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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 408 में से

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पृष्ठ 95

काशी केन्द्र की कहानी / 93
बदली हो गई। इससे यह हुआ कि हमारे कार्य का प्रचार देश में बहुत दूर तक
हो गया।
रेजिमेंटों के प्रचार करने के अलावा इसी समय हमने देहात में जाकर वहाँ
की जनता मे भी अपनी रसाई करने की कोशिश की। युक्तप्रदेश में कुछ ऐसे गाँव
हैं जहाँ केवल ठाकुरों की ही बस्ती है। ऐसे अनेक केन्द्रों में अंग्रेजों की फ़ौजों के
लिए रंगरूट चुने जाते थे । युक्तप्रदेश और पंजाब के अपढ़ लोग बंगाल की
अशिक्षित जनता की भांति नहीं हैं। एक तो वे बंगालियों की अपेक्षा शरीर से
बहुत कुछ बलवान् हैं, दूसरे अपने-पराए गर्व का स्मरण इनमें अब तक यथेष्ठ
परिमाण मे बना है। ये अपढ़ हैं सही, किन्तु राजनीतिक संस्कार इनमें अत्यन्त
प्रबल हैं । बंगाल की जनता और शिक्षित सम्प्रदाय की अपेक्षा भी यहाँ वालों मे
अपने धर्म पर बहुत अधिक प्रीति और मोह है। सुयोग्य नेता की अधीनता मे
परिचालित किए जाने से ये अशिक्षित लोग एक बार असम्भव को भी सम्भव कर
सकते हैं ।
इन लोगो में भी हमारा आना-जाना होने लगा था और इन लोगों से भी
हमको कुछ कम आशाजनक उत्तर न मिला था ।
इधर रासबिहारी भी पंजाब मे सैनिकों से मेल-मुलाकात करने लगे । वे जिस
मकान मे रहते थे उसमे किसी से भी भेंट न करते थे । दूसरों से मिलने-जुलने के
लिए दो-तीन मकान बिलकुल अलग थे । सिपाहियों से वे ऐसे ही एक अलग मकान
में मिला करते थे । इस समय के लाहौर के दो सैनिकों का जो हाल मैंने सुना
है वह सदा स्मरण रखने योग्य है। एक का नाम लछमनसिंह था । दूसरा सिपाही
मुसलमान था, उसका नाम मुझे याद नही। ये दोनो ही हवलदार थे । सिपाहियों
पर लछमनसिंह का खासा प्रभाव था । इस रेजिमेंट के एक सिपाही से बाद मे
अण्डमन मे मेरी बातचीत हुई । उससे पता चला कि लछमनसिंह ने बहुत पहले
से अपनी रेजिमेट मे एक छोटा-सा दल बना रखा था। वे बीच-बीच मे अक्सर
एकत्र होते थे । उस समय सिक्ख धर्म-सम्बन्धी पुस्तकें पढ़ी जातीं थी और अनेक
विषयो पर चर्चा इत्यादि होती थी। कई बार इसकी खबर पाकर रेजिमेट के
अंग्रेज़ हाकिम इसे रोकने का हुक्म दिया करते थे । इस प्रकार बीच-बीच में बन्द
होकर भी यह कार्य छोटे रूप में कई वर्ष से लगातार होता चला आ रहा था ।
रेजिमेट के सभी लोग लछमनसिंह को बड़ा धर्मात्मा और उन्नत चरित्र का पुरुष
समझते थे । लछमनसिंह को फाँसी का हुक्म हो चुकने पर जब मुसलमान हवलदार
की जान बख्श देने का लालच देकर सरकार की ओर से कुछ गुप्त बातों की टोह
लेने की कोशिश की गई और उससे कहा गया कि तुम एक काफ़िर के साथ-साथ
फाँसी पर चढना कैसे पसन्द करोगे, तब उस वीर देशभक्त मुसलमान हवलदार
ने बड़ा ही बढ़िया उत्तर दिया। उसने कहा- "अगर मैं लछमनसिंह के साथ-
साथ फाँसी पर टांगा जाऊँ तो मुझे बहिश्त मिले ।" उनको भी फाँसी हो गई।
विद्रोह का निर्दिष्ट दिन जितना ही समीप आने लगा उतना ही हम लोगों