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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 408 में से

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पृष्ठ 99

विश्वासघात और निराशा / 97
सैनिक की सहायता से कृपालसिंह का सम्भवतः फरवरी महीने में इस दल में प्रवेश
हुआ था। किन्तु इसके कुछ ही दिन बाद कृपालसिंह की गतिविधि पर बहुत लोगों
को सन्देह हो गया। तब कुछ नेताओं की सलाह हुई कि उस पर हरदम नज़र
रहनी चाहिए। इसका फल यह हुआ कि दो-चार दिन में ही इसका पुलिस के
हाकिमों के पास प्रतिदिन एक निर्धारित समय पर आना-जाना देख लिया गया।
इधर विप्लव का झण्डा खड़ा करने को दो-चार दिन की देर रह गई थी, इसलिए
सोचा गया कि इस दशा में यदि इसे दुनिया से हटा दिया जाय तो ऐसी विकट
गड़बड़ मच सकती है जिससे कि शायद हमारे अन्तिम मनोरथ की सिद्धि में बेढब
विघ्न आ पड़े। इस आशंका के मारे इस काँटे को निकालने का कुछ भी उद्योग
नहीं किया गया। ऐसी दशा में पूर्व बंगाल वाले उसे दुनिया के झंझटों से छुड़ाये
बिना कभी न मानते। अस्तु, बाद में पता चला कि विप्लव के लिए जो दिन मुकर्रर
किया गया था उसकी खबर पुलिस को लग चुकी है, क्योंकि कृपालसिंह से वह
दिन छिपाया नहीं गया था। अतएव निश्चय हुआ कि कृपालसिंह अब घर से बाहर
न जाने पावे और विप्लव की तारीख इक्कीस फरवरी के बदले उन्नीस फरवरी—
यानी दो दिन पहले—कर दी गई। किन्तु दुर्भाग्य से हो या होनहार के कारण
हो—कुछ भी कहिए—इस नई तारीख की सूचना छावनी में दे आने का काम
जिन्हें सौंपा गया था उन्होंने उक्त संवाद छावनी में पहुँचकर जब रासबिहारी से
कहा, "छावनी में उन्नीस फरवरी की इत्तिला दे आया" तब कृपालसिंह वहीं बैठा
हुआ था। कृपालसिंह का हाल सब लोगों को मालूम न था। शायद यह घटना
अट्ठारह-फरवरी की है। उसी दिन दोपहर के समय जब भोजन करने के लिए सब
लोग इधर-उधर चले गए तब कृपालसिंह ने वहाँ से टरक जाना चाहा। किन्तु
उस पर नज़र रखने के लिए जिनकी नियुक्ति कर दी गई थी उन्होंने उसका हाथ
पकड़कर खींच-तान नहीं की, बल्कि हर वक्त उसके साथ बने रहे। कृपालसिंह
ने मकान के बाहर आते ही देखा कि भेदिया पुलिस का एक आदमी साइकिल पर
उसी ओर आ रहा है। उससे कृपालसिंह की मुलाकात होते ही उन्नीस फरवरी
की इत्तला पुलिस को मिल गई और इसके कुछ घण्टे बाद धर-पकड़ शुरू हो गई।
जिस मकान में कृपालसिंह था उसमें सात-आठ गिरफ्तारियाँ हुईं। इसमें कुछ
मुखिया भी थे। जिस मकान में रासबिहारी रहते थे उसका पता दो-एक मुखियों
के सिवा और किसी को मालूम न था, क्योंकि जिनसे मिलने-जुलने की ज़रूरत
होती थी उनसे रासबिहारी अन्यान्य मकानों में ही मिलते थे। इधर मेगज़ीन पर
देशी सिपाहियों के बदले गोरों का पहरा हो गया। शहर के अंग्रेज़ वालण्टियर
फ़ौजी तैयारी से लैस कर दिये गए। उन सबको कैम्प बनाकर रहने का हुक्म हो
गया। युद्ध के समय चौकन्ने होकर रहने की जिस प्रणाली को 'पिकेट' करना कहते
हैं, उस प्रणाली से गोरे सिपाही और वालण्टियर लोग पहरा देने लगे। हथियार-
बन्द गोरे सिपाहियों की टोलियाँ फ़ौजी ढंग से बस्ती-भर में चक्कर लगाने लगीं।
लाहौर, दिल्ली, फिरोजपुर सभी जगह ऐसा ही हुआ। लोगों ने समझा कि इस