बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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वर्ष में हमारा दल पर्याप्त शक्तिशाली हो गया और उसी का यह फल था कि
यूरोपीय महायुद्ध जब प्रारम्भ हुआ तब हम खूब जोर से काम कर सके थे ।
सन् 1915 भारत में चिरस्मरणीय रहेगा । इस साल विप्लव की जितनी
बड़ी तैयारी अकारथ गई उतनी बड़ी तैयारी सन 1857 के गदर के पश्चात्,
पंजाब में कूका विद्रोह के सिवा और हुई कि नहीं इसमें सन्देह है । इस षड्यन्त्र-
कारी दल के गिरफ्तार हो जाने पर 'भारत-रक्षा' क़ानून गढ़ा गया था । उस समय
के होम-मेम्बर क्रैडक साहब ने, भारतीय व्यवस्थापिका सभा में उक्त कानून का
प्रस्ताव उपस्थित करते समय जो वक्तृता दी थी, उसमें कहा था— “We
had anarchism for a long time in Bengal but the situation in
the Punjab was serious; in Bengal it was less so.” उस समय सच-
मुच भारत की दशा बहुत ही नाजुक हो गई थी । हां, बंगाल के सम्बन्ध में क्रैडक
साहब की अभिज्ञता उस समय बहुत ही कम थी । कुछ दिन के पश्चात् उक्त साहब
ने स्वीकार किया था कि पंजाब के विप्लवकारियों के साथ बंगाल के विप्लव-
पन्थी दल के सम्बन्ध-सूत्र में सरकार की पहले जो धारणा थी उसमे परिवर्तन
हो गया है ।
उत्तर भारत के विप्लव सम्बन्धी कई मुक़दमों में बहुतेरी बातें प्रकट हो चुकी
हैं । बहुत लोग समझते हैं कि इन बातों में सचाई कम है । बहुतों ने मुझसे कहा
भी था कि 'पुलिस ने अपना दिमाग लडाकर झूठा मुक़दमा बनाकर खड़ा कर
दिया है, वास्तव में वैसा कुछ देश में किया ही नही गया है ।' ऐसे लोगो की बातें
सुनने से मैं दिल में जल-भुन जाता था । सोचता था कि देशवासियो का अपनी
शक्ति का विश्वास यहाँ तक लुप्त हो गया है कि वे यह समझ ही नही सकते कि
उनके स्वजातियो में ऐसा कुछ करने का सामर्थ्य है । किन्तु अन्दर के क्षोभ के
कारण मन की बातें खुलकर न कह सकता था, इससे जलन और भी अधिक होती
थी ।¹ 'कोमागाता मारू' नामक जहाज के सिक्ख यात्रियों को कनाडा की भूमि
में पैर न रखने देने के कारण उनके मन मे जो आग प्रज्वलित हुई थी उसकी
चिनगारियाँ जब चारों ओर उड़ रही थी, तब भारत के एक प्रान्त में बैठे हुए हम
लोग आशा की वेदना से चंचल होकर असहनशील की भांति ताक रहे थे ।
- इस स्थान में पुलिस के कार्यों के सम्बन्ध में दो-चार और बाते कह देना उचित है ।
ऊपर जो कुछ कहा गया है उससे कोई सज्जन यह न समझ ले कि पुलिस जो राजनीतिक
मुक़दमे करती है । वे सब सम्पूर्णतया सत्य होते हैं । पुलिस मुक़दमे बनाने के लिए कई
मिथ्या कथाएँ गढ़ती है और ऐसे ही कई बार सर्वथा निर्दोष व्यक्तियों को भी मुक़दमों में
फँसा देती है । काशी षड्यन्त्र में जिन पर मुक़दमा चलाया गया था और जिनको सजा
दी गई थी उनमें से कई सर्वथा निर्दोष थे । मैं ऐसे कई राजनीतिक मुक़दमों के बारे में
जानता हूँ जिनमें अभियुक्त व्यक्ति बिलकुल निर्दोष थे । लखनऊ राजनीतिक हत्या के
मुकदमे में श्रीयुत सुशीलचन्द्र लाहिड़ी को फाँसी हुई थी किन्तु कइयों की सम्मति में वह
वास्तविक अपराधी नहीं थे ।