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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 408 में से

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पृष्ठ 35

क्रान्तिकारी शचीन्द्र सान्याल का आत्म-चरित्र / 33
जिसने भारतीय सभ्यता की कर्म-कथा को भली भाँति नही समझा, उसके लिए
यह संभव नहीं कि कम्यूनिज्म के दोषों को वह ठीक-ठीक समझ सके । इसलिए
भारतीय सभ्यता के प्रति जिसका प्रेम नहीं है, मानव-सभ्यता की उन्नति के लिए
भारतीय सभ्यता की विशेष उपयोगिता है, इस बात पर जिसकी श्रद्धा नही है,
वह इस कार्यक्रम को ठीक-ठीक नहीं समझ सकता ।”
पर शचीन्द्र बाबू बड़े उदार स्वभाव के व्यक्ति थे । वह अपने पुराने साथियों
को अपनी-अपनी अन्तरात्मा के अनुकूल पथ ग्रहण करने के लिए प्रेरित करते थे ।
उनके कितने ही साथी मार्क्सवाद से प्रभावित होकर हृदय से साम्यवादी बन
चुके थे । श्री भगवानदास माहोर ने अपने एक पत्र मे लिखा है—"मैं कुछ दिनों
लखनऊ मे रहा था और तब बड़ी श्रद्धा-भक्ति से मै श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल के
चरणों मे जाकर बैठता था । स्वभावतः देश की राजनीतिक गतिविधि पर ही
बातचीत होती थी । इसके पूर्व आठ-नौ साल जेल मे रहकर मैं जो कुछ थोड़ा-
बहुत अध्ययन कर पाया था उसके फलस्वरूप अन्य सशस्त्र क्रान्तिकारी साथियों
की भाँति मेरा भी विश्वास मार्क्सवाद पर जम गया था । अतः सैद्धान्तिक धरातल
पर न तो श्री सान्याल की बाते ही मैं पूरी तौर पर ग्रहण कर पाता था और न
इतना विद्या-बुद्धिबल ही मुझमे था कि मै अपनी बात ही उन्हें समझा सकता ।
वह अपनी बातें बड़े उत्साह से कहते थे, बहुत बोलते थे, लेकिन दूसरे को भी
बोलने को उत्साहित करते थे और उसकी बात बड़े सब्र मे सुनते थे । जो हार्दिक
प्रेम और वात्सल्य मुझे उनसे मिला वह मेरे लिए तो अमूल्य निधियों मे से है।
उसी समय उन्होने बड़े ही स्वाभाविक और हार्दिक स्नेह से मुझे कहा था—
“तुम्हारा और मन्मथ का स्थान स्वभावतः साम्यवादी पार्टी मे है, तुम इधर-
उधर क्यों भटकते हो ?”
अण्डमन से भारतवर्ष लौटने का जो वृत्तान्त सान्याल बाबू ने लिखा है, वह
बड़ा हृदयस्पर्शी है । वह लिखते हैं—मैं चलकर घर नही आया, बल्कि दौड़ता
हुआ घर पहुँचा। क्या हृदयावेग की आकर्षण शक्ति पृथ्वी की मध्याकर्षण शक्ति
की तरह है, कि अण्डमन से जब चले तब से लेकर घर पहुँचने तक इस आकर्षण
का वेग बढ़ता ही गया और घर के पास आकर आखिर मुझे दौड़ना ही पड़ा !
मकान के नीचे के कमरे का जंगला खुला हुआ था। मैं मुहूर्त-भर जंगले के सामने
आकर खड़ा हो गया । कई एक युवक वहाँ लेटे हुए थे। इनमे मेरे दो भाई
रवीन्द्र और जितेन्द्र भी थे। रवीन्द्र मुझे देखते ही हर्षोत्फुल्ल स्वर से चिल्ला उठे
—“अरे दादा हैं।” रवीन्द्र बिस्तरे से ऐसे उठ पड़े, मानो नीचे से किसी ने ज़ोर
का धक्का देकर उन्हे ऊपर फेंक दिया हो। घूमकर दरवाजे होते हुए अन्दर
आए एव हरएक को छाती से ज़ोर से लिपटा लिया । मेरी यह नई ज़िन्दगी
थी। मेरे नये जन्म का यह आरम्भ था ।
"जिस रोज़ मैं घर पहुँचा उसके पहले दिन ही मेरे कनिष्ठ भ्राता का उप-
नयन संस्कार हो चुका था । घर में किसी को पता न था कि मैं आज यहाँ आकर