सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 106

104 / बन्दी जीवन
बाद दूसरे महापुरुष का आविर्भाव सम्भव नहीं हो पाता ।
किन्तु इस बार के इस नवीन युवकों के विप्लव आन्दोलन की विशेषता
यह थी कि यह आन्दोलन किसी का मुंह नहीं देखता रहा । देश के गण्यमान्य
लब्धप्रतिष्ठ नेता लोग जब एक रास्ते पर चल रहे थे, तब यह गुमनाम गरीब
युवकों का सम्प्रदाय सैकड़ों विपदाओं में डगमगाये बिना अनेक बाधाओं और
कष्टों में हिम्मत हारे बिना, देश के नेताओं के विरुद्ध ही नहीं, प्रत्युत उनके द्वारा
निषिद्ध मार्ग में जाते हुए हिचकिचाता न था। महामति तिलक ने जेल से बाहर
आकर पुराने आदर्शों में भ्रम देखा और अपना मत बदल लिया, और अन्त में
देश छोड़कर जर्मनी जाने का संकल्प भी प्रकट किया । मनीषी विपिनचन्द्र भी
इंग्लैंड से वापस आकर अपनी सारी शक्ति के प्रयोग से यह प्रचार करने लग गये
कि पूर्ण स्वाधीनता का आदर्श भारत के लिए सुविधाजनक न होगा । ऋषि
अरविन्द राजनैतिक क्षेत्र से छुट्टी लेकर भगवान् की लीला के उपयुक्त आधार
बनने के लिए तपस्या करने लगे, और पूर्ण योग के आदर्श का, गृहस्थ और
संन्यासी जीवन में सामंजस्य की कल्पना का, तथा यह जगत् मिथ्या नहीं, उसी
सर्वशक्तिमान् का विलास ही है, लीलामय का लीलाक्षेत्र है, इत्यादि बातों का
प्रचार करने लगे । भारत के राजनैतिक क्षेत्र में उस समय उल्लेख योग्य और
कोई प्रभावशाली नेता नहीं रहे। इन्हीं कुछ नेताओं ने भारतवर्ष में पूर्ण स्वाधीनता
के आदर्श का पहले प्रचार किया था। उसी के फलस्वरूप समाज में जो प्राणों
की स्फूर्ति हुई, उसी नवजागरण की तरंग आज भी भारत के हृदय को विचित्र
प्रेरणा से स्पन्दित कर रही है। इनमें से दो जनों ने तो पुराने आदर्श को छोड़ ही
दिया; तीसरे ने मौन साध लिया । भारत के राजनैतिक क्षेत्र में कोई और पथ-
दर्शक न रहा । पर भारत के प्राण तो जाग चुके थे, उनमें गति आ चुकी थी ।
जहाँ जीवन है वहाँ प्राण तो पथ-प्रदर्शक होते हैं । अपने अन्तरात्मा की ओर ही
लक्ष्य रखकर जिन्होंने जीवन-पथ की यात्रा की थी, भारत के उन युवकों ने अपना
मत नहीं बदला । वे देश के नेताओं से सलाह लेकर तो इस काम में नहीं उतरे थे,
और न कभी इन नेताओं पर उन्होंने भरोसा ही रक्खा था। नेताओं ने जिन
आदर्शों का प्रचार किया था उन आदर्शों को पाने के लिए जो कुछ करना उचित
था सो उन्होंने कभी किया नहीं । भारत के लब्धप्रतिष्ठ विख्यात नेताओं में से
दो-एक को छोड़कर सबके विषय में कहा जा सकता है कि वे जिस बात को अपनी
विवेचना से उचित समझते हैं उसे कहते नहीं हैं और अनेक बार जो कहते हैं
सो करते नहीं हैं । अर्थात् जिस आदर्श का वे प्रचार करते हैं उसे कार्य में परिणत
करने को जितना अग्रसर होना चाहिए उतना अग्रसर वे नहीं होते ।
किन्तु भारत के उन नवयुवकों के विषय में यह बात नहीं कही जा सकती ।
देश के अधिकांश नेता, हम स्वयं क्या कुछ कर सकते हैं या नहीं कर सकते यही
देखकर फैसला देते हैं कि देश के लिए क्या कार्यक्रम उचित है, क्या अनुचित ;
किन्तु हमारे युवक जो कुछ सिद्धान्त तय करते हैं उसमें क्या कर सकते हैं, क्या