बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिक्ख दल का परिचय / 47
समर्थ नहीं हुए, प्रत्युत उनके होंठों पर एक अविश्वास की मन्द मुस्कान ही देख
पड़ी है ।
सिक्खों में प्रचण्ड साहस और उत्साह था, इसके सिवा वे कष्ट भी खूब सह
सकते थे । उनकी विशाल गठी हुई देह, खूब चौड़ा सीना और सुसम्बद्ध कटिप्रदेश
सभी की दृष्टि को आकर्षित करते थे । उनके दाढ़ी और मूंछों से सुशोभित दृढ़ता-
व्यंजक चेहरे को देखकर बहुतेरे उत्पीडकों का दिल दहल जाता था । उनकी
चाल-ढाल से एक विशेष भाव प्रकट होता था । साफ मालूम होता था कि मानो
वे दोनों पैरों पर समान भार डालकर चलते हैं किन्तु बिना दाढ़ी-मूंछों वाले
कोमलांग सीधे-सादे नम्र बंगाली युवकों का चारित्र्य जिस भाँति एक उच्च आदर्श
पर गठित हुआ दिखता था वैसी बात इनमें न थी । इस बात को मैं साधारण
भाव से ही लिख रहा हूँ, क्योंकि व्यक्तिगत रूप से कतिपय सिक्खों के सम्बन्ध में
मेरी बहुत ही उच्च धारणा है । अपनी अंडमन—कालापानी—की कथा का
वर्णन करते समय मैं इस विषय की आलोचना करूँगा ।
शिक्षित कहने से हमारे मन में साधारणतया जो धारणा होती है उस दृष्टि
से कहना पड़ता है कि अमेरिका से लौटे हुए दलों में कोई भी शिक्षित न था ।
भारत के अन्यान्य प्रदेशवाले घर की आधी रोटी पर सन्तुष्ट रहकर बाहर जाने
का साहस नहीं करते किन्तु इनमें से बहुतों ने इस टुकड़े पर सब्र न करके सिर्फ
रुपया पैदा करने के लिए ही पंजाब को छोड़कर विदेश यात्रा की थी । सिगापुर,
पिनांग, स्याम, मलय प्रायद्वीप और चीन के अनेक स्थानों में इनकी गति-विधि
आरम्भ हुई । उधर कनाडा और उत्तर अमेरिका के भी अनेक स्थानों में ये लोग
इसी उद्देश्य से जा पहुँचे सिंगापुर, पिनांग और हांकांग में ये लोग खास करके
अंग्रेजों की फ़ौजों और मिलिटरी पुलिस में भर्ती हो गए थे । स्याम, मलय प्राय-
द्वीप और चीन के अनेक स्थानों में बहुतेरे सिक्ख कुलीगिरी भी करते थे । कुछ
लोग ठेकेदारी या ऐसा ही कुछ और स्वाधीन रोज़गार करते थे । किन्तु कनाडा
और अमेरिका में ये लोग प्रधानतया कुलीगिरी करते थे । वहाँ इनका यही पेशा
था । अमेरिका के किसी-किसी कारखाने में अमेरिकावासियों की अपेक्षा इन्हीं की
ज़्यादा क़दर थी । अमेरिकावासियों की अपेक्षा, ये अधिक काम करते थे इसलिए
इन्हें उजरत भी खासी मिलती थी । इसका फल यह होता था कि अक्सर
अमेरिकन मज़दूरों से इनका झगड़ा-बखेड़ा हो जाता था । मैंने इनसे सुना है कि
एक बार एक शहर में यह मनोमालिन्य इतना बढ़ गया कि एक प्रचण्ड विवाद
का श्रीगणेश हो गया । बस्तीभर में सिक्ख मज़दूर एक ओर और दूसरी ओर
उस शहर के सब अमेरिकन गोरे मज़दूर । खासी मार-पीट हुई, खूब लाठी चली,
किन्तु यह सब होने पर भी सरकार की ओर से सिक्खों पर कोई ज्यादती नहीं
हुई । भारत में यदि कहीं ऐसी घटना हो जाती तो यह मामला न जाने कैसा रंग
पकड़ता । अमेरिका से लौटे हुए ये सिक्ख लोग वैसे शिक्षित न होने पर भी प्रायः
सभी अपनी मातृभाषा में लिखित ग्रन्थ आदि पढ़ सकते थे और अपने गांव के