बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्वासघात और निराशा / 99
किसी भी स्थान पर नहीं गए । क्योंकि रासबिहारी वाले मकान को बहुत कम
आदमी जानते थे, इसलिए वह सबसे अधिक सुरक्षित था । उस समय रासबिहारी
बड़ी उदासी से एक खाट पर मुर्दे की तरह पड़े थे । करतारसिंह भी चुपचाप उनकी
बगल में पड़ी हुई एक खाट पर लेट रहे । थकावट के मारे उनका शरीर शिथिल
हो रहा था । दोनों ही चुप थे । उनके उस म्लान मौन से मर्म की बड़ी ही निदा-
रुण पीड़ा प्रकट होने लगी । हम में से कितने लोगों को जीवन में उतनी बड़ी चोट
सहनी पड़ी है ? जिसकी कल्पना जितनी अधिक बड़ी होती है, भाव की सघनता
और गम्भीरता जिसकी जितनी ही अधिक होती है, उसको जीवन में उतनी ही
भारी चोट भी लगती है । उनकी कितनी बड़ी आशा छिन्न-भिन्न हो गई ? उनका
विराट् आयोजन बात की बात में धूल में मिल गया । ऐसी दशा में शिक्षित मन
का भाव भी बहुत-कुछ बदल जाता है, फिर सिपाहियों के मन पर यदि विषम
आतंक का भाव अपना अधिकार जमा ले तो इसमें विचित्रता कुछ भी नहीं । दोनों
नेताओं ने सोचा कि यूरोपीय महासमर की उलझन के दिनों में भी—ऐसा बढ़िया
सुभीता रहने पर भी, विप्लव दल सारी तैयारी करके भी कुछ नहीं कर सका ।
कौन जाने अब फिर कब ऐसा मौका मिलेगा ! —किन्तु यह भयंकर चोट खाकर
भी वे फिर कमर कसकर काम में लग गए । उनके हृदय की असीम आशा, हृदय
का बल मानो घटना चाहता ही नहीं था। इसी से वे फिर नये उत्साह से घोर
अन्धकारावृत भारत-आकाश के एकान्त कोने में अपने वक्षःस्थल की दीप-शिखा
के ही बल और भरोसे पर उस हताशाच्छन्न जीवन-मार्ग पर फिर आगे बढ़े। उनके
दिल में बड़ी गहरी चोट लगी थी किन्तु इससे उनके हाथ-पैर फूल नहीं गए। इतने
बड़े मानसिक बल की मर्यादा को समझने वाले हममें कितने मनुष्य हैं ? वीर की
इज्जत करना वीर ही जानता है, इसी से भारत के विप्लवकारी दल को अंग्रेज़
जिस दृष्टि से देखते थे, या देखते हैं, उस दृष्टि से उस दल को कितने भारतवासी
देख सकते हैं ? भारतीय विप्लवपन्थी दल को भारतवासियों ने सदा उपेक्षा की
दृष्टि से देखा है। यह लापरवाही भारतीय विप्लवकारी दल की छाती को, एक
बड़ी वज़नदार चट्टान की तरह, बड़ी बेदर्दी से दबाया करती थी। उक्त दल की
ऐसी अवज्ञा ओर किसी ने भी नहीं की। इस दल को जिनसे सबसे अधिक सहानु-
भूति की आशा थी उन्हीं ने उसकी लानत-मलामत की है, किन्तु इतने पर भी दल
ने हिम्मत नहीं छोड़ी। इस दलवालों के प्राण मानो किसी स्वप्नलोक की कल्पना
से भरपूर थे; अपने प्राणों की पूंजी के सिवा इन्हें और किसी का भरोसा न था—
विप्लव की यह तैयारी बेकार तो हो गई थी किन्तु सफलता-निष्फलता की कसौटी
से किसी भी आन्दोलन पर विचार करना ठीक नहीं। इस आन्दोलन पर विचार
करने के लिए यह देखना चाहिए कि इस आन्दोलन के पीछे कितने बड़े आदर्श
की कल्पना थी और इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए कितने व्यक्तियों ने प्राणों
की बाजी लगाकर कहाँ तक त्याग अंगीकार किया था। ऐसी-ऐसी बातों पर
ध्यान देकर ही इस आन्दोलन पर विचार किया जाना चाहिए। किस आदर्श की