बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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तो स्वदेशी आन्दोलन भी उपस्थित न हुआ था। यह केवल मेरे ही मन की दशा
न थी। वयस्क होने पर जब मैंने और-और लोगों से बातचीत की तब मुझे पता
लगा कि मेरे-जैसे और भी बहुतेरे लोग देश में विद्यमान हैं। मुझे तो यही लगता
है कि भगवान् अपने अभीष्ट को सिद्ध करने के लिए पहले ही से तैयारी करते आ
रहे हैं।
हमने जो आध्यात्मिक साधना ग्रहण की थी, एक शब्द में उसे आत्मसमर्पण
योग कहा जा सकता है। भक्ति-योग अथवा प्रेमसाधन से इनका घनिष्ठ सम्बन्ध
है। मैं भगवान् को प्यार करता हूँ, इतना प्यार करता हूँ कि उसके सिवा अन्य
किसी वस्तु को अपना नही कह सकता। मैं जो कुछ करता हूँ, वास्तव में वह मैं
स्वयं नहीं करता, मैं तो केवल निमित्त-मात्र हूँ। भगवान् स्वयं मेरे द्वारा उन
कार्यों को सम्पन्न करते हैं। वेदान्त में इस मत का पर्याप्त पोषण किया गया है।
जगत् में शक्ति एक ही है, अतएव जो कुछ इस संसार में होता है सब उस शक्ति
का ही खेल है। परन्तु जगत् को हम माया नही समझते, वरन् उस भगवान् की
लीला मानते हैं। हमने निज जीवन में, देश में तथा जगत् में उसी एक शक्ति की
लीला देखने तथा अनुभव करने की चेष्टा की थी।