बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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बहुत विस्तृत हो गई है। पूर्ण स्वाधीनता भारत को चाहिए ही, क्योंकि उसकी
स्वाधीनता पर सारे संसार का पुनरुद्धार निर्भर है। यह स्वयं एक साध्य नहीं,
प्रत्युत एक उद्देश्य का साधन है, और वह उद्देश्य है साम्राज्यवाद और सैनिक आधि-
पत्य का विनाश और सब लोगों के रहने के लिए एक नवीन संसार की सृष्टि ।
॰॰॰मैं जापान से बहुत प्रेम करता हूँ और अब उस पर श्रद्धा भी रखने लगा हूँ ।
मुझे यह दृढ़ विश्वास हो गया है कि उपयुक्त समय आने पर जापान एशिया की
स्वाधीनता के लिए प्रयत्न करेगा। जब मैं पहले पहल यहाँ आया, जापानियों को
भारत की अवस्था का कुछ भी ज्ञान न था। किन्तु अब मुख्यतः हमारी चेष्टा और
त्याग के कारण प्रत्येक जापानी भारत के घटना-प्रवाह को उत्सुकता से देख रहा
है। मन्त्रिमण्डल के सदस्यों से लेकर वकीलों, पार्लमेंट के मेम्बरों, पत्र-संपादकों
और विद्यार्थियों तक मेरे बहुत-से जापानी मित्र हैं। जापानी भाषा में गांधी और
भारतीय आन्दोलन के विषय में बहुत-सी पुस्तकें पकाशित हुई है, और पत्र-
पत्रिकाओं में भारत पर लगातार लेख निकल रहे हैं। आज यहाँ के बहुत-से
नवयुवक एशिया की स्वाधीनता के कट्टर पक्षपाती हो गए हैं।"
'बन्दी जीवन' के द्वितीय भाग में सान्याल बाबू ने अनेक स्थलों पर बड़ी
विचारपूर्ण बातें लिखी हैं। एक स्थल पर उन्होंने विप्लवियों और उनके समा-
लोचकों में जो फर्क बताया है, उसे पढ़ लीजिए- "विप्लवियो और समालोचकों
में भेद यही है कि विप्लवी लोगों की अपने आदर्श पर अटूट श्रद्धा है, इसीलिए
उन्होंने अद्भुत निष्ठा के साथ अपने आदर्शों की ओर जाने वाले पथ पर
चलते हुए जीवन बिताया है, और इन समालोचक लोगों ने आरामकुर्सी पर बैठ-
कर समालोचना करने को ही जीवन का पेशा बना डाला है और बहुतों के लिए
तो यह समालोचना करना ही जीविका अर्जन करने का मुख्य अवलम्ब हो गया
है ! रोज़ी कमाने के लिए अनेक बातों का हिसाब करके चलना होता है, किन्तु
इस प्रकार हिसाब करके चलने से हमेशा सत्य की मर्यादा को अटूट रखना शायद
सम्भव नही होता। इस सबके अलावा विप्लवियों में और इन सारे समालोचकों
में एक और भी बड़ा भेद है। विप्लवियों के नजदीक जो चीज श्रद्धा है, समा-
लोचकों के लिए वह केवल सम्मति है। वह 'सम्मति' प्रायः सफलता का मोह पार
नही कर सकती, इसीलिए फलाफल पर निर्भर होकर ही बहुधा 'सम्मति' बनती
है। किन्तु जो लोग इतिहास-स्रष्टा के आसन पर बैठते हैं वे इस 'सम्मति' की
परवाह नही करते, वे निष्ठावान् और श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति होते हैं। विफलता
उन्हें श्रद्धाभ्रष्ट नही कर पाती । इसी कारण वे इतिहास में चिरस्मरणीय हो
जाते है इसी से श्रद्धा-सम्पन्न व्यक्ति ही जगत् में कुछ स्थायी काम कर जाने में
समर्थ होते हैं।"
'बन्दी जीवन' के द्वितीय भाग में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण उसका अन्तिम
परिच्छेद है, जिसमें उन्होंने इस प्रश्न पर अपने विचार प्रकट किए हैं कि विप्लव
का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? वह इस परिणाम पर पहुँचे थे कि किसी प्रतिभा-