सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 96, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 96

94 / बन्दी जीवन
को खटका होने लगा कि 'क्या हम लोग पार पा जाएँगे ? इतनी बड़ी जिम्मेदारी
को क्या हम लोग ले सकेंगे ?' विप्लव के लिए जैसी तैयारी करने की तरकीब
हमें सूझ पड़ती थी उसमें तो हम लोगों ने कोई कसर रखी नही, किन्तु फिर भी
उस बहुत जल्द आनेवाले दिन के विचार से ही शरीर थर्रा जाता था । पंजाब
जाने से पहले दादा भी कई बार यही बात कह चुके थे ।
असल में हम लोग यह चाहते थे कि एक दिन एकाएक—बिना किसी को
अपनी इच्छा बतलाए—उत्तर भारत की छावनियों में तमाम अंग्रेजी सैनिकों पर,
एक ही दिन और ठीक एक ही समय, एकदम हमला कर दिया जाय और उस रेल-
पेल के वक्त जो लोग हमारी शरण में आ जाएं उन्हें कैद कर लिया जाए। विद्रोह
रात के वक्त शुरू किया जाय और उसी दम शहर के तार इत्यादि काटकर
अंग्रेज़ वालण्टियरों तथा तगड़े पुरुषों को क़ैद में डाल दिया जाय और फिर
खजाना लूट करके जेल से क़ैदी रिहा कर दिये जाएं । इसके पश्चात् उस शहर का
इन्तजाम अपने चुने हुए किसी योग्य पुरुष को सौंपकर तमाम बलवाइयों का दल
पंजाब में जाकर एकत्र हो । हम लोग यह न समझे बैठे थे कि गदर मचने पर
अन्त तक अंग्रेजों के साथ सम्मुख युद्ध में हमारी विजय ही होती जायगी, किन्तु
इसका हमे पक्का भरोसा था कि उल्लिखित रीति के अनुसार एक बार गदर
मचते ही एक ऐसी अन्तर्राष्ट्रीय विचित्र दशा उपस्थित हो जाएगी कि यदि हम
कम-से-कम वर्ष-भर तक इस युद्ध को ठीक ढंग पर जारी रख सके तो विदेशों के
भिन्न-भिन्न राष्ट्रों के आपसी विद्वेष के फल से, और अंग्रेज़ों को शत्रुओं की
सहायता से, देश को स्वाधीन कर लेना हमारे लिए, अत्यन्त कठिन होने पर भी,
असम्भव न होगा ।
एक दिन पंजाब से यह समाचार लेकर कुछ आदमी आए कि विप्लव का
मुहूर्त पक्का कर लिया गया है। इक्कीस फरवरी को गदर मचा दिया जायगा ।
काम रात को ही आरम्भ होगा । यह सूचना मुझे इतवार को मिली थी। क्षण-भर
मे तीव्र आवेग से देह और मन न जाने कैसे भाव से कम्पित हो उठे । वह ऐसा
विचित्र भाव था जिसका पहले कभी अनुभव नहीं हुआ था । न ही उसे आनन्द
कहा जा सकता है और न आशंका ही । विप्लव का आरम्भ होने के लिए अब
एक हफ्ते-भर की देर थी। अपने अन्यान्य स्थानों को भी विप्लव की तारीख की
सूचना दे दी गई ।
बहुत ही शीघ्र होनेवाले इस विप्लव की तैयारी में हममे से बहुतो के मन में
एक अस्पष्ट अनिर्देश्य भय और सन्देह का भाव विद्यमान था, मानो हम किसी
भी तरह विप्लव आरम्भ हो जाने का निसन्देह विश्वास न कर सकते थे ।
सैकड़ो-हजारो वर्ष की दीनता और हीनता से, पराधीनता की हजारों तहों में
लिपटे रहने से, आत्मशक्ति को हम यहाँ तक खो बैठे थे कि स्वाधीनता के पूर्ण
आदर्श की कल्पना कर लेने और उस आदर्श को वास्तविक रूप देने की भरसक
चेष्टा कर चुकने पर भी और इसकी उत्कट अभिलाषा रखते हुए भी, हम मानो