बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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टोरियल सेना के छोकरों और दुबले-पतले लम्बे नौजवान सिपाहियों को देखकर
हम लोग चाहते थे कि अब बहुत जल्द हमें शक्ति की जाँच करने का मौका मिल
जाय । उन दिनों समूचे उत्तर भारत की दो-तीन बड़ी-बड़ी छावनियों और
काबुल के सीमान्त देश के सिवा कहीं भी तीन सौ से अधिक गोरे सिपाही न थे ।
बड़ी-बड़ी छावनियों में भी इनकी तादाद एक और दो हज़ार के बीच में थी ।
भिन्न-भिन्न छावनियों में जितने अस्त्र-शस्त्र थे उनकी सहायता से कम-से-कम
वर्षभर तक तो मज़े में युद्ध जारी रक्खा जा सकता था। हम लोगों ने उन सब
बातों का रत्ती-रत्ती पता लगा लिया था जिनका कि लग सकता था । जैसे—
किस रेजिमेंट में कितने बाक्स राइफलें हैं ? कारतूसों के कितने बक्स हैं ? मेग-
ज़ीन पर किनका पहरा रहता है और कैसा पहरा रहता है ? इत्यादि । हिन्दुस्तानी
फ़ौजों की मानसिक दशा उस समय बहुत ही ख़राब थी। उन्हें हर घड़ी यह
खटका बना रहता था कि बस अब यूरोप जाने का हुक्म होता ही है। जो दम
गुज़रता था ग़नीमत समझा जाता था। छावनियों में पहुँचते ही हमारे युवकों का
सिपाही लोग बड़ा आदर-सत्कार करते और बड़े आग्रह से उनकी बातें सुनते थे ।
एक बार एक युवक किसी छावनी में गया; तब उसी दिन, रात को वहाँ सिपाहियों
की बैठक हुई। उस बैठक में बड़े ओहदेदारों के सिवा और सभी सिपाही एकत्र
हुए, उस विदेश से आये हुए युवक की बातें उन लोगों ने बड़े आग्रह से सुनीं ।
अन्त में उन लोगो ने कहा कि इस विद्रोह मे हम लोग अगुआ न बनेंगे; हाँ, हम लोग
ऐसा ज़रूर करेंगे जिसमें विप्लव के समय हमारे हाथ से मेगज़ीन न निकल जाने
पाए, जब गदर सचमुच मच जाएगा तब हम भी उसमें शामिल हो जाएँगे ।
काशी की रेजिमेंट में मैं और भी कई बार गया था। इस रेजिमेंट में दिल्ला-
सिंह के सिवा और सभी अच्छे आदमी थे। वे लोग सचमुच देश के भले के लिए
विप्लव में शामिल होने को तैयार थे। दिल्लासिंह ने एक दिन हम लोगों से पूछा
—'बाबू, देश के स्वाधीन हो जाने पर क्या हम लोगों को कुछ जागीर या माफ़ी
वगैरह मिलेगी ?' एक दिन गनकाटन ले जाकर उसे हम लोगों ने अपनी करामात
दिखलाई और कहा कि देखो यह मामूली रूई नहीं है, इसमें आग छूते ही किस
प्रकार भक से सारी की सारी जल उठती है, तनिक-सी भी बाकी नहीं रहती । यह
लीला देखकर वे लोग अचरज करते थे । इस प्रकार हम लोग कई तरह से दिल्ला-
सिंह और उसके अनुयायी साथियों को अपने मत में लाने की कोशिश करते थे ।
इस रेजिमेंट के कुछ आदमियों से बाद को मेरी भेंट हुई । उन्होंने बड़े भक्तिभाव
से माथा झुकाकर मुझसे बातचीत की थी। इनमें एक सिपाही की उम्र पचास
से ऊपर थी । उसने मुझसे कहा--बाबू मेरे साथ जान-पहचान वाले अब कोई
भी जीवित नहीं। एक मैं ही रह गया हूँ । सो मेरा समय नजदीक है । बाबू अब
मैं मौत से नहीं डरता, तुम्हीं मेरे गुरु हो गए, क्योंकि दुनिया के झमेलों से मेरे
चित्त को हटाकर तुम्हीं ने भगवान् की ओर कर दिया है ।
जितनी ही रेजिमेंटों में हमारी पहुँच हो चुकने पर उनकी अन्य स्थानों में