बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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छोड़ दें। रासबिहारी दिल्ली चले गए। इस तरह सलाह-मशविरा करते-करते
रात अधिक हो जाने पर वह विद्यार्थी बोर्डिंग में वापस न गया, जिस मकान पर
रासबिहारी थे वह रात उसने भी वहीं काट दी। सबेरे पुलिस ने वही मकान घेर
लिया। तीन युवक गिरफ्तार हुए पर रासबिहारी न पकड़े गए। दीनानाथ जिस
दिन पकड़ा गया उसके अगले दिन रात के समय उसने सब बातें खोल दीं। यदि
एक दिन पहले वह मुखबिर हो जाता तो रासबिहारी भी पकड़ लिए जाते।
इधर फिर दिल्ली आकर रासबिहारी अमीरचन्द के मकान की ओर जाने
को ही थे कि राह में उन्होंने थाने के नजदीक अमीरचन्द के मकान वाले नौकर
को कहीं जाते देखा। उन्हें जरा सन्देह-सा हुआ, नौकर को बुलाकर पूछा अमीर-
चन्द कहाँ है। नौकर मालिक के दोस्त को पहचानकर बड़ी हड़बड़ाहट से बोल
उठा—"बाबू हमारे मकान पर न जाएँ, मालिक को पुलिस पकड़ ले गई है, मैं
उनके लिए थाने पर खाना ले जा रहा हूँ!" रासबिहारी के हाथ में उस समय
जो रुपया-पैसा था उससे कलकत्ते तक का रेल का टिकट खरीदा जा सकता था।
वे फिर स्टेशन लौटकर एकदम सीधा चन्दननगर चले आए। उस दिन से रास-
बिहारी का अज्ञातवास आरम्भ होता है। तब से "Thou art but a wander-
ing voice" (तू एक उड़ती-फिरती आवाज है) की तरह यह पकड़ा, वह पकड़ा
होने पर भी मानो उनका पता नहीं मिलता। इस प्रकार बार-बार विपत्ति से
उद्धार पाकर भी वे फिर उसी विपत्ति में पड़ते रहे।