बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें98 / बन्दी जीवन
फ़ौजी तैयारी का कारण यूरोपीय युद्ध का कोई खटका होगा। देशी सिपाहियों के
मन में घबराहट छा गई (उन्हीं के जो कि गुप्त-योजना में थे) इधर विप्लव की
तारीख़ दो दिन पहले कर देने से देहात के सब लोग अपने-अपने निर्दिष्ट स्थानो
में एकत्र नहीं हो सके। सिर्फ़ करतारसिंह सत्तर-अस्सी आदमियों के साथ
फिरोजपुर की छावनी में, जैसा कि पहले निश्चय हो चुका था, पहुँच गए। उस
समय वहाँ भी वही हाल था जैसा लाहौर में हो रहा था—मेगजीन देशी सिपाहियों
को हटाकर गोरों के अधिकार में दे दी गई थी और उस पर गोरे सिपाही बड़ी
मुस्तैदी से पहरा दे रहे थे। किन्तु करतारसिंह को लाहौर की नई घटना का कोई
समाचार नहीं मिला था।
बारकों में ऐसी चौकसी रहने पर भी करतारसिंह आकर काली पलटन के
हवलदार से मिले। हवलदार ने कहा कि अब कुछ दिन तक इन्तज़ार किये बिना
हम लोग कुछ भी नहीं कर सकते, क्योंकि ऐसी दशा में यदि कुछ किया जायगा
तो सत्यानाश हो जायगा, इससे करतारसिंह ने समझ लिया कि इस बार अब कुछ
होने की आशा नहीं। उन्होंने ताड़ लिया कि दो-चार दिन में कैसी दशा हो जाने
वाली है। उन्होंने कई तरह सैनिकों को समझाने का असफल उद्योग किया कि
यदि आज इसी दम कुछ न किया जायगा तो फिर और कुछ होने का नहीं, यही
पहला और आखिरी मौक़ा है। परन्तु सिपाहियों ने अंग्रेज़ पहरेदारों की ओर
उँगली से इशारा करके कहा कि इस समय कुछ कर गुज़रने की कोशिश बिलकुल
बेकार होगी। आँखों देखते भला मक्खी कैसे निगली जा सकती है, जान-बूझकर
कैसे आग में कूदा जाय ? उस दिन भारतवासियों के हाथ में यदि उपयुक्त परि-
माण में अस्त्र-शस्त्र होते तो ऐसा विश्वासघात हो जाने पर भी भारत में विप्लव
किसी के रोके न रुक सकता था। अथवा यदि पहले से ही शिक्षित और उपयुक्त
मनुष्य विप्लव की दीक्षा लेकर फ़ौजों में भर्ती होते तो भी उस समय की विप्लव
की तैयारी व्यर्थ न जाती। उस दिन लाचार होकर करतारसिंह को खाली हाथ
लौट जाना पड़ा। देहात के आदमी अपने-अपने घर को चले गए। करतारसिंह
लाहौर पहुँचे। अब सारे पंजाब में धड़ाधड़ गिरफ्तारियाँ होने लगीं। जो लोग
पकड़े जाते थे उनमें से कोई-कोई भंडाफोड़ करके और भी दस-पाँच साथियों का
नाम-धाम प्रकट करने लगे। इस प्रकार कभी-कभी गोरी फ़ौज किसी गाँव को जा
घेरती और तब बहुत-से आदमी एक ही जगह गिरफ़्तार कर लिए जाते। भार-
तीय सिपाहियों के मन में एक तरह की बेचैनी देख पड़ी। रावलपिंडी की एक
काली पलटन बरखास्त कर दी गई। लाहौर में जहाँ-तहाँ खानातालाशियाँ और
गिरफ़्तारियाँ होने लगीं। किसी सिक्ख पर ज़रा-सा भी सन्देह होते ही उसे सीधा
थाने में पहुँचाया जाता था। इसी तरह पकड़-धकड़ होने में कभी-कभी दोनों तरफ़
से गोली चल जाती थी। दो ही चार दिन में मामला इस तरह संगीन हो गया।
अब दल में परस्पर एक-दूसरे पर विश्वास करना कठिन हो गया।—करतारसिंह
बुद्धिमान युवक थे। लाहौर आते ही वे सीधे रासबिहारी के डेरे पर पहुँचे और