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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 408 में से

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पृष्ठ 105

1
पहली निष्फलता के बाद
पंजाब की विप्लव योजना भले ही विफल हो गई हो किन्तु इतने से ही
भारत में विप्लव की चेष्टा शान्त नहीं हुई । एक-एक करके विप्लवियों की सभी
चेष्टाएँ व्यर्थ हुईं, एक-एक दो-दो करके कितने लोगों ने फांसी के तख्ते पर जान
न्योछावर कर दी, क़ैदखानों मे बन्दी होकर उनके कितने साथी तिल-तिल करके
प्राणों की बलि देने लगे और इसके कारण कितने ही परिवार बरबाद हो गए,
कितनों ही की माताएँ ये सब दृश्य अधिक न सह सकीं और पागल हो गईं, कितनों
ही के पिताओं की सरकारी नौकरी चली जाने से उनका परिवार ग़रीबी की
चक्की में पिसकर आश्रय की खोज में दर-दर फिरने लगा, समाज के अन्दर एक
मर्मवेधी अन्तर्नाद गहरा उठा, किन्तु विप्लवियों का दल फिर भी न दहला । क्यों
ऐसा हुआ ?
भारत के इतिहास में प्रायः देखा गया है कि किसी अच्छे नेता की अधीनता
में भारतवासियों ने कितनी ही बार वीरता दिखाकर भारत का मुख उज्ज्वल
किया है, कितनी बार असम्भव को सम्भव कर दिखाया और सारे संसार को
चकित कर दिया है, किन्तु भारत के दुर्भाग्य से ज्योंही यहाँ नेता का अभाव हुआ,
त्योंही फिर देश ने घोर निद्रा में मग्न होकर ऐसा रूप धारण कर लिया कि फिर
सहसा यह विश्वास नही होता कि यही भारत वह भारत है,—अतीत काल की
कीर्ति मानो उम समय भ्रम-सा दिखाई देने लगती है । इसी से हम देखते हैं कि
रणजीतसिंह के बाद खालसा समाज में वैसे किसी और शक्तिशाली पुरुष का
आविर्भाव न होने से सिक्ख जाति फिर सिर उठा ही नहीं सकी, राणा राजसिंह
के बाद राजपूताना मर-सा गया और महाराज छत्रसाल के बाद बुन्देलखण्ड ने
म्लान मौनता धारण कर ली । ऐसा होने का कारण है भारत की पूर्व सुकृति के
बल से कभी-कभी यहाँ भाग्यशाली महापुरुषों का आविर्भाव हो जाता है तो भी
प्रत्येक जीवन जिस प्रकार पुरुष-परम्परा में अपना प्रवाह बनाये रखता है उस
प्रकार भारत की जीवन प्रतिष्ठा नहीं होती है इसीलिए¹ यहाँ एक महापुरुष के

  1. मध्यकाल में आकर भारतीय राष्ट्र की जीवनधारा क्षीण हो जाती है, एक सतत प्रवाह के
    साथ नहीं बहती यह ठीक है। भारतीय राष्ट्र के समूचे जीवन के लिए यह नहीं कहा जा
    सकता। भारतीय इतिहास में Stagnation का यह काल शायद आज समाप्त हो रहा
    है। यह एक इतिहास का गहरा प्रश्न है जिस पर यहाँ पूरा विचार नहीं हो सकता।