बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 107, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहली निष्फलता के बाद / 105
नहीं कर सकते, इस बात की चर्चा नहीं रहती। बल्कि हमें क्या करना उचित है
यही उनके नजदीक सबसे बड़ी बात होती है। युवकों के मन की अवस्था ऐसी थी
या है इसी कारण उनमें से ही विप्लवियों का आविर्भाव सम्भव हुआ है। और
ठीक इसी कारण विप्लवी लोग जीवन-पथ में अग्रसर होते समय किसी बड़े नेता
का मुंह ताकते न रहते थे और न सफलता-निष्फलता का हिसाब जाँचा करते थे।
जिस चरित्र-बल के रहने से जीवन की समस्त व्यर्थताओं के बीच मनुष्य आदर्श-
भ्रष्ट नहीं होता, सम्पद-विपद में, सफलता-निष्फलता में, जीवन की सब अवस्थाओं
में जिस चरित्र-बल के जोर पर मनुष्य अपने आदर्श को लिये हुए डटा रहता है,
विप्लवियों के बीच वैसे चरित्र वाले लोग जिस परिमाण में पाये जाते हैं, विप्लव
दल के बाहर कुछ एक महाप्राण नेताओं को छोड़कर वैसे बलिष्ठ-चरित्र के आदमी
पाना दुर्लभ है। और विप्लव दल मे वैसे चरित्र का अभाव न था इसी कारण
विषम विपत्ति के दिनों में भी वे चंचल नही होते और पथ को दुर्गम देखकर वे
लोग कभी पीछे नही हटते । इसीलिए पंजाब की विप्लव चेष्टा के नष्ट हो जाने
पर भी भारत मे विप्लव का प्रयत्न उसी तरह चलता रहा ।
अपने दल के विश्वासघात के कारण पंजाब मे दो सौ आदमी पकड़े गए ।
पंजाब का विप्लव दल इस प्रकार प्रायः नष्ट हो गया। जो जीवन-मरण के खेल
के साथी थे, अब वे प्रायः सभी सरकार के क़ैदी हो गए। जीवन रहते भी मानो
वे मर से गए। पग-पग पर प्रमाणित होने लगा कि यह आग के साथ खेलना है।
आज जो हमारा साथी था कल वही पुलिस के पंजे में फँस जाता है। आज जो
विश्वासी था कल वह विपत्ति मे पड़कर कर्तव्याकर्तव्य भूल जाता है, जीवन का
आदर्श क्षुद्र-स्वार्थ के नीचे दब जाता है। विप्लवियों के जितने केन्द्र थे एक-एक
करके प्राय. सभी प्रकट हो गए। लाहौर के मुहल्ले-मुहल्ले मे खानातलाशी और
घर-पकड़ होने लगी। कही एक घर मे बम मिला, कही तार काटने के औजार
आदि। रासबिहारी जिस बैठक में रहते थे वह बैठक दो-चार आदमियो के सिवाय
किसी की जानी न थी इसी कारण तब ही वे निरापद रहे। पर हालात रोज
बदल रहे थे। कब क्या होता कुछ कहा नही जा सकता था—फिर नये सिरे से
विप्लव की आयोजना होने लगी। पहले तीन सिक्खों को लाहौर से बाहर भेजने
का संकल्प हुआ। ताँगा करके ये तीन सिक्ख जा रहे थे। सड़क के एक मोड़ पर
पुलिस ने ताँगा रोका, कारण—कि ये सिक्ख थे, सिक्ख देखते ही पुलिस ने ताँगा
रोककर कहा, एक बार उन्हें थाने जाना होगा और फिर उनका नाम-धाम आदि
लिखा जाने पर वे अपनी जाने की जगह जा सकेंगे। उनके पास रिवाल्वरें थीं।
इसके अलावा वे जानते थे कि पुलिस को पूर्ण सन्तोषजनक उत्तर वे दे न सकेंगे।
कहाँ से आते हैं, कहाँ जाते हैं यह बतलाना उनके लिए उस समय सम्भव न था;
आखिरकार थाने जाने का अर्थ ही था, अथाह समुद्र के तल मे डूब जाना। इस
दशा मे बगैर कुछ कहे-सुने पकड़े न जाकर एक बार उन्होने अन्तिम बार भाग्य-
परीक्षा कर देखी ! रिवाल्वर की गोली खाकर पुलिस के कई आदमी मरे और