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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 112, कुल 408 में से

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पृष्ठ 112

110 / बन्दी जीवन
ने हमें थोड़ा व्याकुल नहीं किया।
विप्लव सचमुच शुरू हो जाने पर पल्टन के सिपाहियों को तथा शहर के
गुंडों को संयत शासन के अधीन रखना कितना कठिन काम होगा, यह भी हम
भूल न गए थे, विप्लव के समय सैकड़ों-हजारों परिवारों के मंगल-अमंगल का
उत्तरदायित्व भी हमीं लोगों के सिर पर था, यह बात भी कभी हमारे ध्यान से
नहीं हटी । किन्तु विप्लव जब करना ही था तब समस्याएँ चाहे कितनी कठिन
क्यों न हों इनका समाधान भी हमें करना ही था ।
और भी एक विचार ने हमें उससमय चिन्तित किया था। हम सोचते थे कि
यदि दूसरे स्थानोंमें विप्लव आरम्भ हो जाय और हमारे यहाँ न हो, तब हम लोगों
की, जो पहले से ही पुलिस की विष-दृष्टि में पड़ चुके थे, क्या गति होगी ? और
दूसरे स्थानों में विप्लव आरम्भ हुआ कि नहीं, यह भी जानेंगे कैसे ? इस अवस्था
में अन्यान्य केन्द्रों की पक्की बात जाने बिना काशी की पल्टन को उभार देना
युक्ति-संगत होगा कि नही, यह हम सोचकर तय न कर पाए थे । हम जानते थे
कि काशी में हमारे अपने दल को जो कुछ शक्ति थी उससे हम काशी की अंग्रेज
छावनी पर हमला कर सकते थे । ऐसी अवस्था में देशी पल्टन को भी कोई एक
पक्ष अवश्य लेना पड़ता, और हमारा विश्वास था कि देशी पल्टन हमारी तरफ
ही योग देगी। इस तरह हम जानते थे कि इच्छा हो तो हम काशी में विप्लव का
सूत्रपात कर सकते हैं। किन्तु और स्थानों की बात जाने बिना, विशेषतः पंजाब
की बात जाने बिना कुछ करने की हिम्मत न होती थी । यदि अपने दल में काफ़ी
तादाद में अस्त्र-शस्त्र रहते तो भी ऐसा करने की हिम्मत हो जाती । जो हो इन
सब भावनाओं के बाद हमने तय किया था कि रेलवे स्टेशन और तार-घर के
पास जांच-पड़ताल करके ही हमें इस बात का संशय दूर करना होगा कि पजाब
की ओर से तार आने में कुछ गोल-माल हुआ है कि नही। यदि तार न आया
तो जान लेंगे कि वहाँ कुछ गोलमाल शुरू हो गया है, विचार था कि विप्लव शुरू
होने के कुछ पहले ही सब तरफ तार काट दिए जाएँगे । हमें स्टेशन पर ट्रेनों के
आने-जाने में भी गोलमाल होने की आशा थी ।
हमने स्थिर किया था कि इस प्रकार अन्य स्थानों की बात जानकर ही
काशी की अंग्रेजी पल्टन पर आक्रमण करेंगे और रात के समय समर्थ अंग्रेज पुरुषों
को जेल में डालकर जेल के कैदियों को मुक्त कर देंगे । हमने समझा था कि
जेल के क़ैदी इस तरह हमारी मदद से छूट जाएँगे तो उनमें से कुछ तो ज़रूर
हमारा साथ देंगे । तब तक हम जेल न गए थे, इसलिए जेलों की अवस्था कुछ भी
न जानते थे। यह तो अब जान पाया है कि यह आशा कैसी बड़ी दुराशा थी।
जो हो, हमारा मतलब यह था कि आधी रात को मेगज़ीन और खजाना हाथ में
करके कुछ लोगों को एकदम इलाहाबाद और दानापुर की ओर विप्लव की
खबर के साथ भेज देते, और सवेरा होने पर आम खुली सभा बुलाकर शहर के
धनी लोगों से धन-संग्रह करके शहर के युवकों से वालण्टियर होने का अनुरोध