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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

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1
आत्म-समर्पण योग
कलकत्ता के राजा बाज़ार मुहल्ले में एक छोटा-सा दोमंजिला खपरैल का
मकान था। ग़रीबों का-सा घर जँचता था। इसमें ट्राम-कंडक्टर या इसी श्रेणी
के लोग रहते थे। इसी मकान के ऊपरवाले एक कमरे में श्री शशांकमोहन हाजरा
नामक एक युवा पुरुष रहते थे। जिस समय वह गिरफ्तार किये गये उस
समय उनके कमरे में बम के ऊपरी खोल मिले और ऐसे लेख भी बरामद हुए
जिनमें योगाभ्यास की विधि थी। अदालत मे मुक़दमा चलते समय किसी ने भी
इन लेखो को महत्त्वपूर्ण नही समझा; कहा गया कि ये लेख असल मे लोगों को
फँसाने के लिए हैं। लोगों को गुमराह करने का यह एक जरिया है। लेकिन मै
जानता हूँ कि असल में बात ऐसी थी नही। हम लोगो ने सचमुच ही अपने
जीवन मे इस साधन (योगाभ्यास) को ग्रहण किया था। हम लोग सिर्फ मुंह से
ही न कहते थे कि भगवान् सभी कामो के नियन्ता हैं, बल्कि सचमुच हृदय से,
गम्भीर श्रद्धा के साथ, इस बात पर हम विश्वास भी करते थे। हम अपनी गरज
के लिए, अपना काम साधने के लिए ही कुछ भगवान् को न घसीटते थे, किन्तु
भगवान् के अधिनायकत्व की आलोचना और भावना में कितने ही दिन और
रात्रियां तक हमने बिताईं।
भारत की छाती पर जो यह महान् आन्दोलन हुआ और हो रहा है, यह
भगवान् की इच्छा से ही हुआ और हो रहा है; यही हम लोगों का विश्वास है।
जिस भाव की अव्यर्थ प्रेरणा से भारत के सैकड़ों नवयुवक मृत्यु को सहर्ष चुनौती
देकर बड़ी-बड़ी कठिन विपत्तियों के मुख मे भी बड़ी आन-बान के साथ कूदे थे,
और जिस प्रेरणा के बल से उन्होंने अपार दुःखों और लांछनों को पक्के संयमी की
भांति सहन किया था, उस भाव के प्लावन को क्या कोई विशेष व्यक्ति उपस्थित
कर सकता है ? या इसका स्थायित्व किसी व्यक्ति विशेष के मत, अथवा जीवन-
मरण पर अवलम्बित है ?
जब मैं निरा बच्चा ही था तभी से मेरे हृदय में स्वदेश का उद्धार करने का
संकल्प जाग्रत रहता था। यह संकल्प मुझे किसी से प्राप्त नहीं हुआ। उस छोटी-
सी ही उम्र में किसने मेरे रोम-रोम में इस संकल्प को भर दिया था ? बचपन से
ही मैं इस विषय की आलोचना अपने छोटे भाइयों से करता आया हूँ। उस समय

40 / बन्दी जीवन
तो स्वदेशी आन्दोलन भी उपस्थित न हुआ था। यह केवल मेरे ही मन की दशा
न थी। वयस्क होने पर जब मैंने और-और लोगों से बातचीत की तब मुझे पता
लगा कि मेरे-जैसे और भी बहुतेरे लोग देश में विद्यमान हैं। मुझे तो यही लगता
है कि भगवान् अपने अभीष्ट को सिद्ध करने के लिए पहले ही से तैयारी करते आ
रहे हैं।
हमने जो आध्यात्मिक साधना ग्रहण की थी, एक शब्द में उसे आत्मसमर्पण
योग कहा जा सकता है। भक्ति-योग अथवा प्रेमसाधन से इनका घनिष्ठ सम्बन्ध
है। मैं भगवान् को प्यार करता हूँ, इतना प्यार करता हूँ कि उसके सिवा अन्य
किसी वस्तु को अपना नही कह सकता। मैं जो कुछ करता हूँ, वास्तव में वह मैं
स्वयं नहीं करता, मैं तो केवल निमित्त-मात्र हूँ। भगवान् स्वयं मेरे द्वारा उन
कार्यों को सम्पन्न करते हैं। वेदान्त में इस मत का पर्याप्त पोषण किया गया है।
जगत् में शक्ति एक ही है, अतएव जो कुछ इस संसार में होता है सब उस शक्ति
का ही खेल है। परन्तु जगत् को हम माया नही समझते, वरन् उस भगवान् की
लीला मानते हैं। हमने निज जीवन में, देश में तथा जगत् में उसी एक शक्ति की
लीला देखने तथा अनुभव करने की चेष्टा की थी।

2
पूर्व परिचय
1906-1907 ईसवी मे बंगाल मे जो क्रान्त की लहर चल रही थी वह बंगाल
तक ही सीमित न रही। कुछ बंगाल के अनुकरण में, और कुछ बंगाल की प्रेरणा
से, इस समय भारत मे कई स्थानो पर विप्लव-केन्द्रस्थापित हो गये थे। इसी के
फलस्वरूप काशी, दिल्ली और लाहौर मे विप्लव-केन्द्रो की सृष्टि हुई।
मै दिल्ली बम-केस के बाद से ही कहानी आरम्भ करूँगा। उससे पूर्व बंगाल
के बाहर क्रान्तिकारियो ने जो कार्य किए, जनसाधारण को उसका कुछ ज्ञान न
था। दिल्ली षड्यन्त्र के मुकदमे मे लाला हरदयाल और श्री रासबिहारी बसु के
नाम विख्यात हुए। लाला हरदयाल उस समय अमेरिका में थे किन्तु रासबिहारी
घोर सकट के सयय मे भी सन् 1915 तक भारत मे ही रहे। वह बगाल के बाहर
के क्रान्ति कारी दल के नेता थे। उनको साधारणतः हम दादा या रासूदा कहते थे।
दिल्ली षड्यन्त्र के मुकदमे के आरम्भ होने के पहले से ही रासबिहारी
फरार हो चुके थे। उनको पकडने के लिए कई पुरस्कारों की घोषणा हो चुकी
थी। प्रत्येक बडे रेलवे स्टेशन पर उनका फोटो टाँगा गया था और उनको पकड-
वाने वाले को साढे सात हजार रुपया पुरस्कार दिया जायगा, इसकी भी घोषणा
प्रकाशित की गई थी। किन्तु पूरा प्रयत्न करने पर भी सरकार उनको किसी
तरह पकड न मकी।
बहुत सोच-विचार के बाद मेरे परामर्श से रासबिहारी ने काशी मे रहना
निश्चित किया। वह काशी मे मेरे साथ प्रायः एक वर्ष तक रहे। उस ममय उनके
ससर्ग से मैने जो आनन्द पाया था उमे मैं भूल नही सकता। इतने अरसे मे मैने
उनको शायद कभी भी दुखी नही देखा। हाँ, जिस दिन दिल्ली षड्यन्त्र के मुक़दमे
के फैसले के अनुसार चार व्यक्तियों को फाँसी का हुक्म हुआ उस दिन एकान्त
मे उनको अश्रुपात करते देखा था।
रासूदा जितने दिन काशी में रहे उतने दिन मैंने भारतवर्ष के भिन्न-भिन्न
स्थानों के लोगों को उनसे मिलते देखा था। राजपूताना, पंजाब और दिल्ली से
लेकर सुदूर पूर्व बंगाल तक के लोग उनके पास आते थे। वह जब तक काशी में
रहे तब तक युक्त प्रदेश (उत्तर प्रदेश) तथा पंजाब के भिन्न-भिन्न स्थानों में
विप्लव केन्द्रों की स्थापना में लगे रहे। उसी का यह परिणाम हुआ कि एक ही

42 / बन्दी जीवन
वर्ष में हमारा दल पर्याप्त शक्तिशाली हो गया और उसी का यह फल था कि
यूरोपीय महायुद्ध जब प्रारम्भ हुआ तब हम खूब जोर से काम कर सके थे ।
सन् 1915 भारत में चिरस्मरणीय रहेगा । इस साल विप्लव की जितनी
बड़ी तैयारी अकारथ गई उतनी बड़ी तैयारी सन 1857 के गदर के पश्चात्,
पंजाब में कूका विद्रोह के सिवा और हुई कि नहीं इसमें सन्देह है । इस षड्यन्त्र-
कारी दल के गिरफ्तार हो जाने पर 'भारत-रक्षा' क़ानून गढ़ा गया था । उस समय
के होम-मेम्बर क्रैडक साहब ने, भारतीय व्यवस्थापिका सभा में उक्त कानून का
प्रस्ताव उपस्थित करते समय जो वक्तृता दी थी, उसमें कहा था— “We
had anarchism for a long time in Bengal but the situation in
the Punjab was serious; in Bengal it was less so.” उस समय सच-
मुच भारत की दशा बहुत ही नाजुक हो गई थी । हां, बंगाल के सम्बन्ध में क्रैडक
साहब की अभिज्ञता उस समय बहुत ही कम थी । कुछ दिन के पश्चात् उक्त साहब
ने स्वीकार किया था कि पंजाब के विप्लवकारियों के साथ बंगाल के विप्लव-
पन्थी दल के सम्बन्ध-सूत्र में सरकार की पहले जो धारणा थी उसमे परिवर्तन
हो गया है ।
उत्तर भारत के विप्लव सम्बन्धी कई मुक़दमों में बहुतेरी बातें प्रकट हो चुकी
हैं । बहुत लोग समझते हैं कि इन बातों में सचाई कम है । बहुतों ने मुझसे कहा
भी था कि 'पुलिस ने अपना दिमाग लडाकर झूठा मुक़दमा बनाकर खड़ा कर
दिया है, वास्तव में वैसा कुछ देश में किया ही नही गया है ।' ऐसे लोगो की बातें
सुनने से मैं दिल में जल-भुन जाता था । सोचता था कि देशवासियो का अपनी
शक्ति का विश्वास यहाँ तक लुप्त हो गया है कि वे यह समझ ही नही सकते कि
उनके स्वजातियो में ऐसा कुछ करने का सामर्थ्य है । किन्तु अन्दर के क्षोभ के
कारण मन की बातें खुलकर न कह सकता था, इससे जलन और भी अधिक होती
थी ।¹ 'कोमागाता मारू' नामक जहाज के सिक्ख यात्रियों को कनाडा की भूमि
में पैर न रखने देने के कारण उनके मन मे जो आग प्रज्वलित हुई थी उसकी
चिनगारियाँ जब चारों ओर उड़ रही थी, तब भारत के एक प्रान्त में बैठे हुए हम
लोग आशा की वेदना से चंचल होकर असहनशील की भांति ताक रहे थे ।

  1. इस स्थान में पुलिस के कार्यों के सम्बन्ध में दो-चार और बाते कह देना उचित है ।
    ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे कोई सज्जन यह न समझ ले कि पुलिस जो राजनीतिक
    मुक़दमे करती है । वे सब सम्पूर्णतया सत्य होते हैं । पुलिस मुक़दमे बनाने के लिए कई
    मिथ्या कथाएँ गढ़ती है और ऐसे ही कई बार सर्वथा निर्दोष व्यक्तियों को भी मुक़दमों में
    फँसा देती है । काशी षड्यन्त्र में जिन पर मुक़दमा चलाया गया था और जिनको सजा
    दी गई थी उनमें से कई सर्वथा निर्दोष थे । मैं ऐसे कई राजनीतिक मुक़दमों के बारे में
    जानता हूँ जिनमें अभियुक्त व्यक्ति बिलकुल निर्दोष थे । लखनऊ राजनीतिक हत्या के
    मुकदमे में श्रीयुत सुशीलचन्द्र लाहिड़ी को फाँसी हुई थी किन्तु कइयों की सम्मति में वह
    वास्तविक अपराधी नहीं थे ।

पूर्व परिचय / 43
पंजाब में जो हमारे दल के लोग थे उनसे कह दिया गया था कि 'कोमागाता मारू'
के यात्री ज्योंही देश में आएँ उन्हें फौरन दल में भरती कर लिया जाय ।
किन्तु 'कोमागाता मारू' के यात्रियों के भारत की वसुन्धरा पर पैर रखते ही
एक दुर्घटना हो गई । परन्तु इससे हमारी आशा और भी सबल होने लगी ।
देखते-देखते कनाडा और कैलिफोर्निया से सिक्खों के दल के दल देश में आने लगे ।
ये लोग भारत को आते समय रास्ते में, स्थान-स्थान पर उतरकर, पुलिस और
फौज मे नियुक्त सिक्खों के बीच विप्लवाग्नि भड़का रहे थे। ये लोग बहुत दिन
से भारत से बाहर परदेश में थे । इस कारण ये प्रायः यह न जानते थे कि गुप्त
रूप से विप्लव योजना किस प्रकार की जाती है। यही कारण है कि ये लोग
प्रत्येक जहाज और बन्दर मे गदर की आग फैलाते चले आ रहे थे । उसका फल
यह हुआ कि भारत सरकार खूब चौकन्नी हो गई । जैसे-जैसे सिक्खों के दल
स्वदेश में आकर जहाज से उतरने लगे, तैसे-तैसे सरकार की ओर से उनकी यथा-
रीति अभ्यर्थना होने लगी। इस प्रकार एक दल के कोई तीन सो यात्रियो को सीधा
मुलतान जेल मे भेज दिया गया । इनमे से बहुतो के पास काफी धन था, इन्होने
अमेरिका में लगातार कई वर्ष परिश्रम करके जो उपार्जन किया था उसे ये साथ
लाए थे। उनके उस घोर परिश्रम से उपार्जित धन को सरकार ने ज़ब्त कर लिया ।
बेचारो के घरवाले ताकते ही रह गये कि परदेश से दो पैसे आएँगे तो महीने-
भर सुख से पेट-भर भोजन कर लेगे । इनमे से एक सिक्ख के पास कोई तीस
हज़ार रुपये थे ।
बहुतेरे ऐसे थे जो अपनी सारी गाढ़ी कमाई कैलिफोर्निया-स्थित 'युगान्तर
आश्रम' को अर्पण कर आये थे । जितने दल सरकार की तीखी नजर मे बच गये
थे वे पजाब जाकर दलबद्ध होने लगे । सिक्खो के धर्म-मन्दिर गुरुद्वारा कहे जाते
है। इनमे सिक्खो के पुरोहित रहते है। सिक्ख लोग इन्हें ग्रन्थीजी कहते है। प्रत्येक
गुरुद्वारे म एक ग्रन्थीजी रहते है । विप्लवपन्थी सिक्खो के सम्मिलन केन्द्र ये ही
धर्म-मन्दिर थे । मैं ऐसे ही एक गुरुद्वारे मे बैठा था कि एक सिक्ख ने आकर खबर
दी कि 'अमुक-अमुक व्यक्तियो को गुरुद्वारे मे जाते देख मै उनमे भेट कर आया
हूँ ।' थोडी ही देर मे देखा कि उस जमात के मुख्य-मुख्य व्यक्ति उस गुरुद्वारे मे
आ गए जहाँ कि मैं बैठा था । रुपये-पैसे की चर्चा निकलते ही उन्होने तुरन्त सोने
की गोल-गोल बड़ी-बडी चकतियां मेरे आगे रख दी, ये अमेरिका मे प्रचलित सोने
के सिक्के थे । हिसाब लगाने पर कोई हज़ार रुपये के हुए । प्रत्येक दल ने ऐसा ही
किया । गदर के कार्य में इन लोगो को जिस प्रकार दिल खोलकर अपनी गाढी
कमाई का धन दान करते देखा है, वैसा दृश्य बगाल मे देखने को नही मिला ।
इसमें सन्देह नही कि ऐसा उत्साह और आन्तरिकता उन्ही सिक्खों मे थी जो कि
अमेरिका की यात्रा कर आये थे । और यह बात भी है कि पजाब के अधिवासियों
ने प्रायः इन लोगों के साथ सहानुभूति प्रकट नही की । हाँ, पठान और सिक्ख
सैनिको के साथ इन लोगो का विशेष हेल-मेल था। इसके सिवा सिक्ख जाति मे

44 / बन्दी जीवन
परस्पर एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति और समवेदना-जनित एकता भारत की
अन्यान्य जातियों की अपेक्षा बहुत अधिक है।
जो लोग अमेरिका से लौटकर आये थे उनमें अधिकतर ऐसे लोग थे जो कि
वहाँ कुलीगिरी किया करते थे। इनमें जिनके पास से तीस हज़ार रुपये ज़ब्त कर
लिए गये थे वह कैलिफोर्निया में खेती करके धनवान् हुए थे। इनका नाम था
सरदार ज्वालासिंह।
इन लोगों के बहुत-से रिश्तेदार और भाई-बन्धु भारत की फौज मे नौकर थे।
देश में आते ही इन लोगों ने सैनिकों के साथ गुप्त अभिसंधि करनी शुरू कर
दी। उसी समय बंगाल के साथ पंजाब का सम्बन्ध जुड़ गया। अन्य अनेक गुण
होने पर भी पंजाब के लोगों में संगठन की वैसी योग्यता न थी जैसीकि बंगाल-
वालों में थी। बंगाल के साथ उनका संयोग हो जाने पर बड़े अच्छे ढंग से काम
होने लगा। उत्तर भारत की प्रायः सभी छावनियों में हमारे दल के आदमी आने-
जाने लगे। उत्तर-पश्चिम अंचल के बन्नू से लेकर दानापुर तक कोई भी छावनी
अछूती न रखी गई। प्रायः सभी रेजिमेंटों ने वचन दिया था कि पहले वे लोग
कुछ भी न करेंगे; हां, गदर शुरू हो जाने पर वे अवश्य ही विप्लवकर्ताओं से मिल
जाएँगे। सिर्फ लाहौर और फीरोजपुर की रेजिमेंटों ने सबसे पहले काम शुरू कर
देना स्वीकार किया था। आरम्भ में सरकार यह नही समझ सकी कि गुप्त
विप्लव योजनावाले इतनी गहरी नींव देकर काम शुरू कर रहे हैं। यदि ऐसा न
होता तो इतना अधिक काम हो ही न सकता। पंजाब के पुलिस विभाग के एक
मुसलमान डिप्टी सुपरिण्टेण्डेण्ट ने अपने एक मुखबिर को इस दल में शामिल करा
दिया था। अन्त मे उस कृपालसिंह ने ही कृपा करके सारी बातें प्रकट कर दी।

3
सिक्ख दल का परिचय
इस दल में कृपालसिंह किस प्रकार भर्ती हो गया और उसने किस प्रकार,
कब सारी बातें प्रकट कर दी इसका उल्लेख यथास्थान किया जाएगा। अभी तो
इस सिक्ख दल का थोड़ा-सा परिचय देने की चेष्टा करता हूँ।
इस दल में कुछ कम मेम्बर न थे। उत्तरी अमेरिका और कनाडा से भिन्न-
भिन्न दलों में कोई छः-सात हज़ार सिक्ख देश में वापस आए थे। किन्तु सन्
1914 के Ingress Ordinance Act के अनुसार बहुतेरे लोग जेल में ठेल दिये
गए तथा और भी बहुतेरे लोग नज़रबन्द कर दिये गए जिससे वे अपना गाँव छोड़-
कर कही आ-जा न सकते थे। जो लोग नज़रबन्द थे उन्हें विप्लव-कार्य में सहायता
देने का विशेष अवसर नहीं मिला। क्योंकि सूर्यास्त और सूर्योदय के दरम्यान इन्हें
अपने घर पर मौजूद रहना पड़ता था। यह इसलिए कि क्या जाने पुलिस किस
समय इनकी जाँच करने पहुँच जाय। दिन निकल चुकने पर भी ये लोग अपने गाँव
से बाहर न जा सकते थे। किसी दूसरे गाँव का कोई भी व्यक्ति इनसे प्रकट रूप में
मिल-जुल न सकता था। बाद में जब काम अच्छे सिलसिले से होने लगा तब उनमें
से जिन-जिनको देश का काम करने की प्रबल इच्छा हुई वे पुलिस की नज़र बचा-
कर खिसक गए। अर्थात्, क्या पुलिस, क्या उनके घर के लोग और क्या रिश्तेदार
—किसी को उनकी खबर न मिलती थी।
जिस भाव को हृदय में लेकर ये दल भारत में आए थे, स्वदेश में पदार्पण
करने के पश्चात् ही उनमें से बहुतों का वह भाव बदल गया। अमेरिका से लौटे
हुए इन छः-सात हज़ार मनुष्यों में से कोई आधे लोग अपने घर-गृहस्थी के कामों
में जा फँसे। किन्तु अवशिष्ट सिक्ख बड़े उत्साह के साथ विप्लव कार्य में लगे रहे।
अमेरिका से लौटे हुए इन लोगो में अधिकांश सिक्ख ही थे। ऐसे लोग इने-
गिने ही थे जो कि सिक्ख न थे। शायद पचीस-तीस हों। वे प्रायः सब वयस्क थे।
बहुतों के स्त्री, परिवार और बाल-बच्चे सब कुछ थे। इनमें से बहुतों की उम्र
चालीस वर्ष से ऊपर थी। कुछ लोग तो बूढ़े थे। भाई निधानसिंह, भाई सोहन-
सिंह, भाई कालसिंह, भाई केहरसिंह —इनमें से किसी की उम्र पचास वर्ष से कम
नही थी।
दिल्ली षड्यन्त्र के मुक़दमे में जो लोग गिरफ़्तार हुए थे उनमें से कई एक

46 / बन्दी जीवन
उतरती उम्र के थे। अमीरचन्द की उम्र पचास से भी ऊपर थी। अवधबिहारी
भी जवानी पार कर चुके थे ।
बंगाल का विप्लवकारी दल ही ऐसा था जिसके प्रायः सभी सदस्य छात्र-
श्रेणी के बालक और नवयुवक थे। इनमें से अधिकांश लोगों को सांसारिक अभि-
ज्ञता एक प्रकार से थी ही नहीं। ज्यादातर ऐसे थे जिनकी उम्र सोलह से लेकर
बीस-बाईस वर्ष से अधिक न होगी। बंगाल में प्रायः यही दीख पड़ता है कि जो
लोग तीस के पार हुए उनका सारा उत्साह, समग्र उद्योग ठंडा पड़ जाता है, उस
समय वे किसी तरह अपनी गृहस्थी का काम चलाने के सिवा और किसी मसरफ़
के नहीं रह जाते। मालूम होता है कि बंगाल का जो कुछ आशा-भरोसा है वह
मानो स्कूल और कालेज के युवकों के तरुण मनों में ही आबद्ध है। किन्तु बंगाल
में काम करनेवालों की सांसारिक अभिज्ञता स्वल्प रहने पर भी, उनमें बहुतों के
तरुणवयस्क होने पर भी, उनमें एक ऐसी एकाग्र साधना देखी है जोकि बंगाल के
बाहर अन्यत्र देखने को नहीं मिली।
बंगालियों ने जब-जब जिस किसी काम में हाथ लगाया है तब-तब उसे प्राणों
की बाजी लगाकर किया है। इसी से देखता हूँ कि बौद्ध युग में बंगालियों ने
जिस प्रकार बौद्ध धर्म को अपनी नस-नस में प्रविष्ट कर लिया था वैसा और
किसी प्रदेश के लोगों ने नहीं किया तथा अन्त में जब अन्यान्य प्रदेश-वासियों ने
बौद्ध धर्म को बिलकुल छोड़ दिया था तब वे बंगालियों को कुछ-कुछ अवज्ञापूर्ण
दृष्टि से देखने लग गए थे, क्योंकि बंगाल उस समय भी बौद्ध धर्म को पहले की
भाँति हृदय से चिपकाये हुए था। फिर अंग्रेज़ी अमलदारी होने पर भी देखा कि
बंगालियों ने जिस प्रकार अपना सर्वस्व खोकर पाश्चात्य शिक्षा-दीक्षा और आचार-
व्यवहार को अपना लिया इस प्रकार और किसी भी प्रदेश ने नहीं अपनाया। इसे
बंगाल का गुण समझिए या दोष, किन्तु बंगाली जब जिसे ग्रहण करते हैं उसे
प्राणपण से अंगीकार करते हैं। इसी कारण वर्तमान युग में भी बंगालियों ने जब
जब देश-हित की ओर ध्यान दिया तब फिर वे दूसरी ओर दृष्टि नहीं डाल सके।
न फिर उन्होने शादी-ब्याह करके गृहस्थी चलाई और न उन्हें द्रव्य उपार्जन
करना भला लगा। उन्हें तो एकदम घर-द्वार छोड़कर बाहर निकल आना पड़ा।
इन युवकों में से बहुतों में मुझे एक अतीन्द्रिय भाव की प्रेरणा का आभास
मिला है—ये लोग सिर्फ आडम्बर करने में ही मस्त नहीं बने रहे। इन लोगों ने
देशसेवा-व्रत को एक प्रकार से साधना का अंग समझकर ही ग्रहण किया था।
इन लोगों के बीच एक इसी धारणा और भावना ने दृढ़ रूप से जड़ जमा ली थी
कि 'हम कैसे मनुष्यता को प्राप्त कर सकेंगे, हम किस प्रकार से चरित्रवान् हो
सकेंगे ?'
किन्तु मुझे यह भाव दो-तीन सिक्खों के सिवा अन्य लोगों में नहीं दिखा।
युक्त प्रदेश के भी जिन विप्लवपन्थियों से मेरा हेल-मेल रहा है उनमें भी बंगाल
के आदर्श की बात छिड़ने पर दिखा है कि वे भी उसे प्राणपण से ग्रहण करने में

सिक्ख दल का परिचय / 47

समर्थ नहीं हुए, प्रत्युत उनके होंठों पर एक अविश्वास की मन्द मुस्कान ही देख
पड़ी है ।
सिक्खों में प्रचण्ड साहस और उत्साह था, इसके सिवा वे कष्ट भी खूब सह
सकते थे । उनकी विशाल गठी हुई देह, खूब चौड़ा सीना और सुसम्बद्ध कटिप्रदेश
सभी की दृष्टि को आकर्षित करते थे । उनके दाढ़ी और मूंछों से सुशोभित दृढ़ता-
व्यंजक चेहरे को देखकर बहुतेरे उत्पीडकों का दिल दहल जाता था । उनकी
चाल-ढाल से एक विशेष भाव प्रकट होता था । साफ मालूम होता था कि मानो
वे दोनों पैरों पर समान भार डालकर चलते हैं किन्तु बिना दाढ़ी-मूंछों वाले
कोमलांग सीधे-सादे नम्र बंगाली युवकों का चारित्र्य जिस भाँति एक उच्च आदर्श
पर गठित हुआ दिखता था वैसी बात इनमें न थी । इस बात को मैं साधारण
भाव से ही लिख रहा हूँ, क्योंकि व्यक्तिगत रूप से कतिपय सिक्खों के सम्बन्ध में
मेरी बहुत ही उच्च धारणा है । अपनी अंडमन—कालापानी—की कथा का
वर्णन करते समय मैं इस विषय की आलोचना करूँगा ।
शिक्षित कहने से हमारे मन में साधारणतया जो धारणा होती है उस दृष्टि
से कहना पड़ता है कि अमेरिका से लौटे हुए दलों में कोई भी शिक्षित न था ।
भारत के अन्यान्य प्रदेशवाले घर की आधी रोटी पर सन्तुष्ट रहकर बाहर जाने
का साहस नहीं करते किन्तु इनमें से बहुतों ने इस टुकड़े पर सब्र न करके सिर्फ
रुपया पैदा करने के लिए ही पंजाब को छोड़कर विदेश यात्रा की थी । सिगापुर,
पिनांग, स्याम, मलय प्रायद्वीप और चीन के अनेक स्थानों में इनकी गति-विधि
आरम्भ हुई । उधर कनाडा और उत्तर अमेरिका के भी अनेक स्थानों में ये लोग
इसी उद्देश्य से जा पहुँचे सिंगापुर, पिनांग और हांकांग में ये लोग खास करके
अंग्रेजों की फ़ौजों और मिलिटरी पुलिस में भर्ती हो गए थे । स्याम, मलय प्राय-
द्वीप और चीन के अनेक स्थानों में बहुतेरे सिक्ख कुलीगिरी भी करते थे । कुछ
लोग ठेकेदारी या ऐसा ही कुछ और स्वाधीन रोज़गार करते थे । किन्तु कनाडा
और अमेरिका में ये लोग प्रधानतया कुलीगिरी करते थे । वहाँ इनका यही पेशा
था । अमेरिका के किसी-किसी कारखाने में अमेरिकावासियों की अपेक्षा इन्हीं की
ज़्यादा क़दर थी । अमेरिकावासियों की अपेक्षा, ये अधिक काम करते थे इसलिए
इन्हें उजरत भी खासी मिलती थी । इसका फल यह होता था कि अक्सर
अमेरिकन मज़दूरों से इनका झगड़ा-बखेड़ा हो जाता था । मैंने इनसे सुना है कि
एक बार एक शहर में यह मनोमालिन्य इतना बढ़ गया कि एक प्रचण्ड विवाद
का श्रीगणेश हो गया । बस्तीभर में सिक्ख मज़दूर एक ओर और दूसरी ओर
उस शहर के सब अमेरिकन गोरे मज़दूर । खासी मार-पीट हुई, खूब लाठी चली,
किन्तु यह सब होने पर भी सरकार की ओर से सिक्खों पर कोई ज्यादती नहीं
हुई । भारत में यदि कहीं ऐसी घटना हो जाती तो यह मामला न जाने कैसा रंग
पकड़ता । अमेरिका से लौटे हुए ये सिक्ख लोग वैसे शिक्षित न होने पर भी प्रायः
सभी अपनी मातृभाषा में लिखित ग्रन्थ आदि पढ़ सकते थे और अपने गांव के

48 / बन्दी जीवन
सिक्खों की शिक्षा-दीक्षा आदि के सम्बन्ध में इन्हें अत्यन्त उत्साह था। ऐसी शिक्षा
के प्रचारार्थ उन अमेरिकावासी मजदूरपेशा सिक्खों ने ही अमेरिका से धन-संग्रह
करके कई बार दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह हज़ार की रकमें पंजाब को अर्पण की थीं।
अमेरिका की स्वाधीन आबहवा के बीच में रहने से और खासी आमदनी कर
सकने से उनमें आत्मसम्मान, मर्यादा और आत्मविश्वास का परिमाण बहुत कुछ
बढ़ गया था। इनमें से कई एक ने अमेरिका में रहकर कभी अपने वेश और
परिच्छेद को नही छोड़ा, बहुतेरे तो अपने हाथ से रसोई बनाकर भारतीय ढंग
पर ही आहार किया करते थे। देश से जब पहले-पहल ये लोग अमेरिका पहुँचे
तब शायद अंग्रेज़ी में एक भी बात न कह सकते थे किन्तु वहाँ पहुँचकर अजीब
किस्म की टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलना इन्होंने सीख लिया। इनके मुँह से वह टूटी-
फूटी अंग्रेज़ी सुनने मे बड़ा मज़ा आता था। अमेरिका मे ऐसी ही अंग्रेज़ी बोलकर
ये अपनी भावनाएँ व्यक्त करते थे और उम्दा अंग्रेजी न जानने से इनके किसी
काम मे रुकावट न पड़ती थी और फिर इन्होंने धन भी खासा कमाया था। और
सबसे बड़ी बात तो यह थी कि अपने अमेरिका-प्रवास के फलस्वरूप इन लोगों
ने स्वदेश-सम्पर्क को नही तोड़ दिया था। ये करते तो थे अमेरिका में कुलीगिरी
या मज़दूरी, लेकिन यह जानने के लिए सदा व्यग्र रहते थे कि हमारे देश में कहाँ
क्या हो रहा है। उस समय बंगाल की नवजागरण की तरंग ने जिस प्रकार
भारत के अन्यान्य प्रदेशों में एक भाव की हिलोर पैदा कर दी थी उसी प्रकार
उसका हिलकोरा सुदूर अमेरिका मे स्थित भारतीयों के हृदय में भी लगा था।
जब भारत में गदर की चिनगारियाँ धीरे-धीरे इधर-उधर चारो ओर उड़ रही
थीं तब अमेरिका मे कुछ भारतीयों के जी-ही-जी मे वे धधककर जल रही थी।
इसी समय भाई करतार सिंह नामक एक तरुण युवा इनके साथ आकर सम्मिलित
हुए। ये उड़ीसा मे रेवेनशा कालेज की प्रथम श्रेणी की पढ़ाई समाप्त करके विशेष
कारण से अमेरिका चले गए थे। यद्यपि सिक्खो में ये सबसे कम उम्र के थे, फिर
भी इनकी अधिनायकता मे मैंने कितने ही बड़ी उम्र के सिक्खों को भी काम
करते देखा। इन्होंने अपने-जैसे विचार रखनेवाले दो-एक व्यक्तियों की सहायता
से एक सम्वादपत्र के निकालने का सकल्प किया। इसी समय पंजाब के स्वनाम
ख्यात देशभक्त लाला हरदयाल भारत में विप्लव करने की सारी आशाएँ छोड़-
छाडकर अमेरिकन सोशलिस्टों (साम्यवादियों) के साथ आत्मीयता स्थापित
करने का यत्न कर रहे थे। करतारसिंह और उनके मित्र इस अवसर पर हरदयाल
के पास ऐसे पत्र को प्रकाशित करने का प्रस्ताव लेकर उपस्थित हुए। स्वदेश-
प्रेमी हरदयाल तो ऐसे सुयोग की ताक में ही बैठे थे। उन्होंने खुशी-खुशी इस
काम को हाथ में ले लिया। इस प्रकार 'गदर' नामक विख्यात समाचारपत्र का
प्रकाशन होना आरम्भ हुआ, और धीरे-धीरे इसी ने 'गदर' पार्टी का संगठन कर
दिया। कैलीफोरनिया का युगान्तर आश्रम ही इसका केन्द्रस्थल था।
बीसवी सदी के महाभारत (प्रथम विश्वयुद्ध 1914-1919) के आरम्भ होने

सिक्ख दल का परिचय / 49
से पहले तक भारतीय विप्लववादियों का दल समझ ही न सका था कि अंग्रेजों
के साथ जर्मनी का विरोध इतनी जल्दी उपस्थित हो जाएगा । फलतः इनके
विप्लव की तैयारी भी इस ढंग से हो रही थी कि मानो दस-पन्द्रह वर्ष के अनन्तर
वास्तविक 'गदर' शुरू होगा । यही कारण है कि ये लोग महासमर छिड़ते समय
क्रान्ति के लिए पूरी तौर पर तैयार न थे । इसके सिवा अब तक के विप्लव-
कारी दल के साथ भारत से बाहरी देश के किसी भी क्रान्तिकारी दल का कहने
लायक कोई सम्बन्ध ही न था । इसका फल यह हुआ कि जब अमेरिका से क्रान्ति-
कारियों के दल-के-दल भारत में आने लगे तब भारत में स्थित क्रान्तिकारी
लोग उनके साथ दिल खोलकर ठीक समय पर सम्मिलित नही हो सके । यदि
ऐसा सम्मिलन हो जाता तो भारत का भाग्य आज कुछ और ही होता ।
अमेरिका प्रवासी विप्लवपथियो की समझ मे नही आया था कि अंग्रेजों के
साथ जर्मनो का युद्ध शीघ्र ही छिड़ जाएगा, इस कारण उनकी तैयारी और ही
ढग पर हो रही थी। वे समझते थे कि भारत से बाहर की किसी अन्य राजशक्ति
की सहायता लेकर युद्ध की तैयारी करनी होगी और इसी सकल्प को कार्य मे
परिणत करने के लिए बहुत कुछ आयोजन हो रहा था, परन्तु इनके लिए असमय
मे ही यूरोप मे रणचण्डी का नृत्य होने लगा । इसके लिए ये तैयार न थे और
सारा संकल्प एकदम विफल हो गया । अब इन्होने निश्चय किया कि गदरपार्टी के
दल-के-दल भारत मे पहुँचकर भारतीय सैनिको को अपने प्रभाव मे कर ले । बस,
क्रान्ति का यही एकमात्र उपाय निश्चित हो गया । हजारो सिक्ख विदेश मे पड़े
हुए अपने बोरिए-बँधने समेट-ममेटकर स्वदेश को रवाना हो गए ।
इधर भारत सरकार को इस पार्टी की बहुत-सी बातो का पता लग चुका था,
क्योकि इस पार्टी के मेम्बर लोग अमेरिका मे खुले खजाने सभाओ मे, भारत मे
गदर करने के सम्बन्ध मे व्याख्यान दिया करते थे । 'गदर' नामक पत्र भी
प्रकाश्य रूप मे मुद्रित होता था । सन् 1857 के महाविप्लव की दसवी मई एक
उत्सव मे परिणत की जाती थी । लाला हरदयाल पर अग्रेज़ सरकार की विशेष
उग्र दृष्टि थी । कई बार उनकी डायरी तक बडी सफाई से उडा ली गई । अन्त
मे जब उनको गिरफ्तार करने की सलाह हो रही थी तब एक अमेरिकन ने उन्हें
सावधान कर दिया । अतएव हरदयाल और अन्य भारतीयो ने अमेरिका से हट
जाने मे ही भलाई सोची ।
विभिन्न स्थानों के जर्मन एलची (कोन्सल) उस समय भारत मे विप्लव
मचा देने की इच्छा रखनेवालो की अनेक प्रकार से सहायता करते थे । अमेरिका
से लौटे हुए इन दलो ने उनसे मिलने-जुलने के अवसर को कभी खाली नही जाने
दिया ।
इस प्रकार कुछ व्यक्ति तो यूरोप की ओर चले गए और जो रह गए वे
भारत की ओर रवाना हुए। रास्ते मे यें लोग जहाँ-तहाँ अपना अभिप्राय प्रकट
कर दिया करते थे । इस प्रकार का एक दल जापान के बन्दर मे पहुँचा । यहाँ पर

50 / बन्दी जीवन
परमानन्द नामक एक छरहरे डील के युवा पुरुष इन लोगों में आ मिले। ये
बुन्देलखण्ड के निवासी थे। अण्डमन में इन्हें हम लोग छोटे परमानन्द कहते थे,
क्योंकि बड़े परमानन्द थे डी० ए० वी० कालेज लाहौर के भूतपूर्व अध्यापक भाई
परमानन्दजी। इन्हें भी लाहौर षड्यन्त्र के मामले में आजन्म कालेपानी की
सजा दी गई थी। पंजाब में सिक्खों के अभ्युत्थान के अवसर पर स्वदेश और
स्वधर्म के लिए जब निडर देशभक्तगण मुसलमानों के अत्याचार के आगे बेधड़क
बलिदान हो रहे थे—सिर दे देते थे लेकिन धर्म न देते थे—उस समय भाई
परमानन्द के एक पूर्वपुरुष ने आत्म-बलिदान की पराकाष्ठा दिखला दी थी। उस
समय उन्हें मुसलमानों ने आरे से चीरकर मारा था। उसी समय से सिक्खों में यह
खानदान 'भाई' नाम से विख्यात हो गया। सिक्खों में यह 'भाई' संज्ञा बड़ी
सम्मानसूचक है। इसलिए हम लोग सिक्ख मात्र को उनके नाम के साथ 'भाई'
शब्द लगाकर बुलाया करते थे।
सिक्खों के एक बड़े उत्साही नेता भाई भगवानसिंह थे। इनके व्याख्यान सुन-
सुनकर कितने ही सिक्ख, अपना काम-काज छोड़, विप्लव कार्य में सहायता करने
के लिए देश में लौट आए थे। ये लोग कुछ क्षणिक उत्तेजना में आकर, सर्वस्व
छोड़-छाड़कर, इस विप्लव-धर्म में दीक्षित नहीं हुए थे, वरन् इनमें सचमुच
देशसेवा की प्रेरणा जाग्रत थी। इस प्रकार से जो सिक्ख देश में लौट आए थे
उनमें बहुतों से मेरी बातचीत हुई थी। उससे मालूम हुआ कि वे सचमुच प्राणों
की प्रत्येक तह में—दिल के हर पहलू में—पराधीनता की जलन का अनुभव
करके विप्लव कार्य में सम्मिलित हुए थे। इनमें से कोई तो पिनांग की मिलिटरी
पुलिस में नियुक्त था, कोई हांगकांग में पहरेदार था और कोई सौदागरी करता
था। इस समय हांगकांग में सिक्खों की एक रेजिमेंट थी। इस रेजिमेंट पर भी
इन लोगों का आधिपत्य हो गया था।
भारत में लौटे हुए दल के अनेक व्यक्ति ऐसे थे जो कि अंग्रेज़ों की पलटनों में
सैनिक पद पर रह चुके थे। इनमें से किसी की सर्विस आठ वर्ष की, किसी की
दस वर्ष की और किसी-किसी की ग्यारह वर्ष की थी। इनमें कोई भी ऐसा सैनिक
न था जिसे तीन वर्ष से कम की अभिज्ञता हो, क्योंकि प्रत्येक सैनिक को कम से
कम तीन वर्ष तक नोकरी करने की शर्त करनी पड़ती है। इनमें से बहुतेरों का
काम मशीनगन चलाना था और कुछ लोग तोपखाने में भी काम कर चुके थे।
भारत में लौटने के मार्ग में पुलिस विभाग के कर्मचारियों ने इन लोगों से
पूछा था कि आखिर तुम लोग हिन्दुस्तान किसलिए जा रहे हो? तो इनमें से
किसी ने कहा कि विवाह करने जाता हूँ और किसी ने कहा कि घर छोड़े बहुत
दिन हो गए, इसलिए देश को जा रहा हूँ। ऐसे ही ऐसे कारण बतला दिए थे।
फिर अदालत में मुकदमे के वक्त जब न्यायकर्ता इनसे हिन्दुस्तान में आने का कारण
पूछते तब भी ये लोग प्रायः वैसे ही उत्तर देते थे जो कि ऊपर दिए गए हैं।
सिर्फ एक व्यक्ति ने दूसरे ढंग का उत्तर दिया था। न्यायकर्ता ने अभियुक्त से

सिक्ख दल का परिचय / 51
पूछा, "तुम देश में किसलिए आए थे ?" इसका उत्तर दिया था कि "यह हमारा
स्वदेश जो है।" इन पंजाबी ब्राह्मण का नाम जगतराम था। ये 'गदर' पत्रिका
के सम्पादन विभाग में काम करते थे।
अमेरिका से आये हुए सिक्खों में उत्साह तो अदम्य था किन्तु काम करने की
रीति उन्हें मालूम ही न थी। न इसका कोई केन्द्र था और न कोई शाखा ही।
किसी-किसी की अधीनता में बीस-पचीस मनुष्य रहते थे। उसे इन बीस-
पचीस आदमियों का सरदार कहा जाता था। ये सरदार कभी एकत्र हो जाते थे
और कभी कुछ दिनों तक इनकी परस्पर भेंट ही न होती थी। असल बात यह कि
सम्मिलित रूप में काम करने की एक प्रणाली का इनमें अभाव था। इसका कारण
यही था कि इनका कही केन्द्र न था। इस प्रकार देश में बिलकुल अव्यवस्थित
रूप से कितने लोग गड़बड़ मचा रहे थे यह कौन जानता है। जो लोग मुलतान
जेल में कैद थे वे भी यही कहते थे कि अब शीघ्र ही बलवा होगा और इससे हम
झटपट रिहाई पा जाएँगे। इमका फल यह हुआ कि ये भिन्न-भिन्न जेलों में बाँट
दिए गए। समानधर्मा और एक ही भाव के भावुक बहुत लोगों के एक स्थान में
रहने से जो आनन्द प्राप्त होता है वह आनन्द भी इनसे छिन गया।
इन सब दलों ने भारत में आते ही बंगाल के गुप्त विप्लव दल का पता
लगाना आरम्भ कर दिया। किन्तु पहले से ही किसी के साथ जान-पहचान न
रहने के कारण पात्र-अपात्र का विचार किए बिना ही ये लोग पंजाब में विद्रोह
की बातें कहने लगे। इस समय कलकत्ता की मामूली सड़कों पर भी मैंने सुना था
कि पंजाब मे विप्लव की तैयारी हो रही है। 'भारत रक्षा' क़ानून बनाते समय
हार्डिज साहब ने इम बात का उल्लेख किया था।
इसी समय करतारसिंह ने आकर बंगाल के किसी सुपरिचित, लब्धप्रतिष्ठ
सार्वजनिक नेता से मुलाक़ात की। उन्होने करतारसिंह को उपदेश दिया कि तुम
अपने संकल्प और सुभीते के अनुसार काम करते जाओ, बंगाल तो ठीक समय पर
तुम्हारी सहायता करेगा ही। अब यह कहने में कोई बाधा नही है कि ये व्यक्ति
सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी थे।
इस समय इन्हें थोड़े-बहुत हथियारों की ज़रूरत हुई। यद्यपि इस विप्लव का
प्रधान अवलम्ब पंजाबी सैनिकों के दल थे, तथापि आत्मरक्षा करने के लिए यथा-
सम्भव प्रत्येक कार्यकर्त्ता को सशस्त्र रखने की इच्छा से कुछ रिवाल्वर इत्यादि की
आवश्यकता हुई। इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए श्रीयुत जगतराम कुछ रुपये देकर
काबुल की ओर भेजे गए और यही से कारागार की यन्त्रणाओं ने उनका पल्ला
पकड़ लिया। बेचारे जगतराम पेशावर मे ही पकड़ लिए गए और आगे चलकर
अण्डमन में मुझे उनके दर्शन हुए थे।
छोटे परमानन्द को भी इन लोगों ने इसी काम के लिए बंगाल भेजा था पर
ये भी खाली हाथ लौट आए।

4
पंजाब यात्रा
इस विप्लव की तैयारी के समय काशी में, बाहरी लोगों से मुलाक़ात करने
के लिए खास-खास मकान थे। पंजाब से जो लोग मुलाक़ात करने आते थे वे
पहले ऐसे ही खास मकान में पहुँचाए जाते थे। वहाँ से खबर मिलने पर दूर से
आगन्तुक व्यक्ति को छिपकर पहचान लिया जाता था। तब, सन्देह न रहने पर,
उससे भेंट की जाती थी। मैं उस दिन काशी में ही था जब पंजाबी दल का एक
मनुष्य वहाँ के विप्लव की तैयारी का समाचार लेकर हमारे पास आया। जब
उसके मुंह से सुना कि विप्लव के लिए दो-तीन हज़ार सिक्ख कमर कसे तैयार
बैठे हैं तब हमारा अन्तरतम पुरुष आनन्द से थिरकने लगा । पजाब के कार्यकर्ताओं
ने आगन्तुक व्यक्ति द्वारा कहला भेजा था कि रासबिहारी की हमें बहुत ज़रूरत
है। दिल्ली षड्यन्त्र के फ़रार असामी प्रसिद्ध कर्मवीर रासबिहारी का नाम उस
समय अमेरिका तक में विश्रुत हो चुका था। इन लोगों ने अमेरिका में ही इनका
नाम सुना था।
कई कारणों से उस समय रासबिहारी पंजाब न जा सके, इसलिए पहले वहाँ
मेरा ही भेजा जाना तय हुआ ताकि जब मैं पंजाब की दशा अपनी आँखों देख
आऊँ और सबको वहाँ का हाल बताऊँ तब आगे का कर्तव्य निर्धारित हो।
पहले ही निश्चित हो गया था कि मैं जालन्धर शहर में जाकर सिक्खों के
नेताओं से भेंट करूँगा। उस समय नवम्बर का महीना खत्म होने को था।
पश्चिम में ठण्ड का मौसम था। उसी शीतकाल के प्रातःकाल लुधियाना में गाड़ी
पहुँचते ही देखा कि मेरे मित्र के परिचित एक सिक्ख युवक हम लोगों की प्रतीक्षा
कर रहे हैं। मित्र ने इनसे मेरा परिचय करा दिया। यही करतारसिंह थे। वह
गाड़ी में सवार होकर हमारे साथ जालन्धर की ओर रवाना हुए। रास्ते में थोड़ी-
बहुत बातें हुईं। उनसे मालूम हुआ कि इस समय लुधियाना में दो-तीन सौ मनुष्य
एकत्र हुए हैं। जुदा-जुदा काम करने के लिए ये लोग विभिन्न दिशाओं में भेजे
जाएँगे। ये लोग गुरुद्वारे में अध्ययन करने के बहाने एकत्र होते थे।
उस दिन की बात मुझे आज खासी स्मरण है। गाड़ी के उस डिब्बे में हम
कई आदमी एकत्र हुए थे, किन्तु सभी के मन का भाव कई तरह का था। हम
तीनों व्यक्ति बीच-बीच में एकाध बात कर लेते थे सही, किन्तु हृदय में न जाने

पंजाब यात्रा / 53
कितने भावों का आलोडन हो रहा था। मैं रास्ते-भर में यही सोचता गया कि इस
सिक्ख दल के आदमी न जाने किस ढंग के होंगे, उनकी शिक्षा-दीक्षा कैसी है;
यह तो सुन ही चुका था कि इनमें बहुतेरों की उम्र तीस वर्ष की या इससे भी
अधिक है, ये मुझे किस दृष्टि से देखेंगे (क्योंकि उस समय मैं कुल बाईस वर्ष का
था), वहाँ जाने पर मेरा इन पर कुछ असर भी पड़ेगा कि नहीं, इतने बड़े उत्साह
से उन्मत्त जनसंघ को हम लोग किस प्रकार सुसंयत करके अपना अभीष्ट साधन
करेंगे; ऐसे-ऐसे सैकड़ों प्रश्न रास्ते-भर भीतर ही भीतर मुझे बेचैन करते रहे।
साथ ही साथ एक आनन्द-स्रोत भी मर्म की ओट करके, मानो बिना जाने ही बहा
चला जा रहा था कि इस बार जीवन का स्वप्न सफल होना चाहता है, युग-
युगान्तर का अँधेरा इस बार हट जाएगा, किन्तु एक और बात को सोचते ही
मानो शंका से मेरी देह कण्टकित हो उठती थी, वह यही कि बंगाल आज कितना
पिछड़ा हुआ है—इस पुण्यधूम यज्ञ से कितने अन्तर पर है ! बंगाल की सैकड़ों-
हजारों वर्षों की कलंक-कालिमा मानो गाढ़ी होकर मुझे निरन्तर कसकती रहती
थी। इसी से बंगाल में जाकर काम करने की मुझे बहुत इच्छा थी। खैर, जाने
दो उस बात को।
लुधियाना पीछे रह गया। अब हम लोग एक और स्टेशन पर पहुँचे। करतार
सिंह ने 'बुलेटिन' नाम का समाचारपत्र मोल लिया। उसमें पढ़ा कि कलकत्ता की
मुसलमान पाड़ा लेन में बम की भीषण घटना हुई है। समाचार था कि खुफिया
पुलिस के डिप्टी सुपरिटेंडेंट श्रीयुत बसन्त चटर्जी के घर पर दो-तीन बम फेंके
गए हैं। इससे एक हेड कांस्टेबल का पैर उड़ गया, कुछ लोग घायल हुए, मकान
की दीवार का कुछ अंश उड़ जाने से गड्ढा हो गया, घर के भीतर का आराईश
का बहुत-सा सामान सड़क पर आ गिरा और मकान के सामने का लालटेन का
खम्भा टूट-फूट गया है, इत्यादि। किन्तु बसन्त बाबू इस बार साफ बच गए।
समाचार पढ़ने से बहुतेरी बातें मैंने समझ लीं। पंजाब का वृत्तान्त लिख चुकने
पर बंगाल की उस समय की दशा पर विचार करते समय इन बातों को ठीक-
ठीक लिखने की इच्छा है।
इन बम गोलों के फटने से भारत में चारों ओर देशभक्तों के बीच जाग्रति-
सी देख पड़ती थी। सभी, कम से कम बहुतेरे, लोग समझते थे कि बड़े भारी
विप्लव की तैयारी का यह ऊपरी लक्षण है और ऐसी घटनाओं से सबको ऐसे-ऐसे
दलों का संगठन करने की इच्छा होती थी। उल्लिखित संवाद को पढ़कर करतार
सिंह बहुत ही प्रसन्न हुए। परस्पर नेत्रों में बातचीत हो गई, एक-दूसरे की आँखों
के कोनों से आनन्द का आभास प्रकट हुआ। इस प्रकार हम लोग जालन्धर
स्टेशन पर पहुँचे। यहाँ करतारसिंह के कई छात्र-मित्र प्रतीक्षा कर रहे थे। इनमें
जिनसे जो कुछ कहना था वह कह-सुन चुकने पर हम लोग रेल की पटरी को पार
करके पास के बगीचे में गए, वहाँ पर इस दल के कई नेता उपस्थित थे। इनको
देखने से मुझे भरोसा हुआ कि इन लोगों के बीच में मैं बिलकुल ही कम उम्र नहीं

54 / बन्दी जीवन

हूँ, क्योंकि इनमें ऐसा कोई भी न जँचा जिसकी उम्र मेरी अपेक्षा बहुत अधिक
हो। उस दिन वहाँ पर करतारसिंह, पृथ्वीसिंह, अमरसिंह और रामरक्खा के
सिवा शायद एक व्यक्ति कोई और उपस्थित था। करतारसिंह की उम्र उस
समय उन्नीस-बीस वर्ष से अधिक न होगी। अमरसिंह और पृथ्वीसिंह दोनों ही
राजपूत थे, किन्तु मुद्दत से पंजाब में ही रहते थे। इनकी अवस्था चौबीस-पचीस
वर्ष से ऊपर नही जँची। रामरक्खा ब्राह्मण थे। इनकी उम्र भी इसी के लगभग
होगी। ये लोग रासबिहारी से मिलने के लिए ठहरे हुए थे। मेरे पूर्व-परिचित
मित्र ने इन लोगों के साथ मेरा परिचय करा दिया। मैंने पहले-पहल इनमें से
किसी का भीनाम-धाम आदि नहीं पूछा। फिर तो बातचीत के सिलसिले में मुझे
सभी का नाम मालूम हो गया। हमारे दल में ऐसी जाँच-पड़ताल ज़रा सन्देह की
दृष्टि से देखी जाती थी और इस प्रकार नाम-धाम पूछना तो मैं बिलकुल
अनावश्यक समझता था। मित्र ने मेरा परिचय यह कहकर कराया कि
रासबिहारी तो एक खास काम के मारे आ नहीं सके, उन्होंने अपने दाहिने हाथ
स्वरूप इन्हें भेजा है। करतारसिंह ने कहा कि हमें तो रासबिहारी से ही काम
है। तब मैंने उन्हें समझाया कि यहाँ आने से पहले वह यहाँ की दशा का पूरा-
पूरा हाल जान लेना चाहते हैं, इसके सिवा वह ऐसी दशा में हैं जिससे और भी
कुछ समय तक इस ओर न आ सकेंगे। इसके पश्चात् मैंने इन लोगों से पजाब
की हालत जानने के लिए पूछा—वे लोग कितने आदमी हैं, आपस में किस प्रकार
मिलते-जुलते और मुलाक़ात करते हैं तथा उनका वास्तविक नेता कौन है,
इत्यादि। मैंने कहा, "जो आपके असली नेता हों उन्ही से मै बातचीत और
पहचान करना चाहता हूँ।" अमरसिंह ने कहा, "सच पूछिए तो हम लोगो मे
वास्तविक नेता की खास कमी है और इसीलिए हमें रामबिहारी की ज़रूरत है।
यहाँ पर हम जितने आदमी मौजूद हैं इनमें किमी को विशेष अभिज्ञता प्राप्त नही
है, इससे हमारे काम का कोई खास सिलसिला नही बैठता। हमको बगाल से
सहायता पाने की बहुत आवश्यकता है। बंगाल में आप लोग बहुत दिन से काम
कर रहे हैं, इन कामों का आप लोगों को यथेष्ट अनुभव हो गया है।" करतारसिह
ने भी इसे माना तो, किन्तु अमरसिंह को लक्ष्य करके कहा, "देखो भाई, यो
हिम्मत क्यों हारते हो? काम के वक्त देख लेना कि तुम्हीं में से कितने छिपे रुस्तम
निकलेंगे।" उस दिन की बातों से मुझे साफ मालूम हो गया कि जिस महान् व्रत
में ये लोग दीक्षित हुए हैं उसके गुरुत्व का अनुभव इनकी नस-नस में भिद गया है
और अपने में शक्ति की कुछ कमी समझकर बाहर एक सहारा ढूँढ़ रहे हैं किन्तु
उसके साथ मैं यह भी समझ गया कि इनमें यदि कोई सचमुच काम करनेवाला है
तो करतारसिंह है। मैंने इसमें जैसा आत्मविश्वास देखा वैसा आत्मविश्वास न
रहने से किसी के द्वारा कोई बड़ा काम नही हो सकता। बहुतों में अहंकार का
भाव रहने पर भी ऐसे आत्मविश्वास का भाव कम देखा जाता है। अहंकार और
आत्मविश्वास. अलग-अलग दो चीजें हैं, अहंकार दूसरे पर चोट करता है, किन्तु

पंजाब यात्रा / 55
जो अहंकार दूसरे पर नोक-झोंक किए बिना ही अपने प्राणों में शक्ति के अनुभव
को जाग्रत करता है वही आत्मविश्वास है।
जो हो, इन लोगों से मुझे पंजाब की बहुत कुछ हालत मालूम हो गई। उनमें
से बहुतेरी बातों का वर्णन पहले किया जा चुका है। इनकी बातों से ज्ञात हुआ
कि इनके विप्लव की तैयारी का मुख्य अवलम्बन पंजाब की सिक्ख फौजें हैं।
करतारसिंह से ज्ञात हुआ कि भारत में अमेरिका से सिक्खों का जो पहला दल
आया था उसी में वे भी आए थे और सितम्बर महीने से इस काम की तैयारी
कर रहे हैं, इत्यादि।
अब करतारसिंह ने मुझसे पूछा, "अस्त्र-शस्त्र आदि देकर के बंगाल हमारी
कहाँ तक सहायता कर सकता है ? बंगाल में कितने हज़ार बन्दूकें हैं ?" इत्यादि ।
मैंने कहा, "आप क्या ख्याल करते हैं ? बंगाल में कितने अस्त्र-शस्त्र होंगे ?"
करतारसिंह, "मैं तो समझता हूँ कि बंगाल में काफ़ी हथियार मौजूद कर
'लिये गए है, क्योंकि बंगाल तो बहुत दिनों से विप्लव की तैयारी कर रहा है और
हमारे दल के परमानन्द के एक बंगाली मित्र ने उन्हें पाँच सौ रिवाल्वर का वचन
दिया है। इसके लिए परमानन्द बंगाल गए हैं।"
मैं, "जिन्होंने परमानन्द से यह बात कही है वह कोई फालतू आदमी जँचते
हैं। क्योंकि बगाल में कोई कही पाँच सौ रिवाल्वर न दे सकेगा। जिन्होंने यह बात
कही है उन्होंने गप्प उड़ा दी है।"
करतारसिंह, "तो फिर बंगाल हमको किस प्रकार की सहायता देगा ? तो
क्या वहाँ भी पंजाब के साथ ही साथ गदर होगा ? बंगाल में आपके अधीन काम
करनेवाले कितने है ?" अन्य किसी समय और किसी भी व्यक्ति को ऐसे प्रश्न
करने का हम लोग मौक़ा ही न देते थे और यदि कोई पूछ ही बैठता तो कह देते
थे, "इन बातों को जानकर क्या कीजिएगा, समझ लीजिए कि कुछ भी तैयारी
नही हुई है ; तो भी आप इस दल मे संयुक्त होगे या नही ? आपका स्वयं आरम्भ
मे ही तैयारी करनी होगी, इस दशा मे भी क्या आप इस दल में भर्ती होना चाहते
हैं ?" इत्यादि । हाँ, बगाल में कही-कही कोई-कोई ऐसे भी थे जो विप्लव की
जंगी तैयारी की बातें बढ़ा-चढ़ाकर लोगों को सुनाते और इस तरह प्रलोभन
देकर उन्हें दल में भर्ती करते थे। जो हो, करतारसिंह ने जब ये प्रश्न किए तब
उनको ठीक उत्तर न देकर टाल देना मुनासिब न हुआ। मैंने कहा, "देखिए,
जिस प्रकार यहाँ आपको सैनिकों में भर्ती होने का अवसर मिलता है, उस प्रकार
बंगाल में यदि हम लोगों को फौज में भर्ती होने का सुभीता मिलता तो अब तक
कभी का भीषण विप्लव मच गया होता। बंगाल के दल में प्रधानतया युवक और
छात्र-श्रेणी के सदस्य हैं और इस दल में हम लोग बड़ी ही सावधानी से, बहुत-
कुछ छानबीन करके ऐसे लोगों को सम्मिलित करते हैं जोकि हर घड़ी मरने को
तैयार रहते हैं। इसलिए हमारे दल में अधिक आदमी नही हैं, शायद हज़ार-दो
हज़ार से अधिक न हों, किन्तु यह दृढ़ विश्वास है कि जिस दिन आमतौर

56 / बन्दी जीवन
पर विप्लव शुरू हो जाएगा उस दिन हजारों आदमी हमारे साथ आ मिलेंगे। यदि
पंजाब में गदर हो जाएगा तो यह भी निश्चित समझिए कि उस दिन बंगाल बैठा-
बैठा तमाशा न देखेगा और अंग्रेजों को बंगाल के लिए इतनी उलझन में पड़ना
होगा कि सरकार अपनी कुल शक्ति पंजाब ही पर न लगा सकेगी।" मैंने यह भी
कहा, "बंगाल इस समय भी सरकारी खजाने लूट सकता है या पुलिस की बारकों
पर छापा मारना इत्यादि काम कर सकता है, किन्तु आगे क्या होगा ? इस 'आगे
क्या होगा' को सोचकर ही बंगाल ने अभी तक ऐसा कुछ नहीं किया।" मैंने इन
लोगों को भली-भाँति समझा दिया कि "हम लोगों से सलाह लिए बिना अचानक
कुछ कर न बैठना।" यह भी कह दिया, "खूब सावधानी से काम करना होगा
जिसमें कि यह शक्ति व्यर्थ न हो जाय, सिर्फ़ हू-हा करके फ़िजूल कामों में शक्ति
क्षीण न कर दी जाय।" मैंने इन्हें सलाह दी कि अधिकांश व्यक्तियों से कहो
कि अपने-अपने गाँव में जाकर रहें, केवल मुखियों का और काम करने के लिए
थोड़े-से आदमियों का समीप रहना ठीक होगा, और सब लोगों को कई टुकड़ियों
मे बाँटकर प्रत्येक टुकड़ी पर एक-एक अधिनायक तैनात कर दीजिए। ऐसा
संगठन करने से जिस समय आवश्यकता होगी उस समय सब लोगों से अनायास
ही काम लिया जा सकेगा। यदि इस प्रकार छोटी-छोटी टुकड़ियां न बनाई जाएँगी
तो गिरफ़्तार हो जाने का अन्देशा हर घड़ी रहेगा।" फिर करतार्रसिंह से
कहा, "आपमें से कोई एक व्यक्ति मेरे साथ चले, मैं उसे उस स्थान पर ले
जाऊँगा जहाँ कि रासबिहारी हैं। रासबिहारी के साथ अच्छी तरह सलाह
करनी है।" यह बात इन्हें पसन्द आई। अब निश्चय हुआ कि लाहौर मे पृथ्वी-
सिंह से दोबारा मुलाकात करके, उनको साथ लेकर, रासबिहारी के पास भेंट
करने को जाना ठीक होगा।
करतारसिंह ने हमारे यहाँ से कुछ रिवाल्वर इत्यादि की सहायता माँगी।
आत्मरक्षा करने और छोटे-छोटे सरकारी खजाने लूटने के लिए कुछ अस्त्र-शस्त्रों
की ज़रूरत थी। अमेरिका से ये लोग जब स्वदेश को लौटे तब अनेक स्थानों से
थोड़े-बहुत रिवाल्वर इत्यादि ले आए थे। अंग्रेजों की प्रखर दृष्टि रहने पर भी ये
रिवाल्वर देश में पहुँच गए थे। बाल्टी की तली में लकड़ी या टीन का पटरा
लगाकर उसके बीच में छिपाकर रिवाल्वर इत्यादि लाए जाते थे किन्तु कुछ दिनों
में रिवाल्वर लाने की यह तरक़ीब जाहिर हो गई। कभी-कभी यह भी होता
था कि भारत के बन्दरगाह में पहुँचने से ज़रा देर पहले ये हथियार खलासियों के
ज़िम्मे कर मुसाफ़िर चले आते थे और फिर फुरसत तथा मौका देखकर उनके
पास से उठा लिए जाने थे। इस रीति से इन लोगों के हाथ कुछ रिवाल्वर आ
गए थे। किन्तु अभी हथियारों की ज़रूरत थी ही। मैं काशी से कुछ रिवाल्वर
और गोलियाँ लाया था। ये सब करतारसिंह को सौंपकर मैंने कहा कि इस वक़्त
यही सामान पास था सो लेता आया, फिर और भी ला दूंगा किन्तु यह भी जता
दिया कि हम लोगों के पास अस्त्र-शस्त्रों का अधिक संग्रह नहीं है, अतएव इस

पजाब यात्रा / 57
सम्बन्ध मे अधिक आशा न कीजिएगा।
मैने बमगोलो के सम्बन्ध मे उनसे कहा कि इस काम मे बगाली लोग सिद्ध-
हस्त हो गये है और बमगोलो की जिस कदर ज़रूरत होगी, बगाल देगा। उस
समय ये लोग भी एक प्रकार का बमगोला बनाते थे। पजाब मे शीशे की और
पीतल की बनी एक तरह की दवाते मिलती थी। ये दवातें ही पजाबियो के बम
का ऊपरी खोल थी। इन दवातो के मुंह मे पेच था, दवात का ढक्कन लगा देने से
बहुत अच्छी तरह बन्द हो जाता था। और इसका मसाला वही था जो कि पटाखो
का है, अर्थात् पुटास (क्लोरेट आव्) और मनशिल। हिन्दुस्तान की बनी कांच
की एक तरह की छोटी शीशी बाज़ार मे मिलती थी। इसमे सल्फ्यूरिक एसिड
भरकर मुंह बन्द कर दिया जाता और इसे खोल मे डाल दिया जाता था। यह
मामूली धक्के मे ही फट पडता था। मालूम होता है कि अक्सर इसमे मसाले के
साथ शक्कर भी डाली जाती थी। शीशी के टूटने पर एसिड पुटास और शक्कर
के सयोग से यह बमगोला फट पडता और दवात के टुकडे चारो ओर छितरा
जाते थे। यह बम वैसा घातक नही था, फेके जाने पर अक्सर फटता ही नही था।
जो फट भी पडता तो आदमी की जान लेने के लिए बहुत करके काफी न होता।
मैने इन्हे समझा दिया कि बगाल का बमगोला बडा विकट होता है। करतारसिह
ने कहा कि पजाब के विभिन्न स्थानो मे हमारे कुछ बमगोले रखे हुए है, जरूरत
हो तो दिए जा सकते है। जब वे आग्रह के साथ लेने को तैयार हुए तो मैने पूछा
कि अब आपसे कहाँ मुलाकात होगी ? उन्होने उत्तर दिया कि "हमारे ठहरने का
कोई निश्चित स्थान नही है।" इस पर मैंने पूछा, "क्या आपका कोई केन्द्र नही
है जहाँ पहुँचने मे सब बातो का पता ( ' जाय ?" उत्तर नही' मे मिला।
मालूम हुआ कि ये लोग अलग-अलग काम से चले जाएँगे और काम हो जाने पर
फिर एक निर्दिष्ट स्थान पर आ मिलेगे। यदि कि ' कारण मे इस प्रकार एकत्र
न मिल सके तो गुरुद्वारे मे ढूंढने के सिवा पता लगाने का और कोई उपाय
नही। यह सुनने से मुझे बडा अचम्भा हुआ। मैने समझा कि शायद मुझे सब
बाते बतलाई नही जा रही है। इस कारण अपनी रीति के अनुसार, मैने विशेष
पछताछ नही की। इसके विषय मे कुछ सलाह भी न दी। पीछे सम्बन्ध घनिष्ठ
होने पर मालूम हुआ कि सचमुच यही दशा थी, तब उसका उपाय भी कर दिया
गया था। उस बाग मे, जहा बातचीत हो रही थी, पहुँचते ही मुझे जँच गया था
कि जालन्धर शहर मे इनका कोई खास अड्डा नही है। जो लोग यहाँ उपस्थित थे
वे सभी जालन्धर शहर के बाहर के ये और मिलने के लिए आए थे। यहाँ इनका
ऐसा कोई स्थान न था जहाँ जाकर मैं आराम कर सकता। इस प्रकार कुछ
सिलसिला न रहने पर भी, ऐसी ही गडबड मे ये उन रासबिहारी को बुलाना
चाहते थे कि जिन्हे गिरफ्तार कराने के लिए उस समय साढे सात हज़ार रुपए
का इनाम घोषित किया गया था। अस्तु, ये सब बाते सुनकर मैने करतारसिह म
अगले दिन किसी स्थान पर पहुँचने के लिए कहा, वह राजी हो गए। निश्चय