत कुछ बलवान् हैं, दूसरे अपने-पराए गर्व का स्मरण इनमें अब तक यथेष्ठ
परिमाण मे बना है। ये अपढ़ हैं सही, किन्तु राजनीतिक संस्कार इनमें अत्यन्त
प्रबल हैं । बंगाल की जनता और शिक्षित सम्प्रदाय की अपेक्षा भी यहाँ वालों मे
अपने धर्म पर बहुत अधिक प्रीति और मोह है। सुयोग्य नेता की अधीनता मे
परिचालित किए जाने से ये अशिक्षित लोग एक बार असम्भव को भी सम्भव कर
सकते हैं ।
इन लोगो में भी हमारा आना-जाना होने लगा था और इन लोगों से भी
हमको कुछ कम आशाजनक उत्तर न मिला था ।
इधर रासबिहारी भी पंजाब मे सैनिकों से मेल-मुलाकात करने लगे । वे जिस
मकान मे रहते थे उसमे किसी से भी भेंट न करते थे । दूसरों से मिलने-जुलने के
लिए दो-तीन मकान बिलकुल अलग थे । सिपाहियों से वे ऐसे ही एक अलग मकान
में मिला करते थे । इस समय के लाहौर के दो सैनिकों का जो हाल मैंने सुना
है वह सदा स्मरण रखने योग्य है। एक का नाम लछमनसिंह था । दूसरा सिपाही
मुसलमान था, उसका नाम मुझे याद नही। ये दोनो ही हवलदार थे । सिपाहियों
पर लछमनसिंह का खासा प्रभाव था । इस रेजिमेंट के एक सिपाही से बाद मे
अण्डमन मे मेरी बातचीत हुई । उससे पता चला कि लछमनसिंह ने बहुत पहले
से अपनी रेजिमेट मे एक छोटा-सा दल बना रखा था। वे बीच-बीच मे अक्सर
एकत्र होते थे । उस समय सिक्ख धर्म-सम्बन्धी पुस्तकें पढ़ी जातीं थी और अनेक
विषयो पर चर्चा इत्यादि होती थी। कई बार इसकी खबर पाकर रेजिमेट के
अंग्रेज़ हाकिम इसे रोकने का हुक्म दिया करते थे । इस प्रकार बीच-बीच में बन्द
होकर भी यह कार्य छोटे रूप में कई वर्ष से लगातार होता चला आ रहा था ।
रेजिमेट के सभी लोग लछमनसिंह को बड़ा धर्मात्मा और उन्नत चरित्र का पुरुष
समझते थे । लछमनसिंह को फाँसी का हुक्म हो चुकने पर जब मुसलमान हवलदार
की जान बख्श देने का लालच देकर सरकार की ओर से कुछ गुप्त बातों की टोह
लेने की कोशिश की गई और उससे कहा गया कि तुम एक काफ़िर के साथ-साथ
फाँसी पर चढना कैसे पसन्द करोगे, तब उस वीर देशभक्त मुसलमान हवलदार
ने बड़ा ही बढ़िया उत्तर दिया। उसने कहा- "अगर मैं लछमनसिंह के साथ-
साथ फाँसी पर टांगा जाऊँ तो मुझे बहिश्त मिले ।" उनको भी फाँसी हो गई।
विद्रोह का निर्दिष्ट दिन जितना ही समीप आने लगा उतना ही हम लोगों
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को खटका होने लगा कि 'क्या हम लोग पार पा जाएँगे ? इतनी बड़ी जिम्मेदारी
को क्या हम लोग ले सकेंगे ?' विप्लव के लिए जैसी तैयारी करने की तरकीब
हमें सूझ पड़ती थी उसमें तो हम लोगों ने कोई कसर रखी नही, किन्तु फिर भी
उस बहुत जल्द आनेवाले दिन के विचार से ही शरीर थर्रा जाता था । पंजाब
जाने से पहले दादा भी कई बार यही बात कह चुके थे ।
असल में हम लोग यह चाहते थे कि एक दिन एकाएक—बिना किसी को
अपनी इच्छा बतलाए—उत्तर भारत की छावनियों में तमाम अंग्रेजी सैनिकों पर,
एक ही दिन और ठीक एक ही समय, एकदम हमला कर दिया जाय और उस रेल-
पेल के वक्त जो लोग हमारी शरण में आ जाएं उन्हें कैद कर लिया जाए। विद्रोह
रात के वक्त शुरू किया जाय और उसी दम शहर के तार इत्यादि काटकर
अंग्रेज़ वालण्टियरों तथा तगड़े पुरुषों को क़ैद में डाल दिया जाय और फिर
खजाना लूट करके जेल से क़ैदी रिहा कर दिये जाएं । इसके पश्चात् उस शहर का
इन्तजाम अपने चुने हुए किसी योग्य पुरुष को सौंपकर तमाम बलवाइयों का दल
पंजाब में जाकर एकत्र हो । हम लोग यह न समझे बैठे थे कि गदर मचने पर
अन्त तक अंग्रेजों के साथ सम्मुख युद्ध में हमारी विजय ही होती जायगी, किन्तु
इसका हमे पक्का भरोसा था कि उल्लिखित रीति के अनुसार एक बार गदर
मचते ही एक ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय विचित्र दशा उपस्थित हो जाएगी कि यदि हम
कम-से-कम वर्ष-भर तक इस युद्ध को ठीक ढंग पर जारी रख सके तो विदेशों के
भिन्न-भिन्न राष्ट्रों के आपसी विद्वेष के फल से, और अंग्रेज़ों को शत्रुओं की
सहायता से, देश को स्वाधीन कर लेना हमारे लिए, अत्यन्त कठिन होने पर भी,
असम्भव न होगा ।
एक दिन पंजाब से यह समाचार लेकर कुछ आदमी आए कि विप्लव का
मुहूर्त पक्का कर लिया गया है। इक्कीस फरवरी को गदर मचा दिया जायगा ।
काम रात को ही आरम्भ होगा । यह सूचना मुझे इतवार को मिली थी। क्षण-भर
मे तीव्र आवेग से देह और मन न जाने कैसे भाव से कम्पित हो उठे । वह ऐसा
विचित्र भाव था जिसका पहले कभी अनुभव नहीं हुआ था । न ही उसे आनन्द
कहा जा सकता है और न आशंका ही । विप्लव का आरम्भ होने के लिए अब
एक हफ्ते-भर की देर थी। अपने अन्यान्य स्थानों को भी विप्लव की तारीख की
सूचना दे दी गई ।
बहुत ही शीघ्र होनेवाले इस विप्लव की तैयारी में हममे से बहुतो के मन में
एक अस्पष्ट अनिर्देश्य भय और सन्देह का भाव विद्यमान था, मानो हम किसी
भी तरह विप्लव आरम्भ हो जाने का निसन्देह विश्वास न कर सकते थे ।
सैकड़ो-हजारो वर्ष की दीनता और हीनता से, पराधीनता की हजारों तहों में
लिपटे रहने से, आत्मशक्ति को हम यहाँ तक खो बैठे थे कि स्वाधीनता के पूर्ण
आदर्श की कल्पना कर लेने और उस आदर्श को वास्तविक रूप देने की भरसक
चेष्टा कर चुकने पर भी और इसकी उत्कट अभिलाषा रखते हुए भी, हम मानो
काशी केन्द्र की कहानी | 95
यह विश्वास ही न कर सकते थे कि सचमुच विप्लव का झंडा खड़ा कर दिया
जायगा। जन्म-भर का दुखिया जिस प्रकार किसी भी तरह यह विश्वास नही कर
पाता कि किसी दिन उसका भी नसीब जागेगा—उसे सुख मिलेगा—जिस प्रकार
ऐसा व्यक्ति, जो सदा लापरवाही से दुतकारा गया है, जो बार-बार धोखा खा
चुका है, वह आशा की कल्पना मे मुग्ध होकर सारा जीवन भले बिता दे पर वह
किसी तरह यह विश्वास नही कर पाता कि किसी दिन वह भी फिर किसी का
प्रेमास्पद होगा, इसी तरह मै भी भारत के भाग्योदय के सम्बन्ध मे हताश हो
चुका था।
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विश्वासघात और निराशा
मन में ऐसा भाव रहने पर भी विप्लव की तैयारियां होने लगीं। बंगाल के
भिन्न-भिन्न केन्द्रों में काम करने वाले विप्लववादियों के लिए हाफ पेंट सिलवाये
गए। पंजाब में भारत की राष्ट्रीय पताका बना ली गई। उस पताका के रंगों
में अपनी विशेषता सूचित करने वाले खास रंग को स्थान दिलाने के लिए सिक्खों
ने बड़ा आग्रह किया। इसलिए हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख और भारत की अन्यान्य
जातियों के चिह्न-स्वरूप भारत की जातीय पताका चार रंगों की हुई। कहीं रसद
का बन्दोबस्त हुआ, कहीं-कहीं पर स्थानीय मोटर-लारी प्रभृति सवारियों की
फेहरिस्तें बनाई जाने लगीं। उत्तर भारत के समग्र विप्लवपन्थी बड़े ही उद्वेग से
पंजाब की ओर देखकर दिन गिनने लगे, मानो पंजाब से इशारा मिलते ही क्षणभर
में ज्वालामुखी पर्वत भीषण आग उगलने लगा। सुना गया था कि कदाचित श्री
श्रीमहाप्रभु जगबन्धु¹ ने कहा था कि बारह वर्ष की तपस्या के पश्चात् जिस दिन
वे अपनी गुफा से बाहर निकलेंगे उसी दिन से भारत की स्वाधीनता का युग
आरम्भ हो जायगा। मो वे भी, शायद, इसी 1915 ई० के फरवरी में अपनी गुफा
के बाहर आ गए। इस विप्लव का हाल उन्हें रत्तीभर भी मालूम न था। किन्तु
गुफा में बाहर आने पर उन्होंने संकेत से बतलाया कि अभी तो कुछ देर है, यह
कहकर वे फिर अपनी गुफा में चले गए। भगवान् का अभिप्राय हर वक्त ठीक-
ठीक समझ में नहीं आता। हज़ारों वर्ष से भारत का सारा पुरुषार्थ जिस तरह
बार-बार व्यर्थ होता रहा है उसी तरह इस बार भी समग्र उत्तर भारत की विप्लव
की इतनी बड़ी इमारत भरभराकर गिर पड़ी। कुसुमकली को खिलने के पहले
ही मानो वृन्त से तोड़कर देवता की पूजा में चढ़ा दिया गया। सुनिये यह क्योंकर
हुआ।
पंजाब के खुफ़िया पुलिस महकमे के एक मुसलमान डिप्टी सुपरिटेंडेंट ने
कृपालसिंह नाम के एक सिक्ख को विप्लव दल में भर्ती करा दिया। यह उक्त
अफ़सर का जासूस था। एक व्यक्ति जो रिश्ते में कृपालसिंह का एक भाई होता था
अंग्रेजों की फ़ौज में नौकर था और इस दल में भी शामिल था। प्रधानतया इसी
- ये बंगाल के एक पहुँचे हुए महात्मा हैं। बाल्यावस्था से ही ये साधना कर रहे हैं।
विश्वासघात और निराशा / 97
सैनिक की सहायता से कृपालसिंह का सम्भवतः फरवरी महीने में इस दल में प्रवेश
हुआ था। किन्तु इसके कुछ ही दिन बाद कृपालसिंह की गतिविधि पर बहुत लोगों
को सन्देह हो गया। तब कुछ नेताओं की सलाह हुई कि उस पर हरदम नज़र
रहनी चाहिए। इसका फल यह हुआ कि दो-चार दिन में ही इसका पुलिस के
हाकिमों के पास प्रतिदिन एक निर्धारित समय पर आना-जाना देख लिया गया।
इधर विप्लव का झण्डा खड़ा करने को दो-चार दिन की देर रह गई थी, इसलिए
सोचा गया कि इस दशा में यदि इसे दुनिया से हटा दिया जाय तो ऐसी विकट
गड़बड़ मच सकती है जिससे कि शायद हमारे अन्तिम मनोरथ की सिद्धि में बेढब
विघ्न आ पड़े। इस आशंका के मारे इस काँटे को निकालने का कुछ भी उद्योग
नहीं किया गया। ऐसी दशा में पूर्व बंगाल वाले उसे दुनिया के झंझटों से छुड़ाये
बिना कभी न मानते। अस्तु, बाद में पता चला कि विप्लव के लिए जो दिन मुकर्रर
किया गया था उसकी खबर पुलिस को लग चुकी है, क्योंकि कृपालसिंह से वह
दिन छिपाया नहीं गया था। अतएव निश्चय हुआ कि कृपालसिंह अब घर से बाहर
न जाने पावे और विप्लव की तारीख इक्कीस फरवरी के बदले उन्नीस फरवरी—
यानी दो दिन पहले—कर दी गई। किन्तु दुर्भाग्य से हो या होनहार के कारण
हो—कुछ भी कहिए—इस नई तारीख की सूचना छावनी में दे आने का काम
जिन्हें सौंपा गया था उन्होंने उक्त संवाद छावनी में पहुँचकर जब रासबिहारी से
कहा, "छावनी में उन्नीस फरवरी की इत्तिला दे आया" तब कृपालसिंह वहीं बैठा
हुआ था। कृपालसिंह का हाल सब लोगों को मालूम न था। शायद यह घटना
अट्ठारह-फरवरी की है। उसी दिन दोपहर के समय जब भोजन करने के लिए सब
लोग इधर-उधर चले गए तब कृपालसिंह ने वहाँ से टरक जाना चाहा। किन्तु
उस पर नज़र रखने के लिए जिनकी नियुक्ति कर दी गई थी उन्होंने उसका हाथ
पकड़कर खींच-तान नहीं की, बल्कि हर वक्त उसके साथ बने रहे। कृपालसिंह
ने मकान के बाहर आते ही देखा कि भेदिया पुलिस का एक आदमी साइकिल पर
उसी ओर आ रहा है। उससे कृपालसिंह की मुलाकात होते ही उन्नीस फरवरी
की इत्तला पुलिस को मिल गई और इसके कुछ घण्टे बाद धर-पकड़ शुरू हो गई।
जिस मकान में कृपालसिंह था उसमें सात-आठ गिरफ्तारियाँ हुईं। इसमें कुछ
मुखिया भी थे। जिस मकान में रासबिहारी रहते थे उसका पता दो-एक मुखियों
के सिवा और किसी को मालूम न था, क्योंकि जिनसे मिलने-जुलने की ज़रूरत
होती थी उनसे रासबिहारी अन्यान्य मकानों में ही मिलते थे। इधर मेगज़ीन पर
देशी सिपाहियों के बदले गोरों का पहरा हो गया। शहर के अंग्रेज़ वालण्टियर
फ़ौजी तैयारी से लैस कर दिये गए। उन सबको कैम्प बनाकर रहने का हुक्म हो
गया। युद्ध के समय चौकन्ने होकर रहने की जिस प्रणाली को 'पिकेट' करना कहते
हैं, उस प्रणाली से गोरे सिपाही और वालण्टियर लोग पहरा देने लगे। हथियार-
बन्द गोरे सिपाहियों की टोलियाँ फ़ौजी ढंग से बस्ती-भर में चक्कर लगाने लगीं।
लाहौर, दिल्ली, फिरोजपुर सभी जगह ऐसा ही हुआ। लोगों ने समझा कि इस
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फ़ौजी तैयारी का कारण यूरोपीय युद्ध का कोई खटका होगा। देशी सिपाहियों के
मन में घबराहट छा गई (उन्हीं के जो कि गुप्त-योजना में थे) इधर विप्लव की
तारीख़ दो दिन पहले कर देने से देहात के सब लोग अपने-अपने निर्दिष्ट स्थानो
में एकत्र नहीं हो सके। सिर्फ़ करतारसिंह सत्तर-अस्सी आदमियों के साथ
फिरोजपुर की छावनी में, जैसा कि पहले निश्चय हो चुका था, पहुँच गए। उस
समय वहाँ भी वही हाल था जैसा लाहौर में हो रहा था—मेगजीन देशी सिपाहियों
को हटाकर गोरों के अधिकार में दे दी गई थी और उस पर गोरे सिपाही बड़ी
मुस्तैदी से पहरा दे रहे थे। किन्तु करतारसिंह को लाहौर की नई घटना का कोई
समाचार नहीं मिला था।
बारकों में ऐसी चौकसी रहने पर भी करतारसिंह आकर काली पलटन के
हवलदार से मिले। हवलदार ने कहा कि अब कुछ दिन तक इन्तज़ार किये बिना
हम लोग कुछ भी नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसी दशा में यदि कुछ किया जायगा
तो सत्यानाश हो जायगा, इससे करतारसिंह ने समझ लिया कि इस बार अब कुछ
होने की आशा नहीं। उन्होंने ताड़ लिया कि दो-चार दिन में कैसी दशा हो जाने
वाली है। उन्होंने कई तरह सैनिकों को समझाने का असफल उद्योग किया कि
यदि आज इसी दम कुछ न किया जायगा तो फिर और कुछ होने का नहीं, यही
पहला और आखिरी मौक़ा है। परन्तु सिपाहियों ने अंग्रेज़ पहरेदारों की ओर
उँगली से इशारा करके कहा कि इस समय कुछ कर गुज़रने की कोशिश बिलकुल
बेकार होगी। आँखों देखते भला मक्खी कैसे निगली जा सकती है, जान-बूझकर
कैसे आग में कूदा जाय ? उस दिन भारतवासियों के हाथ में यदि उपयुक्त परि-
माण में अस्त्र-शस्त्र होते तो ऐसा विश्वासघात हो जाने पर भी भारत में विप्लव
किसी के रोके न रुक सकता था। अथवा यदि पहले से ही शिक्षित और उपयुक्त
मनुष्य विप्लव की दीक्षा लेकर फ़ौजों में भर्ती होते तो भी उस समय की विप्लव
की तैयारी व्यर्थ न जाती। उस दिन लाचार होकर करतारसिंह को खाली हाथ
लौट जाना पड़ा। देहात के आदमी अपने-अपने घर को चले गए। करतारसिंह
लाहौर पहुँचे। अब सारे पंजाब में धड़ाधड़ गिरफ्तारियाँ होने लगीं। जो लोग
पकड़े जाते थे उनमें से कोई-कोई भंडाफोड़ करके और भी दस-पाँच साथियों का
नाम-धाम प्रकट करने लगे। इस प्रकार कभी-कभी गोरी फ़ौज किसी गाँव को जा
घेरती और तब बहुत-से आदमी एक ही जगह गिरफ़्तार कर लिए जाते। भार-
तीय सिपाहियों के मन में एक तरह की बेचैनी देख पड़ी। रावलपिंडी की एक
काली पलटन बरखास्त कर दी गई। लाहौर में जहाँ-तहाँ खानातालाशियाँ और
गिरफ़्तारियाँ होने लगीं। किसी सिक्ख पर ज़रा-सा भी सन्देह होते ही उसे सीधा
थाने में पहुँचाया जाता था। इसी तरह पकड़-धकड़ होने में कभी-कभी दोनों तरफ़
से गोली चल जाती थी। दो ही चार दिन में मामला इस तरह संगीन हो गया।
अब दल में परस्पर एक-दूसरे पर विश्वास करना कठिन हो गया।—करतारसिंह
बुद्धिमान युवक थे। लाहौर आते ही वे सीधे रासबिहारी के डेरे पर पहुँचे और
विश्वासघात और निराशा / 99
किसी भी स्थान पर नहीं गए । क्योंकि रासबिहारी वाले मकान को बहुत कम
आदमी जानते थे, इसलिए वह सबसे अधिक सुरक्षित था । उस समय रासबिहारी
बड़ी उदासी से एक खाट पर मुर्दे की तरह पड़े थे । करतारसिंह भी चुपचाप उनकी
बगल में पड़ी हुई एक खाट पर लेट रहे । थकावट के मारे उनका शरीर शिथिल
हो रहा था । दोनों ही चुप थे । उनके उस म्लान मौन से मर्म की बड़ी ही निदा-
रुण पीड़ा प्रकट होने लगी । हम में से कितने लोगों को जीवन में उतनी बड़ी चोट
सहनी पड़ी है ? जिसकी कल्पना जितनी अधिक बड़ी होती है, भाव की सघनता
और गम्भीरता जिसकी जितनी ही अधिक होती है, उसको जीवन में उतनी ही
भारी चोट भी लगती है । उनकी कितनी बड़ी आशा छिन्न-भिन्न हो गई ? उनका
विराट् आयोजन बात की बात में धूल में मिल गया । ऐसी दशा में शिक्षित मन
का भाव भी बहुत-कुछ बदल जाता है, फिर सिपाहियों के मन पर यदि विषम
आतंक का भाव अपना अधिकार जमा ले तो इसमें विचित्रता कुछ भी नहीं । दोनों
नेताओं ने सोचा कि यूरोपीय महासमर की उलझन के दिनों में भी—ऐसा बढ़िया
सुभीता रहने पर भी, विप्लव दल सारी तैयारी करके भी कुछ नहीं कर सका ।
कौन जाने अब फिर कब ऐसा मौका मिलेगा ! —किन्तु यह भयंकर चोट खाकर
भी वे फिर कमर कसकर काम में लग गए । उनके हृदय की असीम आशा, हृदय
का बल मानो घटना चाहता ही नहीं था। इसी से वे फिर नये उत्साह से घोर
अन्धकारावृत भारत-आकाश के एकान्त कोने में अपने वक्षःस्थल की दीप-शिखा
के ही बल और भरोसे पर उस हताशाच्छन्न जीवन-मार्ग पर फिर आगे बढ़े। उनके
दिल में बड़ी गहरी चोट लगी थी किन्तु इससे उनके हाथ-पैर फूल नहीं गए। इतने
बड़े मानसिक बल की मर्यादा को समझने वाले हममें कितने मनुष्य हैं ? वीर की
इज्जत करना वीर ही जानता है, इसी से भारत के विप्लवकारी दल को अंग्रेज़
जिस दृष्टि से देखते थे, या देखते हैं, उस दृष्टि से उस दल को कितने भारतवासी
देख सकते हैं ? भारतीय विप्लवपन्थी दल को भारतवासियों ने सदा उपेक्षा की
दृष्टि से देखा है। यह लापरवाही भारतीय विप्लवकारी दल की छाती को, एक
बड़ी वज़नदार चट्टान की तरह, बड़ी बेदर्दी से दबाया करती थी। उक्त दल की
ऐसी अवज्ञा ओर किसी ने भी नहीं की। इस दल को जिनसे सबसे अधिक सहानु-
भूति की आशा थी उन्हीं ने उसकी लानत-मलामत की है, किन्तु इतने पर भी दल
ने हिम्मत नहीं छोड़ी। इस दलवालों के प्राण मानो किसी स्वप्नलोक की कल्पना
से भरपूर थे; अपने प्राणों की पूंजी के सिवा इन्हें और किसी का भरोसा न था—
विप्लव की यह तैयारी बेकार तो हो गई थी किन्तु सफलता-निष्फलता की कसौटी
से किसी भी आन्दोलन पर विचार करना ठीक नहीं। इस आन्दोलन पर विचार
करने के लिए यह देखना चाहिए कि इस आन्दोलन के पीछे कितने बड़े आदर्श
की कल्पना थी और इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए कितने व्यक्तियों ने प्राणों
की बाजी लगाकर कहाँ तक त्याग अंगीकार किया था। ऐसी-ऐसी बातों पर
ध्यान देकर ही इस आन्दोलन पर विचार किया जाना चाहिए। किस आदर्श की
100 / बन्दी जीवन
प्रेरणा से जाग्रत होकर भारत के युवकों ने हथेली में जान लेकर यह खेल खेला
तथा यूरोपीय महायुद्ध छिड़ने से पहले भारत में विप्लव करने की इच्छा रखने
वाला दल इसके लिए कैसी तैयारी कर रहा था, और पंजाब में गदर का उद्योग
निष्फल हो जाने के पश्चात् भारत के इस विप्लवपन्थी दल का क्या स्वरूप
हो गया था, इन बातों पर इस पुस्तक के अगले भागों में विचार करने की
इच्छा है।
द्वितीय भाग
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पहली निष्फलता के बाद
पंजाब की विप्लव योजना भले ही विफल हो गई हो किन्तु इतने से ही
भारत में विप्लव की चेष्टा शान्त नहीं हुई । एक-एक करके विप्लवियों की सभी
चेष्टाएँ व्यर्थ हुईं, एक-एक दो-दो करके कितने लोगों ने फांसी के तख्ते पर जान
न्योछावर कर दी, क़ैदखानों मे बन्दी होकर उनके कितने साथी तिल-तिल करके
प्राणों की बलि देने लगे और इसके कारण कितने ही परिवार बरबाद हो गए,
कितनों ही की माताएँ ये सब दृश्य अधिक न सह सकीं और पागल हो गईं, कितनों
ही के पिताओं की सरकारी नौकरी चली जाने से उनका परिवार ग़रीबी की
चक्की में पिसकर आश्रय की खोज में दर-दर फिरने लगा, समाज के अन्दर एक
मर्मवेधी अन्तर्नाद गहरा उठा, किन्तु विप्लवियों का दल फिर भी न दहला । क्यों
ऐसा हुआ ?
भारत के इतिहास में प्रायः देखा गया है कि किसी अच्छे नेता की अधीनता
में भारतवासियों ने कितनी ही बार वीरता दिखाकर भारत का मुख उज्ज्वल
किया है, कितनी बार असम्भव को सम्भव कर दिखाया और सारे संसार को
चकित कर दिया है, किन्तु भारत के दुर्भाग्य से ज्योंही यहाँ नेता का अभाव हुआ,
त्योंही फिर देश ने घोर निद्रा में मग्न होकर ऐसा रूप धारण कर लिया कि फिर
सहसा यह विश्वास नही होता कि यही भारत वह भारत है,—अतीत काल की
कीर्ति मानो उम समय भ्रम-सा दिखाई देने लगती है । इसी से हम देखते हैं कि
रणजीतसिंह के बाद खालसा समाज में वैसे किसी और शक्तिशाली पुरुष का
आविर्भाव न होने से सिक्ख जाति फिर सिर उठा ही नहीं सकी, राणा राजसिंह
के बाद राजपूताना मर-सा गया और महाराज छत्रसाल के बाद बुन्देलखण्ड ने
म्लान मौनता धारण कर ली । ऐसा होने का कारण है भारत की पूर्व सुकृति के
बल से कभी-कभी यहाँ भाग्यशाली महापुरुषों का आविर्भाव हो जाता है तो भी
प्रत्येक जीवन जिस प्रकार पुरुष-परम्परा में अपना प्रवाह बनाये रखता है उस
प्रकार भारत की जीवन प्रतिष्ठा नहीं होती है इसीलिए¹ यहाँ एक महापुरुष के
- मध्यकाल में आकर भारतीय राष्ट्र की जीवनधारा क्षीण हो जाती है, एक सतत प्रवाह के
साथ नहीं बहती यह ठीक है। भारतीय राष्ट्र के समूचे जीवन के लिए यह नहीं कहा जा
सकता। भारतीय इतिहास में Stagnation का यह काल शायद आज समाप्त हो रहा
है। यह एक इतिहास का गहरा प्रश्न है जिस पर यहाँ पूरा विचार नहीं हो सकता।
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बाद दूसरे महापुरुष का आविर्भाव सम्भव नहीं हो पाता ।
किन्तु इस बार के इस नवीन युवकों के विप्लव आन्दोलन की विशेषता
यह थी कि यह आन्दोलन किसी का मुंह नहीं देखता रहा । देश के गण्यमान्य
लब्धप्रतिष्ठ नेता लोग जब एक रास्ते पर चल रहे थे, तब यह गुमनाम गरीब
युवकों का सम्प्रदाय सैकड़ों विपदाओं में डगमगाये बिना अनेक बाधाओं और
कष्टों में हिम्मत हारे बिना, देश के नेताओं के विरुद्ध ही नहीं, प्रत्युत उनके द्वारा
निषिद्ध मार्ग में जाते हुए हिचकिचाता न था। महामति तिलक ने जेल से बाहर
आकर पुराने आदर्शों में भ्रम देखा और अपना मत बदल लिया, और अन्त में
देश छोड़कर जर्मनी जाने का संकल्प भी प्रकट किया । मनीषी विपिनचन्द्र भी
इंग्लैंड से वापस आकर अपनी सारी शक्ति के प्रयोग से यह प्रचार करने लग गये
कि पूर्ण स्वाधीनता का आदर्श भारत के लिए सुविधाजनक न होगा । ऋषि
अरविन्द राजनैतिक क्षेत्र से छुट्टी लेकर भगवान् की लीला के उपयुक्त आधार
बनने के लिए तपस्या करने लगे, और पूर्ण योग के आदर्श का, गृहस्थ और
संन्यासी जीवन में सामंजस्य की कल्पना का, तथा यह जगत् मिथ्या नहीं, उसी
सर्वशक्तिमान् का विलास ही है, लीलामय का लीलाक्षेत्र है, इत्यादि बातों का
प्रचार करने लगे । भारत के राजनैतिक क्षेत्र में उस समय उल्लेख योग्य और
कोई प्रभावशाली नेता नहीं रहे। इन्हीं कुछ नेताओं ने भारतवर्ष में पूर्ण स्वाधीनता
के आदर्श का पहले प्रचार किया था। उसी के फलस्वरूप समाज में जो प्राणों
की स्फूर्ति हुई, उसी नवजागरण की तरंग आज भी भारत के हृदय को विचित्र
प्रेरणा से स्पन्दित कर रही है। इनमें से दो जनों ने तो पुराने आदर्श को छोड़ ही
दिया; तीसरे ने मौन साध लिया । भारत के राजनैतिक क्षेत्र में कोई और पथ-
दर्शक न रहा । पर भारत के प्राण तो जाग चुके थे, उनमें गति आ चुकी थी ।
जहाँ जीवन है वहाँ प्राण तो पथ-प्रदर्शक होते हैं । अपने अन्तरात्मा की ओर ही
लक्ष्य रखकर जिन्होंने जीवन-पथ की यात्रा की थी, भारत के उन युवकों ने अपना
मत नहीं बदला । वे देश के नेताओं से सलाह लेकर तो इस काम में नहीं उतरे थे,
और न कभी इन नेताओं पर उन्होंने भरोसा ही रक्खा था। नेताओं ने जिन
आदर्शों का प्रचार किया था उन आदर्शों को पाने के लिए जो कुछ करना उचित
था सो उन्होंने कभी किया नहीं । भारत के लब्धप्रतिष्ठ विख्यात नेताओं में से
दो-एक को छोड़कर सबके विषय में कहा जा सकता है कि वे जिस बात को अपनी
विवेचना से उचित समझते हैं उसे कहते नहीं हैं और अनेक बार जो कहते हैं
सो करते नहीं हैं । अर्थात् जिस आदर्श का वे प्रचार करते हैं उसे कार्य में परिणत
करने को जितना अग्रसर होना चाहिए उतना अग्रसर वे नहीं होते ।
किन्तु भारत के उन नवयुवकों के विषय में यह बात नहीं कही जा सकती ।
देश के अधिकांश नेता, हम स्वयं क्या कुछ कर सकते हैं या नहीं कर सकते यही
देखकर फैसला देते हैं कि देश के लिए क्या कार्यक्रम उचित है, क्या अनुचित ;
किन्तु हमारे युवक जो कुछ सिद्धान्त तय करते हैं उसमें क्या कर सकते हैं, क्या
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नहीं कर सकते, इस बात की चर्चा नहीं रहती। बल्कि हमें क्या करना उचित है
यही उनके नजदीक सबसे बड़ी बात होती है। युवकों के मन की अवस्था ऐसी थी
या है इसी कारण उनमें से ही विप्लवियों का आविर्भाव सम्भव हुआ है। और
ठीक इसी कारण विप्लवी लोग जीवन-पथ में अग्रसर होते समय किसी बड़े नेता
का मुंह ताकते न रहते थे और न सफलता-निष्फलता का हिसाब जाँचा करते थे।
जिस चरित्र-बल के रहने से जीवन की समस्त व्यर्थताओं के बीच मनुष्य आदर्श-
भ्रष्ट नहीं होता, सम्पद-विपद में, सफलता-निष्फलता में, जीवन की सब अवस्थाओं
में जिस चरित्र-बल के जोर पर मनुष्य अपने आदर्श को लिये हुए डटा रहता है,
विप्लवियों के बीच वैसे चरित्र वाले लोग जिस परिमाण में पाये जाते हैं, विप्लव
दल के बाहर कुछ एक महाप्राण नेताओं को छोड़कर वैसे बलिष्ठ-चरित्र के आदमी
पाना दुर्लभ है। और विप्लव दल मे वैसे चरित्र का अभाव न था इसी कारण
विषम विपत्ति के दिनों में भी वे चंचल नही होते और पथ को दुर्गम देखकर वे
लोग कभी पीछे नही हटते । इसीलिए पंजाब की विप्लव चेष्टा के नष्ट हो जाने
पर भी भारत मे विप्लव का प्रयत्न उसी तरह चलता रहा ।
अपने दल के विश्वासघात के कारण पंजाब मे दो सौ आदमी पकड़े गए ।
पंजाब का विप्लव दल इस प्रकार प्रायः नष्ट हो गया। जो जीवन-मरण के खेल
के साथी थे, अब वे प्रायः सभी सरकार के क़ैदी हो गए। जीवन रहते भी मानो
वे मर से गए। पग-पग पर प्रमाणित होने लगा कि यह आग के साथ खेलना है।
आज जो हमारा साथी था कल वही पुलिस के पंजे में फँस जाता है। आज जो
विश्वासी था कल वह विपत्ति मे पड़कर कर्तव्याकर्तव्य भूल जाता है, जीवन का
आदर्श क्षुद्र-स्वार्थ के नीचे दब जाता है। विप्लवियों के जितने केन्द्र थे एक-एक
करके प्राय. सभी प्रकट हो गए। लाहौर के मुहल्ले-मुहल्ले मे खानातलाशी और
घर-पकड़ होने लगी। कही एक घर मे बम मिला, कही तार काटने के औजार
आदि। रासबिहारी जिस बैठक में रहते थे वह बैठक दो-चार आदमियो के सिवाय
किसी की जानी न थी इसी कारण तब ही वे निरापद रहे। पर हालात रोज
बदल रहे थे। कब क्या होता कुछ कहा नही जा सकता था—फिर नये सिरे से
विप्लव की आयोजना होने लगी। पहले तीन सिक्खों को लाहौर से बाहर भेजने
का संकल्प हुआ। ताँगा करके ये तीन सिक्ख जा रहे थे। सड़क के एक मोड़ पर
पुलिस ने ताँगा रोका, कारण—कि ये सिक्ख थे, सिक्ख देखते ही पुलिस ने ताँगा
रोककर कहा, एक बार उन्हें थाने जाना होगा और फिर उनका नाम-धाम आदि
लिखा जाने पर वे अपनी जाने की जगह जा सकेंगे। उनके पास रिवाल्वरें थीं।
इसके अलावा वे जानते थे कि पुलिस को पूर्ण सन्तोषजनक उत्तर वे दे न सकेंगे।
कहाँ से आते हैं, कहाँ जाते हैं यह बतलाना उनके लिए उस समय सम्भव न था;
आखिरकार थाने जाने का अर्थ ही था, अथाह समुद्र के तल मे डूब जाना। इस
दशा मे बगैर कुछ कहे-सुने पकड़े न जाकर एक बार उन्होने अन्तिम बार भाग्य-
परीक्षा कर देखी ! रिवाल्वर की गोली खाकर पुलिस के कई आदमी मरे और
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घायल हुए। तीन सिक्खों में से केवल एक को ही पकड़ा न जा सका, एक को एक
रास्ता चलते मोटे मुस्टंडे मुसलमान ने धर गिराया, तीसरे को पुलिस ने ही
पकड़ा। मुसलमान ने जिनको पकड़ा उनका नाम था जगतसिंह। सिक्खों में भी
उन दैत्याकार जगतसिंह के मुकाबले का कोई न था। वे जैसे बलवान् और साहसी
थे उनका शरीर भी ठीक वैसा ही दैत्य का-सा था। पुलिस के साथ यह कांड
करके वे पुलिस की आंख से बचकर निकल गए थे, किन्तु पूरी तरह बे-खटके होने
से पहले ही रास्ते के एक नलके से जल पीकर वे शान्ति से जब अपना मुंह पोंछ
रहे थे, उस समय उनकी अपेक्षा भी बलवान् एक मुसलमान ने आकर दोनों हाथों
से उनके दोनों पैर इस तरह जोर से दबाकर पकड़ लिए कि जगतसिंह फिर हिल न
सके। जगतसिंह धक्का न संभाल सके और गिर पड़े। मुकदमे में जगतसिंह
को फांसी हुई। इस प्रकार रासबिहारी के कुछ विश्वस्त आदमी फिर पकड़े गए।
यथासमय यह समाचार रासबिहारी के पास पहुँचा। उस समय सारे लाहोर शहर
में उन्हें आश्रय देनेवाला कोई नहीं था। उनका दल उस समय एकदम टूट गया
था। उनके साथी-सहायकों में से उस समय तक कुछ गुमनाम सिख युवक ही
बचे थे। अपार समुद्र के मध्य में मानो वे उस समय पालविहीन डोंगी पर किसी
तरह बह रहे थे। जो पुलिस वाले मरे और घायल हुए वे भारतवासी थे, जो
पकड़े गए, फांसी पर चढ़े या जेल में सड़ने लगे वे भी भारतवासी थे और इनमें
आपस में कोई द्वेष, कोई विरोध न था !
इस समय के कुछ पहले ही मुसलमानों के बीच भी विप्लव का षड्यन्त्र
आरम्भ होता है। आगे इस मुसलमान् जागृति की विस्तृत आलोचना करनी
होगी, इसलिए अभी यहाँ इतना ही कहना यथेष्ठ है कि तुर्की-इटालियन युद्ध के
बाद से भारतीय मुसलमानों में एक नई चेतना का संचार होता है। किन्तु हमारे
दल के साथ मुसलमान दल का संयोग होता है ठीक उस समय से, जिस समय की
कहानी अब हम सुना रहे हैं। उनके साथ परामर्श करके रासबिहारी ने ठीक
किया कि अब काबुल जाकर ही पहले आश्रय लेना होगा और वही ठहरकर
भारत की विप्लव चेष्टा को नियन्त्रित करना होगा। उन्होंने एक मौलवी से
कलमा पढ़ना सीखा। खालिस मुसलमान के वेश में ही काबुल जाना तय पाया।
कुछ सिख नेता भी रासबिहारी के साथ जाते। सब ठीक हो चुका था, और दो-
एक दिन में ही यात्रा करनी होती, जब एक दिन दोपहर को रासबिहारी बोल
उठे, "नही भाई, काबुल जाना अब नही होता, मुझे जान पड़ता है कि इस समय
काबुल की ओर जाने से विपत्ति आने की सम्भावना है, दूसरी ओर लाहोर में
भी अब घड़ी-भर और देर करने की इच्छा नहीं होती, दिल कहता है इस समय
देर करने से जरूर आफ़त आएगी। रासबिहारी के दिल में जब जो आता था
कभी उससे उलटा न करते थे। इसलिए उसी वक्त ठीक कर डाला कि उसी
दिन रात की गाड़ी से रवाना होंगे। काशी के दो युवक इस समय उनके पास
थे। एक का नाम था. विनायकराव कापले, वे मराठा थे पर बहुत दिन काशी
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में रहे थे, दूसरे युवक का नाम हमारे समझने की सुविधा के लिए धरा जाता है,
गंगाराम । यह बहुत दिन तक फ़रार रहे। रासबिहारी और विनायकराव रात
को आठ बजे की गाड़ी से रवाना हुए। तय हुआ कि गंगाराम कुछ सिक्ख नेताओं
को लेकर दो-एक दिन बाद काशी आएँगे । करतारसिंह, हरनामसिंह और दूसरे
कई सिक्ख नेताओं ने काबुल जाना ठीक किया।
रासबिहारी जिस मकान में रहते थे वही मकान सबकी अपेक्षा बेखटक था,
क्योंकि इसका पता बहुत लोगों को न था। जिन सब मकानों पर वे भिन्न-भिन्न
लोगों से मिलते-जुलते थे, उन सब मकानों से इस समय कोई सम्बन्ध न रखा जाय,
रासबिहारी का यह विशेष अनुरोध था। किन्तु यह होने पर भी गंगाराम रास-
बिहारी को स्टेशन पर पहुँचाकर लौटते समय एक बार उसी पुराने मकान को
झाँककर देखने गए, उनकी इच्छा थी यदि खटका न देखा तो अपने बहुत-से
कपड़े-लत्ते जो उस मकान में थे लेते आएँगे । किन्तु पुलिस ने पहले से ही इन सब
मकानों के चारों ओर अपने आदमी रख छोड़े थे । गंगाराम ने उस मकान के
निकट जाकर झाँका ही था कि पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया।
पकड़े जाने के कुछ दिन के अन्दर ही गंगाराम ने पुलिस के नजदीक सब बातें
मान ली । उनके इज़हार से पुलिस ने उस मकान का सुराग भी पा लिया जिसमें
रासबिहारी अन्तिम बार ठहरे थे । उस मकान की खानातलाशी लेने पर पुलिस
को उनके हाथ के लिखे दो-एक कागज़ भी मिले। इससे पहले जिन्होंने इज़हार
दिये थे उनसे ही पुलिस को पता लग चुका था कि रासबिहारी फिर पंजाब आए
थे और इसी लाहौर में थे। गंगाराम को पाकर उन्होंने यह भी सुन लिया कि
भयंकर धर-पकड़ के समय भी रासबिहारी लाहौर में ही थे । पुलिस यह भी
जान गई कि रासबिहारी काशी से आए थे और फिर काशी वापस चले गए हैं।
मौत के मुंह से इसी प्रकार रासबिहारी कई बार बचे थे। इससे बहुत दिन
पहले की बात है, एक दफे और रासबिहारी इसी लाहौर में आए थे, उस समय
तक वे देहरादून ही में नौकरी करते थे, कुछ दिन की छुट्टी ली थी और दिल्ली
होकर लाहौर की तरफ दल का काम-काज देखने आए थे। इधर दिल्ली में
खानातलाशी और गिरफ्तारियां आरम्भ हो गईं। रासबिहारी इस बारे में कुछ
भी न जानते थे । दिल्ली की खानातलाशी के फलस्वरूप पुलिस को दीनानाथ
नामी लाहौर के एक युवक का सन्धान मिला, एक आदमी के मकान पर रास-
बिहारी का ट्रंक और कपड़े-लत्ते आदि भी मिल गए। किन्तु लाहौर में रासबिहारी
ठीक किस जगह हैं इसका सुराग पुलिस को न मिला। तो भी दीनानाथ का
ठिकाना पुलिस को मिल गया और लाहौर मे उसे पकड़ लिया गया। तब भी
रासबिहारी लाहौर में थे । दीनानाथ जिस दिन पकड़ा गया उससे अगले दिन
शाम के समय डी० ए० वी० कालेज के बोर्डिंग के एक विद्यार्थी ने रासबिहारी के
पास आकर उन्हें दीनानाथ की गिरफ़्तारी की खबर दी। तब तक उन्हें यह
खबर न मिली थी। सबकी सलाह से तय पाया कि उसी रात रासबिहारी लाहौर
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छोड़ दें। रासबिहारी दिल्ली चले गए। इस तरह सलाह-मशविरा करते-करते
रात अधिक हो जाने पर वह विद्यार्थी बोर्डिंग में वापस न गया, जिस मकान पर
रासबिहारी थे वह रात उसने भी वहीं काट दी। सबेरे पुलिस ने वही मकान घेर
लिया। तीन युवक गिरफ्तार हुए पर रासबिहारी न पकड़े गए। दीनानाथ जिस
दिन पकड़ा गया उसके अगले दिन रात के समय उसने सब बातें खोल दीं। यदि
एक दिन पहले वह मुखबिर हो जाता तो रासबिहारी भी पकड़ लिए जाते।
इधर फिर दिल्ली आकर रासबिहारी अमीरचन्द के मकान की ओर जाने
को ही थे कि राह में उन्होंने थाने के नजदीक अमीरचन्द के मकान वाले नौकर
को कहीं जाते देखा। उन्हें जरा सन्देह-सा हुआ, नौकर को बुलाकर पूछा अमीर-
चन्द कहाँ है। नौकर मालिक के दोस्त को पहचानकर बड़ी हड़बड़ाहट से बोल
उठा—"बाबू हमारे मकान पर न जाएँ, मालिक को पुलिस पकड़ ले गई है, मैं
उनके लिए थाने पर खाना ले जा रहा हूँ!" रासबिहारी के हाथ में उस समय
जो रुपया-पैसा था उससे कलकत्ते तक का रेल का टिकट खरीदा जा सकता था।
वे फिर स्टेशन लौटकर एकदम सीधा चन्दननगर चले आए। उस दिन से रास-
बिहारी का अज्ञातवास आरम्भ होता है। तब से "Thou art but a wander-
ing voice" (तू एक उड़ती-फिरती आवाज है) की तरह यह पकड़ा, वह पकड़ा
होने पर भी मानो उनका पता नहीं मिलता। इस प्रकार बार-बार विपत्ति से
उद्धार पाकर भी वे फिर उसी विपत्ति में पड़ते रहे।
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काशी अंचल की कहानी
काशी में बैठे-बैठे हम पंजाब की दुरवस्था की बात कुछ भी न जान पाए
थे । तो भी कुछ दिन तक पंजाब का कोई संवाद न पाने पर हम कुछ चिन्तित
होने लगे । रासबिहारी इस बार जब पहले पंजाब गए थे तब कह गए थे कि जल्दी
ही पंजाब से कुछ सिक्ख कार्यकर्त्ताओं को भेज देंगे, क्योंकि सिक्खों की पल्टन में
यदि सिक्ख ही जाकर काम करें तो खूब फल हो । पंजाब से जब करतारसिंह
आदि एक बार काशी आए थे तब उनकी ज़बानी भी सुना था कि रासूदा¹ शीघ्र
ही कुछ सिक्खों को इधर भेजना चाहते हैं । उस समय तक कानपुर, लखनऊ,
'फैजाबाद (अयोध्या) आदि शहरों में हमारे आदमी नहीं गए थे। विप्लव ठीक
कब आरम्भ होगा, यह संवाद एक आदमी हमारे पास ले आया था, और इसके
बाद हमें पंजाब का और कोई संवाद नहीं मिला था। पंजाब से कुछ लोग
सीधे फैजाबाद ज़रूर आए थे, एवं कानपुर और लखनऊ में भिन्न-भिन्न समय
'पर पंजाब से ही लोग भेजे गए थे । इधर हम लोग काशी की छावनी में आने-
जाने लगे । 21 फरवरी सन् 1915 रविवार को विप्लव शुरू होने की बात थी,
हम शनिवार रात तक काशी की छावनी में गए थे । उधर पंजाब में विप्लव की
तारीख 21 से हटाकर 19 कर दी गई थी उसका हमेंकुछ भी पता न था। शनिवार
रात को भी काशी की पल्टन के हवलदार और नायब हवलदार आदि ने हमें
आश्वासन दिलाया था कि विप्लव आरम्भ हो जाने पर वे निश्चय ही विप्लव दल
का साथ देंगे ।
किन्तु इस समय कई विचारों ने हमें एकदम चंचल कर दिया था । हम
लोग सोचते थे कि अंग्रेजों के विरुद्ध विप्लव करने जा रहे हैं, और यदि सचमुच
विप्लव आरम्भ हो गया तो अपने परिवारों को कहाँ किस दशा में रक्खा
जाएगा । विप्लव आरम्भ होने पर विप्लवी दल को दिल्ली ले जाकर दूसरे
विप्लवी दल के साथ मिलाना होगा। उस अवस्था में यदि अंग्रेज़ी फ़ौज आकर
काशी पर दखल करे तो हमारे परिवारों की क्या अवस्था होगी ? इस भावना
- बड़े भाई को बँगला में दादा कहते हैं, उसका संक्षेप 'दा' भी हो जाता है !
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ने हमें थोड़ा व्याकुल नहीं किया।
विप्लव सचमुच शुरू हो जाने पर पल्टन के सिपाहियों को तथा शहर के
गुंडों को संयत शासन के अधीन रखना कितना कठिन काम होगा, यह भी हम
भूल न गए थे, विप्लव के समय सैकड़ों-हजारों परिवारों के मंगल-अमंगल का
उत्तरदायित्व भी हमीं लोगों के सिर पर था, यह बात भी कभी हमारे ध्यान से
नहीं हटी । किन्तु विप्लव जब करना ही था तब समस्याएँ चाहे कितनी कठिन
क्यों न हों इनका समाधान भी हमें करना ही था ।
और भी एक विचार ने हमें उससमय चिन्तित किया था। हम सोचते थे कि
यदि दूसरे स्थानोंमें विप्लव आरम्भ हो जाय और हमारे यहाँ न हो, तब हम लोगों
की, जो पहले से ही पुलिस की विष-दृष्टि में पड़ चुके थे, क्या गति होगी ? और
दूसरे स्थानों में विप्लव आरम्भ हुआ कि नहीं, यह भी जानेंगे कैसे ? इस अवस्था
में अन्यान्य केन्द्रों की पक्की बात जाने बिना काशी की पल्टन को उभार देना
युक्ति-संगत होगा कि नही, यह हम सोचकर तय न कर पाए थे । हम जानते थे
कि काशी में हमारे अपने दल को जो कुछ शक्ति थी उससे हम काशी की अंग्रेज
छावनी पर हमला कर सकते थे । ऐसी अवस्था में देशी पल्टन को भी कोई एक
पक्ष अवश्य लेना पड़ता, और हमारा विश्वास था कि देशी पल्टन हमारी तरफ
ही योग देगी। इस तरह हम जानते थे कि इच्छा हो तो हम काशी में विप्लव का
सूत्रपात कर सकते हैं। किन्तु और स्थानों की बात जाने बिना, विशेषतः पंजाब
की बात जाने बिना कुछ करने की हिम्मत न होती थी । यदि अपने दल में काफ़ी
तादाद में अस्त्र-शस्त्र रहते तो भी ऐसा करने की हिम्मत हो जाती । जो हो इन
सब भावनाओं के बाद हमने तय किया था कि रेलवे स्टेशन और तार-घर के
पास जांच-पड़ताल करके ही हमें इस बात का संशय दूर करना होगा कि पजाब
की ओर से तार आने में कुछ गोल-माल हुआ है कि नही। यदि तार न आया
तो जान लेंगे कि वहाँ कुछ गोलमाल शुरू हो गया है, विचार था कि विप्लव शुरू
होने के कुछ पहले ही सब तरफ तार काट दिए जाएँगे । हमें स्टेशन पर ट्रेनों के
आने-जाने में भी गोलमाल होने की आशा थी ।
हमने स्थिर किया था कि इस प्रकार अन्य स्थानों की बात जानकर ही
काशी की अंग्रेजी पल्टन पर आक्रमण करेंगे और रात के समय समर्थ अंग्रेज पुरुषों
को जेल में डालकर जेल के कैदियों को मुक्त कर देंगे । हमने समझा था कि
जेल के क़ैदी इस तरह हमारी मदद से छूट जाएँगे तो उनमें से कुछ तो ज़रूर
हमारा साथ देंगे । तब तक हम जेल न गए थे, इसलिए जेलों की अवस्था कुछ भी
न जानते थे। यह तो अब जान पाया है कि यह आशा कैसी बड़ी दुराशा थी।
जो हो, हमारा मतलब यह था कि आधी रात को मेगज़ीन और खजाना हाथ में
करके कुछ लोगों को एकदम इलाहाबाद और दानापुर की ओर विप्लव की
खबर के साथ भेज देते, और सवेरा होने पर आम खुली सभा बुलाकर शहर के
धनी लोगों से धन-संग्रह करके शहर के युवकों से वालण्टियर होने का अनुरोध