बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
प्रथम संस्करण की भूमिका
किसी समाज को पहचानने के लिए उस समाज के साहित्य से परिचित होने
की परम आवश्यकता होती है, क्योंकि समाज के प्राणों की चेतना उस समाज के
साहित्य में भी प्रतिबिम्बित हुआ करती है। आज भारत ध्वंस और निर्माण के बीच
क्रमशः अपनी सार्थकता को खोजता फिरता है, अतः भारत का समाज यदि सजीव
होगा तो भारत के प्राणों की इस अशान्ति का चित्र उसके साहित्य में अवश्य ही
अपने प्रतिबिम्ब को अंकित कर देगा। हम भारतवासी आज यह नहीं जानते कि
इस अशान्त अटूट गति का वेग कितना प्रचण्ड है, किन्तु हमारे पश्चात् आनेवाली
पीढ़ी इस गति के वेग को बखूबी बतला सकेगी। भारत के इस ध्वंस और निर्माण
के उद्योग के बीच जितनी बड़ी शक्ति का स्फुरण हो रहा है उसके स्वरूप को
जानने का समय शायद अभी आया नहीं। इस बनाव-बिगाड़ का एक चित्र—भले
ही वह अस्पष्ट और मलिन हो—भारत की इस भाग्य-परीक्षा की एक धुँधली-सी
छाया आज भारत के साहित्य में भी धीरे-धीरे प्रकट हो रही है। इसी से 'निर्वा-
सन-काहिनी', 'कारा-काहिनी', 'द्वीपान्तरेर कथा', 'निर्वासितेर आत्म-कथा' और
'बांग्लाय विप्लव-वाद' आदि ग्रन्थ बंग भाषा के साहित्य में क्रमशः प्रकाशित हो
रहे हैं। भारत के प्राण आज जैसे कुछ छटपटा रहे हैं, उस छटपटाहट (अशान्ति) का
पूरा स्वरूप उसके साहित्य में प्रकाशित नहीं हो सका, अभी नहीं हुआ तो न सही,
क्रमशः आगे होगा। 'निर्वासितेर आत्म-कथा' इत्यादि पुस्तकें जिस श्रेणी की हैं
उस श्रेणी के अन्तर्गत मेरी यह पुस्तक 'बन्दी जीवन' भी है। इस श्रेणी की कई
पुस्तकें जब पहले से मौजूद थीं तब फिर यह 'बन्दी जीवन' मैंने क्यों लिखी?
इसके विशेष कारण सुन लीजिए।
मुझे यह कहना है कि सजीव जातियों में छानबीन करने की प्रवृत्ति बहुत
प्रबल होती है। इस जाँच-पड़ताल करने की प्रवृत्ति के कारण ही सजीव जातियाँ
अपने समाज के रत्ती-रत्ती समाचार के लिए चौकन्नी रहती हैं। शायद एक देहाती
के वंशावृक्ष-कुल का पेड़-पत्ता जानने में किसी ने अपनी सारी उम्र इस आशा से
बिता दी थी कि इस प्रकार तथ्य संग्रह कर देने से कदाचित् किसी दिन किसी को
वंशानुक्रम की धारा का पता लगाने में सुभीता हो जाय। भारत के वर्तमान
समाज की भीतरी वेदना का परिचय, उसका परिमाण और उसका कारण जानने
का समय क्या अभी तक उपस्थित नहीं हुआ? उस भीतरी वेदना—दर्दे दिल—
भूमिका / 21'
को हटा देने की इच्छा से भारत में जो अभिनव आन्दोलन आरम्भ हुआ है वह
आन्दोलन कितना व्यापक और गम्भीर है, कहाँ-कहाँ पर उसमे कोर-कसर और
भूल-चूक रह गई है, वह आन्दोलन किस परिमाण मे सार्थक हुआ और कितना
अपूर्ण रह गया है तथा उसमें यह अधूरापन क्यों रह गया—इन सारी बातो का
जान लेना क्या प्रत्येक भारतवासी का कर्तव्य नही ? इन सारी बातो को जानने
के लिए इस ढंग की बहुतेरी पुस्तकों के प्रकाशित होने की आवश्यकता है जिस
ढंग की कि यह पुस्तक 'बन्दी जीवन' है । ऐसी-ऐसी जितनी पुस्तकें प्रकाशित
होगी मुख्य विषय को समझना उतना ही आसान हो जायगा ।
मेरा वक्तव्य यह है कि 'कारा-काहिनी' के ढंग की जितनी पुस्तकें प्रकाशित
हुई हैं उनमे अरविन्द बाबू की 'कारा-काहिनी' और बाबू नलिनी किशोर-लिखित
'बागलाय विप्लव-वाद' नामक पुस्तके मुझे सर्वश्रेष्ठ जंची । हाँ, अरविन्द बाबू
ने सिर्फ कलकत्ते के कारागार की ही कथा लिखी है, और मैं चाहता हूँ कि
लाहौर, बनारस, कलकत्ता और अण्डमन की बाते इसी ढंग से लिखूं तथा इस
सिलसिले मे पजाब, युक्त-प्रदेश, बगाल और अग्रेज-शासित भारत के अन्यान्य
प्रदेशो के मानव-चरित्र की भी थोडी-बहुत चर्चा करूँ । सच पूछो तो 'बागलाय
विप्लव-वाद' के लेखको ने वे बाते जो कि मुझे कहनी है, मेरी अपेक्षा कही अच्छे
ढग से प्रकट कर दी है । भाषा पर यद्यपि मेरा उनकी भाँति अधिकार नही है,
फिर भी अभी तक बहुतेरी बाते प्रकट करने को रह गई हैं, बगाल की बातो का
वर्णन करते समय ही मैं उनकी चर्चा करना चाहता हूँ। मै बखूबी जानता हूँ कि
भाषा की दृष्टि मे मैं सुन्दर नही लिख सका, और इस दृष्टि से तो उपेन्द्र बाबू की
पुस्तक के साथ किसी की भी पुस्तक टक्कर लेने योग्य नही । ताना देने और
मज़ाक करने की ऐसी कुशलता बगाल मे कदाचित् ही किसी और लेखक मे हो ।
उपेन्द्र बाबू निस्सन्देह बगाल के शक्तिशाली लेखक है । किन्तु उनकी 'आत्म-कथा'
मे बहुत ही गुरुतर विषयो की आलोचना भी बिलकुल साधारण रीति पर की
गई है, मानो उनका उसी मे कौतुक है। इसी कारण 'निर्वासितेर आत्म-कथा'
चित्ताकर्षक होने पर भी मर्मस्पर्शिनी नही हुई । और वारीन्द्र बाबू की 'द्वीपान्तरेर
कथा' मे जो भाग उपेन्द्र बाबू का लिखा हुआ है वही मुझे अच्छा लगा । उक्त
पुस्तक का आधे से भी अधिक अंश उपेन्द्र बाबू का ही लिखा हुआ है। बाबू वारीन्द्र
कुमार घोष ने यद्यपि लिखा यही है कि "यह दो मुखो की एक ही बात है' किन्तु
यह सभी की समझ मे आ जाता है कि यह दो मुखो की साफ-साफ अलग-अलग
बाते हैं। वारीन्द्र बाबू के लिखे हुए अश मे, बीच-बीच मे यद्यपि खासा कवित्व
है, तथापि, सच तो यह है कि उसमे भी विप्लववादियो की मर्म-कथा प्रकट
नही हुई । इसके सिवा इसमे इस द्वीपान्तर की कथा की बहुतेरी बातें आसानी
से दबा दी गई है। ऐसा क्यो हुआ है, इसका विचार यथास्थान करने की इच्छा
है ।
'बन्दी जीवन' के इस खण्ड मे यही लिखने की चेष्टा की गई है कि यूरोप के
22 / बन्दी जीवन
महायुद्ध के समय भारत में क्रान्ति की कैसी-क्या तैयारी की गई थी। रौलट-
रिपोर्ट में तो इसका यह पहलू बिलकुल ही छिपा दिया गया है परन्तु 'टाइम्स
हिस्ट्री ऑफ दी ग्रेट वार' (Time's History of the Great War, volume
dealing with India) नाम की पुस्तक में इसका थोड़ा-सा उल्लेख आ गया
है। माना कि क्रान्ति की इस तैयारी का उपयोग नहीं किया जा सका, फिर भी
सफलता या विफलता के दृष्टिकोण से इसकी महानता का फैसला करना ठीक
नहीं। पितामह भीष्म का महत् चरित्र क्या कुरुक्षेत्र के महासंग्राम में उनकी हार-
जीत पर अवलम्बित है ?
इस पुस्तक के दूसरे खण्ड मे यह बतलाने की इच्छा है कि युद्ध छिड़ने के पूर्व
भारतीय विप्लववादियो की क्या दशा थी और उनके मन की गति ने किस-किस
प्रकार आघात लगने से कैसा-क्या भाव धारण किया था। इसके पश्चात् मेरे
फरार हो जाने की दशा, फिर गिरफ्तार होने और मुकदमा चलने एवं 'बन्दी
जीवन' का वर्णन करने का विचार है। मेरी गिरफ्तारी हो जाने के बाद भी
भारत और बर्मा मे जिस प्रकार क्रान्ति की गुप्त योजना की जा रही थी उसका
भी वर्णन करने का मेरा इरादा है।
सुना है कि वारीन्द्रकुमार के साथी उल्लासकर दत्त अण्डमन टापू मे कहते
थे कि "बडे सख्त लोगो से काम पडा है, ये हाड और मांस तो खाएँगे ही इसके
सिवा चमडी से डुगडुगी मढकर बजाएँगे।" ऐसे सख्त लोगो के हाथ से मुझे कैसे
छुटकारा मिला था, इसका भी अन्त मे वर्णन करने की अभिलाषा है। जीवन में
तरह-तरह की चोटे लगने से अन्त मे मन की क्या दशा हुई, उसको एक बात मे
न कहकर क्रमश. स्पष्ट करने की चेष्टा की जायेगी। मेरी अभी तक यह धारणा
है कि यह पुस्तक तीन खण्डो मे समाप्त होगी, लेकिन कर्मक्षेत्र की विषम उल-
झनो मे पडकर मै नही कह सकता कि इस पुस्तक का कितना अश पूरा लिख
पाऊँगा। कारण, आज तक जितने काम मैंने अपने हाथ मे लिए, किसी को भी मैं
निर्विघ्न रूप से पूर्ण नही कर पाया।
25 अगस्त, 1922
कलकत्ता
—शचीन्द्रनाथ सान्याल
निवेदन
आज भूतकाल की बातें लिखने बैठा हूँ। वह समय आज बहुत ही महिमामय
जान पड़ता है। जान पडता है कि जिस प्रकार समय अनन्त है उसी प्रकार
उसकी महिमा भी अनन्त-अपार है। ऐसा लगता है कि समय मानो उसे भी
सुन्दर बना देता है जो कि सुन्दर नही है, वह असंगति मे भी संगति मिला देना
है, उसे बेढगी नही रहने देता। समय की महिमा विचित्र है, उसकी कृपा से
अप्रिय की स्मृति प्रिय हो जाती है।
वास्तव मे अतीत—गुजरे हुए—की स्मृति बड़ी मीठी होती है, वह वीणा के
तार मे सोई हुई झकार की तरह तार पर आघात करते ही मधुर भाव से झंकृत
हो उठती है।
कई बार पिछली बातो की याद दु.ख भी कम नही देती। किन्तु उस दुःख-
दर्द के बीच भी मानो सुख रहता है। उस समय चित्त का मर्मस्थल तक खुल
जाता है, मानो उस अवसर पर अपने आपके साथ बिलकुल निर्जन मे, बहुत ही
गुप्त रूप से, बातचीत होती है।
आशा और निराशा, सुख और दुःख, मानो ज़िन्दगी-भर हमारे साथ खिल-
वाड करते हैं, किन्तु बहुत दिनों तक इनमे से कोई भी नही टिक सकता। सभी
दो दिन दर्शन देकर—हँसाकर या रुलाकर—चले जाते हैं, सिर्फ उनकी याद रह
जाती है।
स्मृति-पट पर बहुतेरी बडी चीजें छोटी हो जाती हैं और छोटी चीजें बड़ा
रूप धारण कर लेती है—कुछ चींजे ऐसी भी है जो मन में ऐसी जा छिपती हैं
कि फिर उनको ढूँढ़ निकालना कठिन हो जाता है।
बनारस षड्यन्त्र में मुझे सजा हुई थी। सन् 1915 की 26वीं जून को मैं
गिरफ्तार हुआ और 14 फरवरी सन् 1916 को आजन्म कालेपानी का तथा सारी
सम्पत्ति जब्त होने का दण्ड मिला। इसके अनन्तर कुछ दिन तक तो काशी के
कारागार में ही रहा, फिर अगस्त महीने में अण्डमन द्वीप को रवाना कर दिया
गया। अगस्त की 18वी तारीख को मैं उस द्वीप के जेलखाने में दाखिल किया
गया। फिर इच्छामय की इच्छा के अनुसार फरवरी सन् 1920 में सम्राट् के
घोषणापत्र के कारण रिहा किया गया।
बस, सन् 15 से लेकर सन् 20 के आरम्भ तक मेरा प्रथम बार का बन्दी
24 / बन्दी जीवन
जीवन रहा। इस 'बन्दी जीवन' का अवलम्ब ग्रहण करके मैं बतलाना चाहता
हूँ कि आखिर मैं कैद क्यों किया गया था। यह पुस्तक आज मैं इसलिए लिख रहा
हूँ जिससे कि भारत के भविष्यत् इतिहास के कुछ अध्याय ठीक-ठीक लिखे जा
सकें।
भारत का भाग्य एक महान् युग-सन्धि के बीच होकर दौड़ता जा रहा है।
भारत के भीतर और बाहर क्रान्ति की भयंकर आग, भगवान् की गुप्त प्रेरणा
से अपने निर्दिष्ट मार्ग पर—और वह भी मानो अपने लिए अनुकूल बवंडर
बनाकर—फैलती जा रही है, ऐसे ही एक बवंडर में उसी विधाता की मर्जी से
मैं भी पड़ गया था।
मेरी ही तरह और भी कुछ युवा पुरुष, अपने मर्मस्थल की अव्यक्त वेदना
से अधीर होकर, जान-बूझकर या बे-समझे-बूझे विधाता का अभीष्ट सिद्ध करने
के लिए ही दलबद्ध हो गये थे। मुद्दत से मैं चाहता था कि उस दल के भीतरी
मर्म का, जो कि काम-काज के बाहरी आडम्बर में छिप गया था, एक संक्षिप्त
इतिहास लिखूँ। आज उसी मर्म व्यापी इच्छा को चरितार्थ करने की चेष्टा कर
रहा हूँ।
हम लोग अक्सर घटना को ही महत्त्व दे देते हैं—उसी को बड़े आकार में
देखते हैं; किन्तु यह नहीं समझते कि घटना की ओट में—फिर वह घटना कितनी
ही क्षुद्र क्यों न हो—महाशक्ति की लीला रहती है, और वही असल में घटना
की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्यवान होती है। सफलता का मोह हम लोगों को प्रति
पग पर घेरता है। विचार के द्वारा उस मोह का छेदन हो जाने पर भी प्राण उस
मोहावेष्टन को काटकर अलग कर देने में समर्थ नहीं होते। किन्तु बड़ी-बड़ी
घटनाओं के मुकाबले में जीवन-यापन की मामूली बातें भी कुछ कम महत्त्व की
नहीं होती। घटनाओं का आरम्भ विचार-जगत् में ही हुआ करता है।
इस सन्दर्भ में व्यक्तिगत चरित्र की आलोचना होने पर भी वह व्यक्तिगत
रूप में न की जायेगी। व्यक्ति से परिचय हुए बिना समष्टि से परिचय नहीं हो
सकता। इसलिए तो व्यक्तिगत चरित्र की आलोचना आवश्यक हो जाती है।
यह परिचय देने में मेरे अपने और अपने दल के बहुतेरे छिद्र प्रकट हो
जाएँगे। तो इसलिए क्या मैं उन दुर्बलताओं और संकीर्णताओं को छिपाने की
व्यर्थ चेष्टा करूँ जिन्होंने कि हमें भीतर-ही-भीतर पंगु बना दिया है? ऐसी चेष्टा
व्यर्थ तो होगी ही क्योंकि एक-न-एक दिन सत्य प्रकट होगा और जरूर होगा,
और साथ ही छिपाने का उद्योग करने से न सिर्फ सत्य का अपलाप ही होगा
अपितु उससे हमारा पंगुत्व—निकम्मापन—भी और अधिक बढ़ जायेगा।
इतिहास के पृष्ठों में 'सत्यम् ब्रूयात् प्रियम् ब्रूयात् मा ब्रूयात् सत्यमप्रियम्' सार्थक
नहीं।
क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का
आत्म-चरित्र
भारत के सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल के 'बन्दी जीवन' का
प्रथम भाग अगस्त सन् 1922 में प्रकाशित हुआ था, द्वितीय भाग वगबाणी में
छपा था, जिसका अनुवाद श्री जयचन्द्र विद्यालंकार ने किया था, और तृतीय भाग
के कुछ लेख 'प्रताप' में छपे थे, पर वे पुस्तकाकार में प्रकाशित नहीं हो सके । इन
तीनों भागों को एक साथ पढ़ने का सौभाग्य हमें अभी प्राप्त हुआ है और इसके
लिए हम श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल के अनुज श्री भूपेन्द्रनाथ सान्याल के ऋणी
और कृतज्ञ हैं। हमें इस बात का पछतावा है कि हम ऐसे महत्त्वपूर्ण आत्म-चरित्र
को अब से पहले क्यों नहीं पढ़ सके ।
'बन्दी जीवन' को पढ़ते हुए कई बातें आश्चर्यजनक प्रतीत होती हैं। सबसे
पहली बात तो यह है कि ग्रन्थ-लेखक की विश्लेषण-शक्ति आश्चर्यजनक थी और
दूसरी यह कि वह धार्मिक वृत्ति के पुरुष थे और उनकी भावनाओं का मूल आधार
भारतीय धर्म ग्रन्थ तथा भारतीय संस्कृति में था । जयचन्द्रजी ने सान्याल बाबू की
गहरी अन्तर्दृष्टि की, जो एक सच्चे ऐतिहासिक की जन्मसिद्ध पूंजी होती है, दिल
खोलकर प्रशंसा की है । उनकी सफलता का कारण बतलाते हुए जयचन्द्रजी ने
लिखा है—"वह केवल इतिहास लेखक ही नही, बल्कि जिस इतिहास को वह
लिख रहे हैं, उसके बनानेवालों में से भी हैं; उस इतिहास के पात्रों के वह जीवन-
मरण के खेल में साथी थे। यदि वह उनके भावों को पहचानते नहीं, तो उनके
नेता ही कैसे बनते ? सच्चे विप्लव-नेता में भी तो ठीक वे ही गुण चाहिएँ, जो
एक सच्चे इतिहास-लेखक के लिए आवश्यक है।"
निस्संदेह यह ग्रन्थ कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है । स्वयं लेखक ने इसके प्रथम
खण्ड के विषय में लिखा था--“इस खण्ड में यही लिखने का प्रयत्न किया गया है
कि यूरोप के महायुद्ध के समय भारत में क्रान्ति की कैसी और क्या तैयारी की गई
थी। रौलट-रिपोर्ट में यद्यपि यह पहलू बिल्कुल ही छिपा दिया गया है, तथापि
'टाइम्स हिस्ट्री आव दी ग्रेट वार' नामक पुस्तक में इसका थोड़ा-सा उल्लेख आ
गया है। माना कि क्रान्ति की इस तैयारी का उपयोग नहीं किया जा सका, फिर
भी सफलता या विफलता के दृष्टिकोण से इसका फैसला करना ठीक नहीं।
26 / बन्दी जीवन
पितामह भीष्म का महत् चरित्र क्या कुरुक्षेत्र के महा संग्राम में उनकी हार-जीत
पर अवलम्बित है ?"
सान्याल साहब ने पुस्तक के प्रथम भाग को लीलामय भगवान् के चरण-
कमलों मे अर्पित किया था और द्वितीय भाग का समर्पण इस प्रकार था—"जिन
को जीवन मे नाना रूप से दुःख-कष्ट ही देता रहा, उत्कट इच्छा रहने पर भी
सांसारिक रीति से जिनको कुछ भी सुखी नही बना सका, दिन और रात सुख
और दुःख मे, सम्पद् और विपद मे, हर घड़ी जिनकी याद करके एकदम आनन्द
और दुःख से विह्वल-सा हो उठता हूँ, जो मेरे दुःखो मे साझी होकर केवल दुःख
ही दुःख पाती रही, अपनी उन्ही परम स्नेहमयी जननी के श्रीचरणो मे यह अपना
क्षुद्र ग्रन्थ श्रद्धा और भक्ति-सहित समर्पित करता हूँ।"
हृदय की कोमलता
पुस्तक के इन तीन भागो को पढ़कर यह विश्वास हो जाता है कि शचीन्द्र
बाबू बडी उच्च कोटि के क्रान्तिकारी थे, जिन्होने हिंसात्मक प्रवृत्तियो मे संलग्न
रहने पर भी अपने हृदय की कोमलता को नष्ट नही होने दिया। उनके इन ग्रन्थो
मे अनेक महापुरुषो और छोटे-से-छोटे कार्यकर्ताओ के जीवन की झाँकियाँ देखने
को मिलती है। सर्वश्री मालवीयजी, सी० आर० दास, जवाहरलाल नेहरू, सुरेन्द्र-
नाथ बनर्जी और रासबिहारी बोस से लगाकर साधारण से साधारण कार्यकर्ता
तक को उन्होने कृतज्ञतापूर्वक याद किया है। जिन दिनो श्री उग्रजी ने अपना साहि-
त्यिक जीवन प्रारम्भ ही किया था, उन दिनो सान्याल बाबू ने उन्हे अपने दल मे
मिलाने की कोशिश की थी। यद्यपि उसमे वह असफल हुए फिर भी उन्होने
उग्रजी की यथोचित प्रशंसा ही की है। उन्होने लिखा है—"इसमे तो कोई संदेह
नही कि उनकी लेखनी मे अत्यन्त शक्ति है, लेकिन उनकी रुचि मे परिवर्तन हो
जाने के कारण उनका सृष्ट साहित्य समाज को आशानुरूप कल्याणप्रद सिद्ध नही
हुआ, यह और बात है, परन्तु इसमे कोई संदेह नही है कि वह प्रतिभाशाली लेखक
है। उनकी सहायता से हमारे दल को एक ऐसा महत्त्वपूर्ण लाभ हुआ कि जिसके
लिए हम सब सदा उनके कृतज्ञ रहेगे।"
श्री सान्याल बाबू ने क्रान्तिकारी सिखो की उदारता की दिल खोलकर दाद
दी है। उन्होने लिखा है—"रुपए-पैसे की चर्चा निकलते ही उन्होने तुरन्त सोने
की गोल-गोल बडी-बडी चकतियाँ मेरे आगे रख दी, जो अमेरिका मे प्रचलित
सोने के सिक्के थे। हिसाब लगाने पर वे कई हजार रुपए के हुए। प्रत्येक दल ने ऐसा
बर्ताव किया था। गदर के कार्य मे इन लोगो को जिस प्रकार दिल खोलकर अपनी
गाढी कमाई का धन दान करते देखा है, वैसा दृश्य बंगाल मे देखने को नही मिला।
इसमे संदेह नही कि ऐसा उत्साह और आन्तरिकता उन्ही सिखो मे थी, जो कि
अमेरिका की यात्रा कर आए थे। इसके सिवा पंजाब के निवासियो ने प्रायः इन
लोगो के साथ सहानुभूति प्रकट नही की। हाँ, पठान और सिख सैनिको के साथ
क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का आत्म-चरित्र / 27
इन लोगों का विशेष हेल-मेल था। इसके सिवा सिख जाति में परस्पर एक-दूसरे
के प्रति सहानुभूति और संवेदना-जनित एकता भारत की अन्यान्य जातियों की
अपेक्षा बहुत अधिक है।"
उदारता और आत्म-बलिदान
'बन्दी जीवन' को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि मानो हम कोई फिल्म
देख रहे हों। सिखों की उदारता तथा आत्म-बलिदान की शक्ति और बंगालियों
की संगठन शक्ति का संयोग सोने और सुहागे का मेल था। लेखक ने लिखा है—
"उत्तर भारत की प्रायः सभी छावनियों में हमारे दल के आदमी आने-जाने लगे।
उत्तर-पश्चिम अंचल के बन्नू से लेकर दानापुर तक कोई भी छावनी अछूती न
रखी गई। प्रायः सभी रेजिमेंटों ने वचन दिया था कि पहले वे लोग कुछ भी न
करेंगे, हां, गदर शुरू हो जाने पर वे अवश्य ही विप्लवकर्ताओं से मिल जाएंगे।
सिर्फ लाहौर और फीरोजपुर की रेजिमेंटों ने सबसे पहले काम शुरू कर देना
स्वीकार कर लिया था। आरम्भ में सरकार यह नही समझ सकी कि षड्यंत्रकारी
इतनी गहरी नींव देकर काम कर रहे हैं। ऐसा न होता तो इतना अधिक काम
हो ही न सकता। पंजाब के पुलिस विभाग के एक मुसलमान डिप्टी सुपरिटेण्डेण्ट
ने अपने एक मुखबिर को इस दल में शामिल कर दिया था। अन्त में उस कृपाल-
सिंह ने ही कृपा करके सारी बातें प्रकट कर दी।"
'बन्दी जीवन' में शहीद करतारसिंह के स्फूर्तिमय चरित्र की जो झांकी दिखाई
गई है, वह बड़ी दिव्य है। उन्होंने लिखा है—"मैंने तो करतारसिंह में जैसा आत्म-
विश्वास देखा, वैसा आत्म-विश्वास न रहने पर किसी के द्वारा कोई बड़ा काम
नही हो सकता। बहुतों में अहंकार का भाव रहने पर भी ऐसे आत्म-विश्वास का
भाव कम देखा जाता है। अहंकार और आत्म-विश्वास अलग-अलग दो चीजें हैं,
अहंकार दूसरे पर चोट करता है, किन्तु जो अहंकार दूसरे पर नोक-झोंक किए
बिना ही अपने प्राणों में शक्ति के अनुभव को जाग्रत करता है, वही आत्म-विश्वास
है।"
सान्याल बाबू ने पंजाबी लोगों को समझाया था—"हम लोगों से सलाह
लिए बिना अचानक कुछ कर न बैठना ! खूब सावधानी से काम करना होगा,
जिसमें कि यह शक्ति व्यर्थ न हो जाय। सिर्फ हू-हा करके फिजूल कामों में शक्ति
क्षीण न कर दी जाय।"
यह बात ध्यान देने योग्य है कि जिस समय सान्याल बाबू यह परामर्श दे रहे
थे, उनकी उम्र कुल जमा बाईस वर्ष की थी ! इस पुस्तक में कहीं-कहीं हास्य का
भी अच्छा पुट आ गया हैं। एक स्टेशन के जलपान-गृह में उन्होंने रोटी और तर-
कारी मांगी थी, पर वहां का आदमी रोटी और मांस ले आया। उस समय तक
सान्याल बाबू को यह पता न था कि पंजाबी लोभ गोश्त को तरकारी कहते हैं !
काशी की पुलिस को चकमा देने के उदाहरण भी बड़े मजेदार बन पड़े हैं।
28 / बन्दी जीवन
ऊँचा बौद्धिक स्तर
यदि कोई यह ख्याल करे कि ये क्रान्तिकारी लोग निरे हत्यारे थे, तो उसकी
यह बड़ी भारी भूल होगी। वे लोग प्रायः आपस में बड़े ऊँचे धरातल से विचार-
विमर्श करते थे। निम्नलिखित वाक्य हमारे इस कथन के प्रमाण हैं—
“अन्त में हम लोगों के बहुत पुराने—किन्तु फिर भी 'नित नये' 'आत्म-
समर्पण योग' की चर्चा निकली। जहाँ एक बार इसकी चर्चा निकल पड़ती वहाँ
फिर जल्द समाप्त न होती थी। मार्ग भले ही एक हो, और सब लोग एक ही
आदर्श से प्रोत्साहित हों, तो भी वही एक बात, एक ही भाव, भिन्न-भिन्न
व्यक्तियों में कितनी ही नवीन रीतियों से विकसित होने का प्रयत्न करता है।
इसलिए एक भाव के उपासक और उसी एक मार्ग के पथिक होने पर भी हम
लोगों के बीच परस्पर असंख्य स्थानों में मतभेद रहता था। मेल तो काफी रहता
था, किन्तु बेमेल ही क्या कम था ? जिस आदर्श से प्रेरित होकर हम लोग अपने
व्यक्तिगत या समष्टिगत जीवन को नियंत्रित कर रहे थे, उस भाव-स्रोत की
तरंग यद्यपि एक ही स्थान से आती थी, तथापि विभिन्न आधारों में उसने अपनी
विचित्रता की महिमा को स्थिर रखा था। हमारे आदर्श की छोटी-मोटी बातों के
झगड़ों में कितनी ही रातें बीत गई हैं, फिर भी उलझनें सुलझी नहीं हैं। एक
व्यक्ति दूसरे को कुछ-कुछ समझकर जब घर से बाहर निकल आता, तब उषा
की लालिमा अधखिले फूल की तरह, पूर्व क्षितिज में दीख पड़ती थी। रास्ता
चलते-चलते जब नींद में अलसाई हुई आँखों पर पलकें गिरने लगती, तब मालूम
होता कि कितनी थकान हो गई है ! रात बीतने से पहले ही इन केन्द्रों से हट
जाना पड़ता था और सबेरा होने पर अनेक काम करते हुए भी रात की आलो-
चना का प्रसंग दुबारा बातचीत करने के लिए मानो प्रतिक्षण अवसर ढूँढ़ता रहता
था और कभी-कभी दिन को काम-काज करते समय न जाने कब उस 'आत्म-
समर्पण-योग' की भावना आकर हम पर प्रभाव जमा लेती थी ।”
सच्चरित्रों के साथ बुरे भी
इस ग्रन्थ में सान्याल बाबू ने मि० पिंगले, निधानसिंह, गुरमुखसिंह तथा अन्य
क्रान्तिकारियों के जीवन पर प्रकाश डाला है। इसमें संदेह नहीं कि कितने ही
अवांछनीय व्यक्ति क्रान्तिकारियों के दल में शामिल हो गए। लेखक ने लिखा
है कि सभी बड़े-बड़े आन्दोलनों में सच्चरित्र पुरुषों के साथ-साथ नरपिशाच भी
घुस पड़ते हैं ! लेखक के शब्दों में, “यह आन्दोलनों का दोष नहीं है, यह तो
हमारे मनुष्य-चरित्र का ऐब है। शायद लेनिन ने भी कहा था कि प्रत्येक सच्चे
बोलशेविक के साथ कम से कम 39 बदमाश और 60 मूर्ख उनके दल में मिल
गए थे और मैंने श्रद्धेय शरच्चन्द्र चट्टोपाध्याय से सुना है कि देशबन्धुदास ने भी
कदाचित् कहा था कि वकालत करते-करते हम बुड्ढे हो गए और इस बीच में
हमको बड़े-बड़े धोखेबाजों से भी साबिका पड़ा, किन्तु असहयोग आन्दोलन में
क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का आत्म-चरित्र / 29
हमने जितने धोखेबाज और दगाबाज आदमी देखे हैं, वैसे जिन्दगी-भर में नहीं
देखे थे !"
यद्यपि साधारण पंजाबियों के चाल-चलन की उन्होंने कठोर आलोचना की
है, फिर भी उनके गुणों का भी विशद वर्णन किया है। एक जगह उन्होंने लिखा
है—"पंजाब में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ ही अधिक बदनाम हैं, किन्तु इसी पंजाब
में उस दिन सतीत्व की ऐसी गोरवोज्ज्वल स्निग्ध किरण प्रकट हुई थी, जिसकी
तुलना इस कलिकाल में मिलनी कठिन है। डी० ए० वी० कालेज लाहोर के
भूतपूर्व अध्यापक भाई परमानन्द के चचेरे भाई बालमुकुन्द दिल्ली षड्यन्त्र के
मुकदमे में गिरफ्तार किये गए। उनके भाई बालमुकुन्द के पूर्व पुरुष मोतीदास
को सिखों के अभ्युत्थान-समय में आरे से चीरकर मार डाला गया था। गिरफ्तार
होने से एक वर्ष पहले भाई बालमुकुन्द का विवाह हुआ था। उनकी स्त्री श्रीमती
रामराखी परम सुन्दरी ललना थी। उम्र उनकी नई थी ही। जिस दिन उनके
स्वामी गिरफ्तार हुए, उसी दिन से वह व्याकुल हो गई और अनेक प्रकार से देह
को सुखाने लगीं। फिर जब भाई बालमुकुन्द को फांसी का हुक्म हो गया तब वह
उनसे मिलने गई। किन्तु उनके मर्माश्रुओं ने जी भरकर स्वामी के दर्शन न करने
दिये। घर लौटकर वह एक प्रकार से अधमरी दशा में समय बिताने लगीं। एक
दिन वह अपने कमरे में थी कि बाहर से रोने का कोलाहल सुन पड़ा। कमरे से
बाहर आने पर श्रीमती रामराखी को असल बात मालूम हो गई। वह अब और
न सहन कर सकी। स्वामी का मृत्यु-समाचार पाकर सती-साध्वी, खासी नीरोग
दशा में, स्वामी का ध्यान लगाकर मानो स्वामी से जा मिलीं। मिट्टी से मिल
जाने के लिए ही मानो उनकी देह इस लोक में पड़ी रह गई ! ऐसे पतिप्रेम और
आत्मोत्सर्ग की तुलना है कही !"
'बन्दी जीवन' के प्रथम भाग में श्री रासबिहारी बोस के विषय में जो कुछ
लिखा गया है, उसे पढ़कर उनके अदम्य उत्साह, अद्भुत साहस तथा अनोखी सूझ-
बूझ की प्रशंसा करनी पड़ती है। निस्सन्देह वह उच्चकोटि के क्रान्तिकारी थे।
द्वितीय भाग में लेखक महोदय ने रासबिहारी बोस की दो चिट्ठियाँ उद्धृत
की हैं। प्रथम पत्र में, जो 12 अप्रैल, 1922 का है, उन्होंने लिखा था—"अवश्य
ही अब गुप्त-कार्य करने की कोई आवश्यकता नही, इस विषय में तुम्हारे साथ
मेरी पूरी सहमति है। अब तक हमे अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के विषय में कुछ
भी ज्ञान न था; हमने अब तक भारत की ओर ही ध्यान रखा था, किन्तु अब मैं
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति कुछ-कुछ समझने लगा हूँ। इससे मेरे पहले विचारों में
बहुत परिवर्तन हो गया है। एक बात याद रखो—हमें अन्त में सारे संसार का
प्रश्न हल करना होगा, हमारे भाग्य में यही लिखा है। संसार में नवीन युग की,
सत्य और शान्ति की, स्थापना का दायित्व भारत के ही सिर पर है। भारत की
स्वाधीनता इसी उद्देश्य का साधन है, यह स्वयं उद्देश्य नहीं है।"
श्री बोस महोदय ने द्वितीय पत्र में फिर लिखा था—"मेरी दृष्टि पहले से
30 / बन्दी जीवन
बहुत विस्तृत हो गई है। पूर्ण स्वाधीनता भारत को चाहिए ही, क्योंकि उसकी
स्वाधीनता पर सारे संसार का पुनरुद्धार निर्भर है। यह स्वयं एक साध्य नहीं,
प्रत्युत एक उद्देश्य का साधन है, और वह उद्देश्य है साम्राज्यवाद और सैनिक आधि-
पत्य का विनाश और सब लोगों के रहने के लिए एक नवीन संसार की सृष्टि ।
॰॰॰मैं जापान से बहुत प्रेम करता हूँ और अब उस पर श्रद्धा भी रखने लगा हूँ ।
मुझे यह दृढ़ विश्वास हो गया है कि उपयुक्त समय आने पर जापान एशिया की
स्वाधीनता के लिए प्रयत्न करेगा। जब मैं पहले पहल यहाँ आया, जापानियों को
भारत की अवस्था का कुछ भी ज्ञान न था। किन्तु अब मुख्यतः हमारी चेष्टा और
त्याग के कारण प्रत्येक जापानी भारत के घटना-प्रवाह को उत्सुकता से देख रहा
है। मन्त्रिमण्डल के सदस्यों से लेकर वकीलों, पार्लमेंट के मेम्बरों, पत्र-संपादकों
और विद्यार्थियों तक मेरे बहुत-से जापानी मित्र हैं। जापानी भाषा में गांधी और
भारतीय आन्दोलन के विषय में बहुत-सी पुस्तकें पकाशित हुई है, और पत्र-
पत्रिकाओं में भारत पर लगातार लेख निकल रहे हैं। आज यहाँ के बहुत-से
नवयुवक एशिया की स्वाधीनता के कट्टर पक्षपाती हो गए हैं।"
'बन्दी जीवन' के द्वितीय भाग में सान्याल बाबू ने अनेक स्थलों पर बड़ी
विचारपूर्ण बातें लिखी हैं। एक स्थल पर उन्होंने विप्लवियों और उनके समा-
लोचकों में जो फर्क बताया है, उसे पढ़ लीजिए- "विप्लवियो और समालोचकों
में भेद यही है कि विप्लवी लोगों की अपने आदर्श पर अटूट श्रद्धा है, इसीलिए
उन्होंने अद्भुत निष्ठा के साथ अपने आदर्शों की ओर जाने वाले पथ पर
चलते हुए जीवन बिताया है, और इन समालोचक लोगों ने आरामकुर्सी पर बैठ-
कर समालोचना करने को ही जीवन का पेशा बना डाला है और बहुतों के लिए
तो यह समालोचना करना ही जीविका अर्जन करने का मुख्य अवलम्ब हो गया
है ! रोज़ी कमाने के लिए अनेक बातों का हिसाब करके चलना होता है, किन्तु
इस प्रकार हिसाब करके चलने से हमेशा सत्य की मर्यादा को अटूट रखना शायद
सम्भव नही होता। इस सबके अलावा विप्लवियों में और इन सारे समालोचकों
में एक और भी बड़ा भेद है। विप्लवियों के नजदीक जो चीज श्रद्धा है, समा-
लोचकों के लिए वह केवल सम्मति है। वह 'सम्मति' प्रायः सफलता का मोह पार
नही कर सकती, इसीलिए फलाफल पर निर्भर होकर ही बहुधा 'सम्मति' बनती
है। किन्तु जो लोग इतिहास-स्रष्टा के आसन पर बैठते हैं वे इस 'सम्मति' की
परवाह नही करते, वे निष्ठावान् और श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति होते हैं। विफलता
उन्हें श्रद्धाभ्रष्ट नही कर पाती । इसी कारण वे इतिहास में चिरस्मरणीय हो
जाते है इसी से श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति ही जगत् में कुछ स्थायी काम कर जाने में
समर्थ होते हैं।"
'बन्दी जीवन' के द्वितीय भाग में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण उसका अन्तिम
परिच्छेद है, जिसमें उन्होंने इस प्रश्न पर अपने विचार प्रकट किए हैं कि विप्लव
का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? वह इस परिणाम पर पहुँचे थे कि किसी प्रतिभा-
क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का आत्म-चरित्र / 31
शासी नेता का अभाव ही इस व्यर्थता का सबसे बड़ा कारण था। श्री अरबिन्द
घोष और लाला हरदयाल के विषय में लिखते हुए उन्होंने कहा है—“यदि वे
लोग अन्त तक इस दल में रहते तो विप्लव दल का यह दैन्य बहुत कुछ दूर हो
जाता, किन्तु वे भी अन्त में इस दल को छोड़ गए। यदि इस प्रकार के चिन्तनशील
प्रतिभाशाली पुरुषों की बात अलग भी रख दें, तो भी इस विप्लव दल में किसी बड़े
साहित्यिक, किसी बड़े समाचारपत्रों के लेखक अथवा किसी बड़े कवि ने भी योग
नहीं दिया। एक तरह से कह सकते हैं कि इस विप्लव दल में इण्टलैक्चुअल्स
(बुद्धिवादी) नहीं थे, इम प्रकार के लोगों का खास तौर पर अभाव था, इसी
कारण वह विप्लव दल प्रचार-कार्य की ओर प्रायः उदासीन ही रहा। जो कुछ
गुप्त पत्रिकाएँ आदि बीच-बीच में प्रचारित होती भी थी, वे केवल सामयिक
उत्तेजनापूर्ण प्रतिहिंसा के उच्छ्वास से भरी होनी थी। इन सब लेखों में विचार-
शीलता का कोई भी परिचय नही पाया जाता था, और न जीवन का कोई नया
आदर्श ही इनमे प्रकट होता था। निस्सन्देह भारतीय साहित्य में इन लेखों का
कोई स्थान नही रहेगा। भारतीय विप्लवी किसी स्थायी साहित्य की सृष्टि नहीं
कर सके। इम प्रकार विप्लव दल का प्रयास व्यर्थ होना ही था।”
जयचन्द्रजी विद्यालंकार ने सान्याल बाबू की इस विचारधारा का विरोध
अपनी भूमिका में किया है। अब भारतीय स्वाधीनता की प्राप्ति के चौदह वर्ष
बाद इस प्रश्न पर गम्भीरतापूर्वक लिखा जा सकता है, पर सबसे बड़े दुर्भाग्य की
बात यह है कि स्वयं विप्लववादियों ने उस दूरदर्शिता का परिचय नही दिया,
जिसका परिचय सान्याल बाबू ने अपना विस्तृत आत्मचरित लिखकर दिया था।
यदि उन सबने अपनी अनुभूतियाँ लिख दी होती तो उनसे उनका उचित मूल्यांकन
करने में किसी इतिहास-लेखक को बड़ी मदद मिलती। पर खेद है कि अभी यह
कार्य अधूरा पड़ा हुआ है। इमका मुख्य कारण शायद यह हो सकता है कि विप्लव-
वादी छिन्न-भिन्न अवस्था मे अलग-अलग पड़े रहे और उनका कोई धनी-धोरी
न रहा। शायद उनमे कोई ऐसा साधन-सम्पन्न भी नही, जो एक बार घूम-घूमकर
अपने साथी-संगियो मे मिल लेता और उनकी अनुभूतियों को लिपिबद्ध करा
लेता। क्रान्तिकारियों की दिल्ली वाली परिषद् मे इस विषय की चर्चा भी हुई
थी, पर मामला आगे बढ़ा नही।
सान्याल बाबू में बड़ी जबरदस्त लगन थी। एक ओर कभी वह पं० मोती-
लालजी से मिलते तो कभी सी० आर० दास से और कभी बैरिस्टर बी० सी०
चटर्जी से और दूसरी ओर कभी वह जयचन्द्रजी को या उग्रजी को या नवीनजी
को अथवा किसी विद्यार्थी को ही अपने दल में लाने की कोशिश करते। उनके
ग्रन्थ के तृतीय भाग मे हमने यह पढ़ा कि उनकी डाक श्री केशवदेवजी मालवीय
के नाम आती थी—श्री महावीर त्यागी मे उनका परिचय था और त्यागीजी ने
ही रामप्रसाद 'बिस्मिल' से उनका परिचय .कराया था। सान्याल बाबू को इस
बात का खेद रहा कि वे नवीनजी को अपने पथ का पथिक नही बना सके।
32 / बन्दी जीवन
श्री दुबलिस से उनका घनिष्ठ सम्बन्ध तो था ही। हमें पता नहीं कि उन साथियों
ने जिनका उल्लेख इस आत्मचरित में आया है, श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल के
स्वर्गवास पर दो आंसू भी बहाए या नहीं। यदि नहीं, तो अब वे उनके संस्मरण
तो लिख ही सकते हैं।
सान्याल बाबू ने पं० जवाहरलाल से जो बातचीत की थी उसे 'बन्दी जीवन'
के तृतीय खण्ड में उद्धृत कर दिया है और वह विवरण निस्संदेह महत्त्वपूर्ण है।
विप्लव का प्रयास असफल क्यों ?
हमारा निजी खयाल है कि विप्लववाद असफल नही हुआ। हां, यह बात
दूसरी है कि हम लोग उस महान् कार्य को, जो विप्लववादियों ने किया था, भूल
गए। त्याग, विचारशीलता और व्यक्तित्व के महत्त्व के खयाल से विप्लववादियों
में कितने ही ऐसे थे, जिनका मुकाबला हमारे अधिकांश शासनारूढ़ महानुभाव
नही कर सकते, बल्कि यों कहना चाहिए कि कुछ अंशों में विप्लववादियों के ही
बलिदान के परिणामस्वरूप ही वे शासनारूढ़ हैं; और कुछ तो अपने को शहीद
आज़ाद आदि का साथी कहने की हिमाकत भी कर बैठते हैं ! यदि भारत का
सच्चा इतिहास कभी लिखा जाएगा तो उसमें विप्लववादियों को आज के नेताओं
से कहीं अधिक ऊँचा स्थान मिलेगा। वर्तमान नेताओं में से अधिकांश के नाम जब
विस्मृति के गर्त में कभी के विलीन हो चुके होंगे, तब चन्द्रशेखर आज़ाद और
भगतसिंह, शचीन्द्र सान्याल और यतीन्द्रनाथ के नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में
लिखे जाएँगे।
इस आत्मचरित के कई अंश बड़े भावपूर्ण हैं। अपनी माताओं के बारे में
उन्होंने बड़े भावपूर्ण ढंग से लिखा है और अपने भाइयों के बारे में बड़े प्रेम के
साथ। श्री सान्याल बाबू को इस बात का खेद था कि देश के अनेक नेता क्रान्ति-
कारियों को देश का शत्रु समझते थे और उनके हृदय में क्रान्तिकारियों के प्रति
बड़ी कटुता भी थी। वह लिखते हैं—"कभी तो ये नेतागण क्रान्तिकारी आन्दो-
लन को इनफेंटाइल अर्थात् बालकोचित कहकर निन्दा करते हैं और कभी क्रान्ति-
कारी आन्दोलन को फैसिस्ट कहकर अपनी जलन को शान्त करते हैं, और कभी
ऐसा भी कह देते हैं कि क्रान्तिकारी लोगों ने देश की प्रगति को पचास साल पीछे
हटा दिया है ! यह भी आक्षेप किया जाता है कि क्रान्तिकारी लोग ज़बरदस्ती,
असहाय, निर्दोष व्यक्तियों को शहीद बना देते हैं ! इस मनोवृत्ति के पीछे शान्त
युक्ति नहीं है और न इसके पीछे कोई ऐतिहासिक प्रेरणा ही है और सर्वोपरि
इसके पीछे देश-हित की कोई कल्याणमयी कामना भी नहीं है। वस्तुतः इस
मनोवृत्ति के पीछे अहंकार का एक उग्र रूप विद्यमान है।"
सान्याल बाबू एक विचारशील व्यक्ति थे। उन्होंने एक जगह लिखा है—
"हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन अथवा हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ के कार्यक्रम
को पूर्ण रूप से समझने के लिए दो बातों को जान लेने की विशेष आवश्यकता है।
क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का आत्म-चरित्र / 33
जिसने भारतीय सभ्यता की कर्म-कथा को भली भाँति नही समझा, उसके लिए
यह संभव नहीं कि कम्यूनिज्म के दोषों को वह ठीक-ठीक समझ सके । इसलिए
भारतीय सभ्यता के प्रति जिसका प्रेम नहीं है, मानव-सभ्यता की उन्नति के लिए
भारतीय सभ्यता की विशेष उपयोगिता है, इस बात पर जिसकी श्रद्धा नही है,
वह इस कार्यक्रम को ठीक-ठीक नहीं समझ सकता ।”
पर शचीन्द्र बाबू बड़े उदार स्वभाव के व्यक्ति थे । वह अपने पुराने साथियों
को अपनी-अपनी अन्तरात्मा के अनुकूल पथ ग्रहण करने के लिए प्रेरित करते थे ।
उनके कितने ही साथी मार्क्सवाद से प्रभावित होकर हृदय से साम्यवादी बन
चुके थे । श्री भगवानदास माहोर ने अपने एक पत्र मे लिखा है—"मैं कुछ दिनों
लखनऊ मे रहा था और तब बड़ी श्रद्धा-भक्ति से मै श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल के
चरणों मे जाकर बैठता था । स्वभावतः देश की राजनीतिक गतिविधि पर ही
बातचीत होती थी । इसके पूर्व आठ-नौ साल जेल मे रहकर मैं जो कुछ थोड़ा-
बहुत अध्ययन कर पाया था उसके फलस्वरूप अन्य सशस्त्र क्रान्तिकारी साथियों
की भाँति मेरा भी विश्वास मार्क्सवाद पर जम गया था । अतः सैद्धान्तिक धरातल
पर न तो श्री सान्याल की बाते ही मैं पूरी तौर पर ग्रहण कर पाता था और न
इतना विद्या-बुद्धिबल ही मुझमे था कि मै अपनी बात ही उन्हें समझा सकता ।
वह अपनी बातें बड़े उत्साह से कहते थे, बहुत बोलते थे, लेकिन दूसरे को भी
बोलने को उत्साहित करते थे और उसकी बात बड़े सब्र मे सुनते थे । जो हार्दिक
प्रेम और वात्सल्य मुझे उनसे मिला वह मेरे लिए तो अमूल्य निधियों मे से है।
उसी समय उन्होने बड़े ही स्वाभाविक और हार्दिक स्नेह से मुझे कहा था—
“तुम्हारा और मन्मथ का स्थान स्वभावतः साम्यवादी पार्टी मे है, तुम इधर-
उधर क्यों भटकते हो ?”
अण्डमन से भारतवर्ष लौटने का जो वृत्तान्त सान्याल बाबू ने लिखा है, वह
बड़ा हृदयस्पर्शी है । वह लिखते हैं—मैं चलकर घर नही आया, बल्कि दौड़ता
हुआ घर पहुँचा। क्या हृदयावेग की आकर्षण शक्ति पृथ्वी की मध्याकर्षण शक्ति
की तरह है, कि अण्डमन से जब चले तब से लेकर घर पहुँचने तक इस आकर्षण
का वेग बढ़ता ही गया और घर के पास आकर आखिर मुझे दौड़ना ही पड़ा !
मकान के नीचे के कमरे का जंगला खुला हुआ था। मैं मुहूर्त-भर जंगले के सामने
आकर खड़ा हो गया । कई एक युवक वहाँ लेटे हुए थे। इनमे मेरे दो भाई
रवीन्द्र और जितेन्द्र भी थे। रवीन्द्र मुझे देखते ही हर्षोत्फुल्ल स्वर से चिल्ला उठे
—“अरे दादा हैं।” रवीन्द्र बिस्तरे से ऐसे उठ पड़े, मानो नीचे से किसी ने ज़ोर
का धक्का देकर उन्हे ऊपर फेंक दिया हो। घूमकर दरवाजे होते हुए अन्दर
आए एव हरएक को छाती से ज़ोर से लिपटा लिया । मेरी यह नई ज़िन्दगी
थी। मेरे नये जन्म का यह आरम्भ था ।
"जिस रोज़ मैं घर पहुँचा उसके पहले दिन ही मेरे कनिष्ठ भ्राता का उप-
नयन संस्कार हो चुका था । घर में किसी को पता न था कि मैं आज यहाँ आकर
34 / बन्दी जीवन
पहुँचूँगा। मैंने सबसे पूछा, "माताजी कहाँ हैं?"
माताजी दूसरे मकान में कुछ काम से गई हुई थीं। मैं पूछताछ कर ही रहा
था कि इतने में वह आ गईं। मुझे देखते ही आनन्द के मारे रो पड़ीं और कहने
लगीं—"बेटा मेरे, आ गए हो। मेरे बेटा, आ गए हो।" और मेरे सिर पर, मेरे
कन्धे पर और माथे पर हाथ फेरने लग गईं। फिर कहने लगीं, "जाने कितनी
मुसीबत तुमने झेली।"
सान्याल बाबू के आत्मचरित के कितने ही अंश बड़े हृदयबेधक हैं और कितने
ही बड़े विचारोत्तेजक। खेद है कि स्थानाभाव से हम उन्हें यहाँ नहीं दे सकते।
उन्होंने अपना सर्वस्व भारतीय स्वाधीनता के लिए अर्पित कर दिया यहाँ तक कि
अपनी अत्यन्त प्रिय पुस्तकों को भी अण्डमन में अपने साथियों को भेंट कर आए
और सिर्फ एक बाइबिल अपने साथ लाए। सान्याल बाबू को इस बात का हार्दिक
दुःख रहा कि देश के नेताओं ने विप्लववादियों के कार्य का उचित मूल्यांकन नहीं
किया। उनका यह आत्म-चरित स्वयं विप्लववादियों और शासनारूढ़ पार्टी के
नेताओं के लिए एक सन्देश है—एक चुनौती है !
विप्लववादियों का इतिहास
विप्लववादियों का यह कर्तव्य है कि बिना किसी की प्रतीक्षा किए अखिल
भारतीय पैमाने पर विप्लववादियों के इतिहास का मसाला संग्रह कर दें और
केवल देशी भाषाओ मे ही नही, अंग्रेजी में भी उसे छपा दें। यह कैसे दुर्भाग्य की
बात है कि हमारे यहाँ कोई भी ऐसा स्थान नही जहाँ यह सब मसाला एकत्र
मिल सके ? सुना है कि पूना में श्री जी० वी० केतकर साहब ने बहुत कुछ मसाला
संग्रह किया है और नागपुर के श्री बाल शास्त्री हरदास ने मराठी और अंग्रेजी मे
एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ इस विषय पर लिखा है। अभी हाल में देवता स्वरूप भाई
परमानन्द के जामाता श्री धर्मवीर ने लाला हरदयालजी का एक खोजपूर्ण जीवन
चरित्र लिखा है और बंगाल .में तो अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं।
दक्षिण भारत के विप्लववादियो का वृतान्त यहाँ उत्तर भारत क पाठकों को
बहुत ही कम मालूम है। अभी उस दिन एक दक्षिण भारतीय ने हमसे कहा—
"क्या आप लोग यह समझ बैठे हैं कि क्रान्ति का सम्पूर्ण कार्य उत्तर भारत में ही
हुआ था?"
उनके इस कथन में व्यंग्य के साथ सत्य का अंश भी था। हम लोग चम्पाकर्मन
पिल्ले और श्री पिंगले को भूल ही गए ! कुछ दिन पूर्व सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी
डा० खानखोजे ने हमसे कहा था, "मुझे इस बात से अत्यन्त दुःख है कि सुप्रसिद्ध
क्रान्तिकारी आचारियर का स्वर्गवास बम्बई में अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में
हुआ। वह अपने कमरे मे कई दिन तक मरे हुए पड़े रहे और जब उनकी लाश से
बदबू निकलने लगी तब लोगों को पता चला कि कोई व्यक्ति मर गया है ! बम्बई
कारपोरेशन के नौकर उन्हें वहाँ से घसीट ले गए और इस प्रकार उस महान
क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का आत्म-चरित / 35-
क्रान्तिकारी का अन्तिम संस्कार हुआ, जो बर्लिन कमेटी में भी था, रूस की भी
जिसने यात्रा की थी और विप्लववादियों के इतिहास के एक अध्याय का जो
निर्माता था ।”
कितने व्यक्तियों को इस बात का पता है कि श्री रासबिहारी बोस ने
जापानी भाषा में सोलह ग्रन्थ लिखे हैं, जिनमें पन्द्रह अब भी उपलब्ध हैं ? हमें
यह बात खेदपूर्वक कहनी पडती है कि हमारे शासकों ने—हम लोगों ने—इस
विषय की ओर यथोचित ध्यान नही दिया। पर अब वक्त आ गया है कि हम
लोग अपनी नीति पर पुनर्विचार कर लें। स्वार्थ की दृष्टि से भी हमारे लिए यह
आवश्यक है कि हम विप्लववादियों के ऋण को स्वीकार करें और उनकी कीर्ति-
रक्षा के लिए प्रयत्न भी करे। ईमानदारी का भी यही तकाज़ा है।
आयरलैंड का उदाहरण अनुकरणीय
आयरलैंड ने अपने शहीदों के लिए जो कुछ किया है क्या उस तरह का कार्य
हम लोग अपने देश मे नही कर सकते ? श्रीयुत चमनलाल पत्रकार ने डबलिन-
स्थित शहीदो के अजायबघर का वृत्तान्त नवम्बर सन् 1939 के 'विप्लव' मे
लिखा था। उनके शब्द सुन लीजिए—"आयरलैंड के राष्ट्रीय वीरो का यह
स्मारक आयरलैंड की पार्लमिण्ट के विशाल भवन मे कायम है। इस अजायबघर
मे मुल्क की आज़ादी की लडाई मे भाग लेनेवाले वीरो और उस युद्ध की घटनाओं
की स्मृतियो का एक बहुत प्रभावशाली सग्रह है। इसमे उन वीरो की आदमकद
मूर्तियां है, वे वर्दियां हैं, जिन्हें पहनकर उन्होने अपनी लड़ाइयाँ लडीं । उनके
हथियार हैं, चिह्न, बैज, झण्डे इत्यादि भी है। उनकी लिखी पुस्तके, उनके
व्याख्यान, ऐलान तथा पत्र इत्यादिः खूब सुरक्षित ढंग से रखे हुए है। आयरलैंड
के स्त्री-पुरुष, वृद्ध और बच्चे वहाँ पहुँचकर और उन स्मृति-चिह्नों को देखकर
राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ते हैं। जिन जनरल राजर्म केसमेट को अंग्रेजो ने फांसी दी
थी, उनके जीवन की सम्पूर्ण गाथा आपको यहाँ देखने को मिलेगी। प्रथम महा-
युद्ध मे उन्होने जर्मनी की सहायता से एक आयरिश सेना तैयार की थी और
जहाज द्वारा वह आ ही रहे थे कि जहाज अंग्रेजो के हाथ पड गया। केसमेट को
फाँसी हुई पर राष्ट्रीय अजायबघर मे वह अब भी जिन्दा है।
‘कीर्तिर्यस्य स जीवति ।’
इस अजायबघर मे आयरलैण्ड के प्रसिद्ध शहीद टेरेंस मॅकस्विनी का भी
चित्र मिलेगा, जिन्होने 74 दिन का अनशन करके अपने प्राण दिए थे। जनरल
माइकेल कोलिन्स की भी मूर्ति विद्यमान है। हैरी बोलैण्ड सुप्रसिद्ध बीर सेनापति
डी० वेलेरा के सेक्रेटरी थे। एक सकट के समय वह अपने जूते के तले मे छिपा
कर एक पत्र डी० वेलेरा के लिए ले गए थे। वह मार डाले गए; पर उनका वह
जूता अब भी सुरक्षित है। इस सग्रहालय मे आपको वीर बालक केवनबेरी का
वृत्तान्त मिलेगा, जिसे फांसी दी गई थी। उसकी उम्र 18 वर्ष की थी। कही
36 / बन्दी जीवन
आपको क्रान्तिकारियों द्वारा प्रकाशित ऐलानों का संग्रह मिलेगा, तो कहीं राष्ट्रीय
हुंडी । कहीं 'माउण्ट जोय' जेल में भूख हड़ताल करने वालों की मूर्तियां खड़ी हैं,
तो कहीं आयरिश शहीदों के चित्र के ऐलबम । और तो और उन शहीदों द्वारा
व्यवहार में लाई जाने वाली चीजें भी संग्रह कर ली गई हैं—यथा उनकी अंगू-
ठियां, प्याले और पेंसिल इत्यादि । जगह-जगह गोलियों से छिदे कपड़े तथा
टोपियाँ रखी हुई हैं ।"
क्या इस प्रकार का कोई सग्रहालय हम लोग दिल्ली में स्थापित नही कर
सकते ? उसके लिए सर्वोत्तम स्थान दिल्ली की सेण्ट्रल जेल थी, जहाँ चार
क्रान्तिकारियो को फाँसी लगी थी, पर अदूरदर्शिता के कारण वह भी नष्ट कर
दी गई ! पर सरकार की प्रतीक्षा में बैठे रहने में हम अपने-आपको पंगु ही बना
लेगे, इसलिए हम लोग जो कुछ स्वय कर सकते है, उसे कर दें ।
—बनारसीदास चतुर्वेदी
प्रथम भाग
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1
आत्म-समर्पण योग
कलकत्ता के राजा बाज़ार मुहल्ले में एक छोटा-सा दोमंजिला खपरैल का
मकान था। ग़रीबों का-सा घर जँचता था। इसमें ट्राम-कंडक्टर या इसी श्रेणी
के लोग रहते थे। इसी मकान के ऊपरवाले एक कमरे में श्री शशांकमोहन हाजरा
नामक एक युवा पुरुष रहते थे। जिस समय वह गिरफ्तार किये गये उस
समय उनके कमरे में बम के ऊपरी खोल मिले और ऐसे लेख भी बरामद हुए
जिनमें योगाभ्यास की विधि थी। अदालत मे मुक़दमा चलते समय किसी ने भी
इन लेखो को महत्त्वपूर्ण नही समझा; कहा गया कि ये लेख असल मे लोगों को
फँसाने के लिए हैं। लोगों को गुमराह करने का यह एक जरिया है। लेकिन मै
जानता हूँ कि असल में बात ऐसी थी नही। हम लोगो ने सचमुच ही अपने
जीवन मे इस साधन (योगाभ्यास) को ग्रहण किया था। हम लोग सिर्फ मुंह से
ही न कहते थे कि भगवान् सभी कामो के नियन्ता हैं, बल्कि सचमुच हृदय से,
गम्भीर श्रद्धा के साथ, इस बात पर हम विश्वास भी करते थे। हम अपनी गरज
के लिए, अपना काम साधने के लिए ही कुछ भगवान् को न घसीटते थे, किन्तु
भगवान् के अधिनायकत्व की आलोचना और भावना में कितने ही दिन और
रात्रियां तक हमने बिताईं।
भारत की छाती पर जो यह महान् आन्दोलन हुआ और हो रहा है, यह
भगवान् की इच्छा से ही हुआ और हो रहा है; यही हम लोगों का विश्वास है।
जिस भाव की अव्यर्थ प्रेरणा से भारत के सैकड़ों नवयुवक मृत्यु को सहर्ष चुनौती
देकर बड़ी-बड़ी कठिन विपत्तियों के मुख मे भी बड़ी आन-बान के साथ कूदे थे,
और जिस प्रेरणा के बल से उन्होंने अपार दुःखों और लांछनों को पक्के संयमी की
भांति सहन किया था, उस भाव के प्लावन को क्या कोई विशेष व्यक्ति उपस्थित
कर सकता है ? या इसका स्थायित्व किसी व्यक्ति विशेष के मत, अथवा जीवन-
मरण पर अवलम्बित है ?
जब मैं निरा बच्चा ही था तभी से मेरे हृदय में स्वदेश का उद्धार करने का
संकल्प जाग्रत रहता था। यह संकल्प मुझे किसी से प्राप्त नहीं हुआ। उस छोटी-
सी ही उम्र में किसने मेरे रोम-रोम में इस संकल्प को भर दिया था ? बचपन से
ही मैं इस विषय की आलोचना अपने छोटे भाइयों से करता आया हूँ। उस समय