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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 408 में से

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पूर्व परिचय
1906-1907 ईसवी मे बंगाल मे जो क्रान्त की लहर चल रही थी वह बंगाल
तक ही सीमित न रही। कुछ बंगाल के अनुकरण में, और कुछ बंगाल की प्रेरणा
से, इस समय भारत मे कई स्थानो पर विप्लव-केन्द्रस्थापित हो गये थे। इसी के
फलस्वरूप काशी, दिल्ली और लाहौर मे विप्लव-केन्द्रो की सृष्टि हुई।
मै दिल्ली बम-केस के बाद से ही कहानी आरम्भ करूँगा। उससे पूर्व बंगाल
के बाहर क्रान्तिकारियो ने जो कार्य किए, जनसाधारण को उसका कुछ ज्ञान न
था। दिल्ली षड्यन्त्र के मुकदमे मे लाला हरदयाल और श्री रासबिहारी बसु के
नाम विख्यात हुए। लाला हरदयाल उस समय अमेरिका में थे किन्तु रासबिहारी
घोर सकट के सयय मे भी सन् 1915 तक भारत मे ही रहे। वह बगाल के बाहर
के क्रान्ति कारी दल के नेता थे। उनको साधारणतः हम दादा या रासूदा कहते थे।
दिल्ली षड्यन्त्र के मुकदमे के आरम्भ होने के पहले से ही रासबिहारी
फरार हो चुके थे। उनको पकडने के लिए कई पुरस्कारों की घोषणा हो चुकी
थी। प्रत्येक बडे रेलवे स्टेशन पर उनका फोटो टाँगा गया था और उनको पकड-
वाने वाले को साढे सात हजार रुपया पुरस्कार दिया जायगा, इसकी भी घोषणा
प्रकाशित की गई थी। किन्तु पूरा प्रयत्न करने पर भी सरकार उनको किसी
तरह पकड न मकी।
बहुत सोच-विचार के बाद मेरे परामर्श से रासबिहारी ने काशी मे रहना
निश्चित किया। वह काशी मे मेरे साथ प्रायः एक वर्ष तक रहे। उस ममय उनके
ससर्ग से मैने जो आनन्द पाया था उमे मैं भूल नही सकता। इतने अरसे मे मैने
उनको शायद कभी भी दुखी नही देखा। हाँ, जिस दिन दिल्ली षड्यन्त्र के मुक़दमे
के फैसले के अनुसार चार व्यक्तियों को फाँसी का हुक्म हुआ उस दिन एकान्त
मे उनको अश्रुपात करते देखा था।
रासूदा जितने दिन काशी में रहे उतने दिन मैंने भारतवर्ष के भिन्न-भिन्न
स्थानों के लोगों को उनसे मिलते देखा था। राजपूताना, पंजाब और दिल्ली से
लेकर सुदूर पूर्व बंगाल तक के लोग उनके पास आते थे। वह जब तक काशी में
रहे तब तक युक्त प्रदेश (उत्तर प्रदेश) तथा पंजाब के भिन्न-भिन्न स्थानों में
विप्लव केन्द्रों की स्थापना में लगे रहे। उसी का यह परिणाम हुआ कि एक ही