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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 408 में से

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पृष्ठ 108

106 / बन्दी जीवन
घायल हुए। तीन सिक्खों में से केवल एक को ही पकड़ा न जा सका, एक को एक
रास्ता चलते मोटे मुस्टंडे मुसलमान ने धर गिराया, तीसरे को पुलिस ने ही
पकड़ा। मुसलमान ने जिनको पकड़ा उनका नाम था जगतसिंह। सिक्खों में भी
उन दैत्याकार जगतसिंह के मुकाबले का कोई न था। वे जैसे बलवान् और साहसी
थे उनका शरीर भी ठीक वैसा ही दैत्य का-सा था। पुलिस के साथ यह कांड
करके वे पुलिस की आंख से बचकर निकल गए थे, किन्तु पूरी तरह बे-खटके होने
से पहले ही रास्ते के एक नलके से जल पीकर वे शान्ति से जब अपना मुंह पोंछ
रहे थे, उस समय उनकी अपेक्षा भी बलवान् एक मुसलमान ने आकर दोनों हाथों
से उनके दोनों पैर इस तरह जोर से दबाकर पकड़ लिए कि जगतसिंह फिर हिल न
सके। जगतसिंह धक्का न संभाल सके और गिर पड़े। मुकदमे में जगतसिंह
को फांसी हुई। इस प्रकार रासबिहारी के कुछ विश्वस्त आदमी फिर पकड़े गए।
यथासमय यह समाचार रासबिहारी के पास पहुँचा। उस समय सारे लाहोर शहर
में उन्हें आश्रय देनेवाला कोई नहीं था। उनका दल उस समय एकदम टूट गया
था। उनके साथी-सहायकों में से उस समय तक कुछ गुमनाम सिख युवक ही
बचे थे। अपार समुद्र के मध्य में मानो वे उस समय पालविहीन डोंगी पर किसी
तरह बह रहे थे। जो पुलिस वाले मरे और घायल हुए वे भारतवासी थे, जो
पकड़े गए, फांसी पर चढ़े या जेल में सड़ने लगे वे भी भारतवासी थे और इनमें
आपस में कोई द्वेष, कोई विरोध न था !
इस समय के कुछ पहले ही मुसलमानों के बीच भी विप्लव का षड्यन्त्र
आरम्भ होता है। आगे इस मुसलमान् जागृति की विस्तृत आलोचना करनी
होगी, इसलिए अभी यहाँ इतना ही कहना यथेष्ठ है कि तुर्की-इटालियन युद्ध के
बाद से भारतीय मुसलमानों में एक नई चेतना का संचार होता है। किन्तु हमारे
दल के साथ मुसलमान दल का संयोग होता है ठीक उस समय से, जिस समय की
कहानी अब हम सुना रहे हैं। उनके साथ परामर्श करके रासबिहारी ने ठीक
किया कि अब काबुल जाकर ही पहले आश्रय लेना होगा और वही ठहरकर
भारत की विप्लव चेष्टा को नियन्त्रित करना होगा। उन्होंने एक मौलवी से
कलमा पढ़ना सीखा। खालिस मुसलमान के वेश में ही काबुल जाना तय पाया।
कुछ सिख नेता भी रासबिहारी के साथ जाते। सब ठीक हो चुका था, और दो-
एक दिन में ही यात्रा करनी होती, जब एक दिन दोपहर को रासबिहारी बोल
उठे, "नही भाई, काबुल जाना अब नही होता, मुझे जान पड़ता है कि इस समय
काबुल की ओर जाने से विपत्ति आने की सम्भावना है, दूसरी ओर लाहोर में
भी अब घड़ी-भर और देर करने की इच्छा नहीं होती, दिल कहता है इस समय
देर करने से जरूर आफ़त आएगी। रासबिहारी के दिल में जब जो आता था
कभी उससे उलटा न करते थे। इसलिए उसी वक्त ठीक कर डाला कि उसी
दिन रात की गाड़ी से रवाना होंगे। काशी के दो युवक इस समय उनके पास
थे। एक का नाम था. विनायकराव कापले, वे मराठा थे पर बहुत दिन काशी