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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 408 में से

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पृष्ठ 93

काशी केन्द्र की कहानी / 91

बिलकुल ही असहाय थे, इनका एकमात्र बल और भरोसा था केवल अपना
असीम विश्वास तथा चित्त की अद्भुत दृढ़ता; किन्तु अपने घर में ही ये अपने
स्वदेशवासियों से उपेक्षित थे। ऐसे दो दलों के असम द्वन्द्व में विप्लव-दल ने
बहुत दिनों तक केवल आत्मरक्षा ही नहीं की थी, बल्कि उसने अंग्रेज़ी सरकार
को भी कितने ही नाच नचा दिए थे और इस प्रकार अंग्रेजी साम्राज्य की प्रबल
शक्ति जो रासबिहारी को गिरफ्तार नहीं कर सकी इसका प्रधान कारण था
हमारे संघ की व्यापकता और बहुत बढ़िया बन्दोबस्त। उपयुक्त शक्तिशाली सुनि-
यन्त्रित संघ न होता तो रासबिहारी को बचा लेना कदापि सम्भव न होता।
इसमें सन्देह नहीं कि इतने पर भी रासबिहारी की कुशलता और उनका भाग्य
कुछ कम सहायक नहीं हुआ। कितने ही भीषण संकट के अवसरों पर वे उनमें से
सहज ही बच निकले थे। अब उन बातों का ख्याल होने से ही देह में रोमांच हो
आता है। इसे भगवान् की विशेष कृपा के सिवा और क्या कहा जाय! इन सब
बातों का वर्णन दूसरे भाग में होगा। केवल रासबिहारी ही इस प्रकार अपने को
छिपाने में सफल न हुए थे, अपितु और भी कितने ही युवक इसी समय से, तथा
इसके पश्चात् भी प्रबल प्रतिद्वन्द्वी की सारी शक्ति को व्यर्थ करके तीन-चार वर्ष
तक—कोई-कोई तो इससे भी अधिक समय तक—छिपे रहने में समर्थ हुए थे।
यदि उन छिपे हुए लोगों का रहस्यपूर्ण इतिहास लिखा जाय तो भारत के साहित्य
को एक नई सम्पत्ति प्राप्त हो।
रासबिहारी रात की गाड़ी से दिल्ली होते हुए पंजाब को रवाना हुए। इस
समय से प्रायः हर वक्त हम लोगों में से कोई-न-कोई रासबिहारी के साथ-साथ
रहता था। दिल्ली पहुँचने तक कोई खास घटना नहीं हुई। गाड़ी जिस समय
दिल्ली स्टेशन को पीछे छोड़कर आगे बढ़ने लगी उस समय रासबिहारी ने अक-
स्मात् देखा कि उनके छोटे से डिब्बे में उन्हीं की पहचान का खुफिया पुलिस का
दारोगा बैठा हुआ है। उस समय रासबिहारी के मन की जो दशा हुई होगी उसकी
हमें कल्पना से ही जान लेना चाहिए। जो हो, सौभाग्य से उस रात को वे अपने
सिर पर टोपी लगाये रहने की बदौलत साफ बच गए, और अगला स्टेशन आने
पर वे उस डिब्बे से निकलकर दूसरे डिब्बे में जा बैठे, किन्तु गए वे उसी गाड़ी से;
इसी से समझ लीजिए कि उनमें कितना साहस था। इस प्रकार बड़ी शान्ति से,
किन्तु दृढ़ता के साथ, रासबिहारी सब बातों को जानते रहने पर भी दहकती हुई
आग में कूद पड़े। वे अमृतसर पहुँच गए।
इधर युक्तप्रदेश, बिहार और बंगाल की भिन्न-भिन्न छावनियों में हमारे
आदमियों ने अपना आना-जाना आरम्भ कर दिया। थोड़े ही दिनों में पंजाब से
करतारसिंह तथा और भी कई सिक्ख पंजाब का समाचार लेकर काशी आए।
उस समय उत्तर भारत की तमाम छावनियों का हाल हमने मालूम कर लिया
था। सब स्थानों का समाचार मिलने पर समझ में आ गया था कि उस समय देश
में गोरी सेना बहुत ही थोड़ी थी और जितने गोरे थे भी, वे निरे रंगरूट थे। टेली-