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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 408 में से

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पृष्ठ 33

क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का आत्म-चरित्र / 31
शासी नेता का अभाव ही इस व्यर्थता का सबसे बड़ा कारण था। श्री अरबिन्द
घोष और लाला हरदयाल के विषय में लिखते हुए उन्होंने कहा है—“यदि वे
लोग अन्त तक इस दल में रहते तो विप्लव दल का यह दैन्य बहुत कुछ दूर हो
जाता, किन्तु वे भी अन्त में इस दल को छोड़ गए। यदि इस प्रकार के चिन्तनशील
प्रतिभाशाली पुरुषों की बात अलग भी रख दें, तो भी इस विप्लव दल में किसी बड़े
साहित्यिक, किसी बड़े समाचारपत्रों के लेखक अथवा किसी बड़े कवि ने भी योग
नहीं दिया। एक तरह से कह सकते हैं कि इस विप्लव दल में इण्टलैक्चुअल्स
(बुद्धिवादी) नहीं थे, इम प्रकार के लोगों का खास तौर पर अभाव था, इसी
कारण वह विप्लव दल प्रचार-कार्य की ओर प्रायः उदासीन ही रहा। जो कुछ
गुप्त पत्रिकाएँ आदि बीच-बीच में प्रचारित होती भी थी, वे केवल सामयिक
उत्तेजनापूर्ण प्रतिहिंसा के उच्छ्वास से भरी होनी थी। इन सब लेखों में विचार-
शीलता का कोई भी परिचय नही पाया जाता था, और न जीवन का कोई नया
आदर्श ही इनमे प्रकट होता था। निस्सन्देह भारतीय साहित्य में इन लेखों का
कोई स्थान नही रहेगा। भारतीय विप्लवी किसी स्थायी साहित्य की सृष्टि नहीं
कर सके। इम प्रकार विप्लव दल का प्रयास व्यर्थ होना ही था।”
जयचन्द्रजी विद्यालंकार ने सान्याल बाबू की इस विचारधारा का विरोध
अपनी भूमिका में किया है। अब भारतीय स्वाधीनता की प्राप्ति के चौदह वर्ष
बाद इस प्रश्न पर गम्भीरतापूर्वक लिखा जा सकता है, पर सबसे बड़े दुर्भाग्य की
बात यह है कि स्वयं विप्लववादियों ने उस दूरदर्शिता का परिचय नही दिया,
जिसका परिचय सान्याल बाबू ने अपना विस्तृत आत्मचरित लिखकर दिया था।
यदि उन सबने अपनी अनुभूतियाँ लिख दी होती तो उनसे उनका उचित मूल्यांकन
करने में किसी इतिहास-लेखक को बड़ी मदद मिलती। पर खेद है कि अभी यह
कार्य अधूरा पड़ा हुआ है। इमका मुख्य कारण शायद यह हो सकता है कि विप्लव-
वादी छिन्न-भिन्न अवस्था मे अलग-अलग पड़े रहे और उनका कोई धनी-धोरी
न रहा। शायद उनमे कोई ऐसा साधन-सम्पन्न भी नही, जो एक बार घूम-घूमकर
अपने साथी-संगियो मे मिल लेता और उनकी अनुभूतियों को लिपिबद्ध करा
लेता। क्रान्तिकारियों की दिल्ली वाली परिषद् मे इस विषय की चर्चा भी हुई
थी, पर मामला आगे बढ़ा नही।
सान्याल बाबू में बड़ी जबरदस्त लगन थी। एक ओर कभी वह पं० मोती-
लालजी से मिलते तो कभी सी० आर० दास से और कभी बैरिस्टर बी० सी०
चटर्जी से और दूसरी ओर कभी वह जयचन्द्रजी को या उग्रजी को या नवीनजी
को अथवा किसी विद्यार्थी को ही अपने दल में लाने की कोशिश करते। उनके
ग्रन्थ के तृतीय भाग मे हमने यह पढ़ा कि उनकी डाक श्री केशवदेवजी मालवीय
के नाम आती थी—श्री महावीर त्यागी मे उनका परिचय था और त्यागीजी ने
ही रामप्रसाद 'बिस्मिल' से उनका परिचय .कराया था। सान्याल बाबू को इस
बात का खेद रहा कि वे नवीनजी को अपने पथ का पथिक नही बना सके।