बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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विश्वासघात और निराशा
मन में ऐसा भाव रहने पर भी विप्लव की तैयारियां होने लगीं। बंगाल के
भिन्न-भिन्न केन्द्रों में काम करने वाले विप्लववादियों के लिए हाफ पेंट सिलवाये
गए। पंजाब में भारत की राष्ट्रीय पताका बना ली गई। उस पताका के रंगों
में अपनी विशेषता सूचित करने वाले खास रंग को स्थान दिलाने के लिए सिक्खों
ने बड़ा आग्रह किया। इसलिए हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख और भारत की अन्यान्य
जातियों के चिह्न-स्वरूप भारत की जातीय पताका चार रंगों की हुई। कहीं रसद
का बन्दोबस्त हुआ, कहीं-कहीं पर स्थानीय मोटर-लारी प्रभृति सवारियों की
फेहरिस्तें बनाई जाने लगीं। उत्तर भारत के समग्र विप्लवपन्थी बड़े ही उद्वेग से
पंजाब की ओर देखकर दिन गिनने लगे, मानो पंजाब से इशारा मिलते ही क्षणभर
में ज्वालामुखी पर्वत भीषण आग उगलने लगा। सुना गया था कि कदाचित श्री
श्रीमहाप्रभु जगबन्धु¹ ने कहा था कि बारह वर्ष की तपस्या के पश्चात् जिस दिन
वे अपनी गुफा से बाहर निकलेंगे उसी दिन से भारत की स्वाधीनता का युग
आरम्भ हो जायगा। मो वे भी, शायद, इसी 1915 ई० के फरवरी में अपनी गुफा
के बाहर आ गए। इस विप्लव का हाल उन्हें रत्तीभर भी मालूम न था। किन्तु
गुफा में बाहर आने पर उन्होंने संकेत से बतलाया कि अभी तो कुछ देर है, यह
कहकर वे फिर अपनी गुफा में चले गए। भगवान् का अभिप्राय हर वक्त ठीक-
ठीक समझ में नहीं आता। हज़ारों वर्ष से भारत का सारा पुरुषार्थ जिस तरह
बार-बार व्यर्थ होता रहा है उसी तरह इस बार भी समग्र उत्तर भारत की विप्लव
की इतनी बड़ी इमारत भरभराकर गिर पड़ी। कुसुमकली को खिलने के पहले
ही मानो वृन्त से तोड़कर देवता की पूजा में चढ़ा दिया गया। सुनिये यह क्योंकर
हुआ।
पंजाब के खुफ़िया पुलिस महकमे के एक मुसलमान डिप्टी सुपरिटेंडेंट ने
कृपालसिंह नाम के एक सिक्ख को विप्लव दल में भर्ती करा दिया। यह उक्त
अफ़सर का जासूस था। एक व्यक्ति जो रिश्ते में कृपालसिंह का एक भाई होता था
अंग्रेजों की फ़ौज में नौकर था और इस दल में भी शामिल था। प्रधानतया इसी
- ये बंगाल के एक पहुँचे हुए महात्मा हैं। बाल्यावस्था से ही ये साधना कर रहे हैं।