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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 408 में से

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पृष्ठ 45

पूर्व परिचय / 43
पंजाब में जो हमारे दल के लोग थे उनसे कह दिया गया था कि 'कोमागाता मारू'
के यात्री ज्योंही देश में आएँ उन्हें फौरन दल में भरती कर लिया जाय ।
किन्तु 'कोमागाता मारू' के यात्रियों के भारत की वसुन्धरा पर पैर रखते ही
एक दुर्घटना हो गई । परन्तु इससे हमारी आशा और भी सबल होने लगी ।
देखते-देखते कनाडा और कैलिफोर्निया से सिक्खों के दल के दल देश में आने लगे ।
ये लोग भारत को आते समय रास्ते में, स्थान-स्थान पर उतरकर, पुलिस और
फौज मे नियुक्त सिक्खों के बीच विप्लवाग्नि भड़का रहे थे। ये लोग बहुत दिन
से भारत से बाहर परदेश में थे । इस कारण ये प्रायः यह न जानते थे कि गुप्त
रूप से विप्लव योजना किस प्रकार की जाती है। यही कारण है कि ये लोग
प्रत्येक जहाज और बन्दर मे गदर की आग फैलाते चले आ रहे थे । उसका फल
यह हुआ कि भारत सरकार खूब चौकन्नी हो गई । जैसे-जैसे सिक्खों के दल
स्वदेश में आकर जहाज से उतरने लगे, तैसे-तैसे सरकार की ओर से उनकी यथा-
रीति अभ्यर्थना होने लगी। इस प्रकार एक दल के कोई तीन सो यात्रियो को सीधा
मुलतान जेल मे भेज दिया गया । इनमे से बहुतो के पास काफी धन था, इन्होने
अमेरिका में लगातार कई वर्ष परिश्रम करके जो उपार्जन किया था उसे ये साथ
लाए थे। उनके उस घोर परिश्रम से उपार्जित धन को सरकार ने ज़ब्त कर लिया ।
बेचारो के घरवाले ताकते ही रह गये कि परदेश से दो पैसे आएँगे तो महीने-
भर सुख से पेट-भर भोजन कर लेगे । इनमे से एक सिक्ख के पास कोई तीस
हज़ार रुपये थे ।
बहुतेरे ऐसे थे जो अपनी सारी गाढ़ी कमाई कैलिफोर्निया-स्थित 'युगान्तर
आश्रम' को अर्पण कर आये थे । जितने दल सरकार की तीखी नजर मे बच गये
थे वे पजाब जाकर दलबद्ध होने लगे । सिक्खो के धर्म-मन्दिर गुरुद्वारा कहे जाते
है। इनमे सिक्खो के पुरोहित रहते है। सिक्ख लोग इन्हें ग्रन्थीजी कहते है। प्रत्येक
गुरुद्वारे म एक ग्रन्थीजी रहते है । विप्लवपन्थी सिक्खो के सम्मिलन केन्द्र ये ही
धर्म-मन्दिर थे । मैं ऐसे ही एक गुरुद्वारे मे बैठा था कि एक सिक्ख ने आकर खबर
दी कि 'अमुक-अमुक व्यक्तियो को गुरुद्वारे मे जाते देख मै उनमे भेट कर आया
हूँ ।' थोडी ही देर मे देखा कि उस जमात के मुख्य-मुख्य व्यक्ति उस गुरुद्वारे मे
आ गए जहाँ कि मैं बैठा था । रुपये-पैसे की चर्चा निकलते ही उन्होने तुरन्त सोने
की गोल-गोल बड़ी-बडी चकतियां मेरे आगे रख दी, ये अमेरिका मे प्रचलित सोने
के सिक्के थे । हिसाब लगाने पर कोई हज़ार रुपये के हुए । प्रत्येक दल ने ऐसा ही
किया । गदर के कार्य में इन लोगो को जिस प्रकार दिल खोलकर अपनी गाढी
कमाई का धन दान करते देखा है, वैसा दृश्य बगाल मे देखने को नही मिला ।
इसमें सन्देह नही कि ऐसा उत्साह और आन्तरिकता उन्ही सिक्खों मे थी जो कि
अमेरिका की यात्रा कर आये थे । और यह बात भी है कि पजाब के अधिवासियों
ने प्रायः इन लोगों के साथ सहानुभूति प्रकट नही की । हाँ, पठान और सिक्ख
सैनिको के साथ इन लोगो का विशेष हेल-मेल था। इसके सिवा सिक्ख जाति मे