बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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पहुँचूँगा। मैंने सबसे पूछा, "माताजी कहाँ हैं?"
माताजी दूसरे मकान में कुछ काम से गई हुई थीं। मैं पूछताछ कर ही रहा
था कि इतने में वह आ गईं। मुझे देखते ही आनन्द के मारे रो पड़ीं और कहने
लगीं—"बेटा मेरे, आ गए हो। मेरे बेटा, आ गए हो।" और मेरे सिर पर, मेरे
कन्धे पर और माथे पर हाथ फेरने लग गईं। फिर कहने लगीं, "जाने कितनी
मुसीबत तुमने झेली।"
सान्याल बाबू के आत्मचरित के कितने ही अंश बड़े हृदयबेधक हैं और कितने
ही बड़े विचारोत्तेजक। खेद है कि स्थानाभाव से हम उन्हें यहाँ नहीं दे सकते।
उन्होंने अपना सर्वस्व भारतीय स्वाधीनता के लिए अर्पित कर दिया यहाँ तक कि
अपनी अत्यन्त प्रिय पुस्तकों को भी अण्डमन में अपने साथियों को भेंट कर आए
और सिर्फ एक बाइबिल अपने साथ लाए। सान्याल बाबू को इस बात का हार्दिक
दुःख रहा कि देश के नेताओं ने विप्लववादियों के कार्य का उचित मूल्यांकन नहीं
किया। उनका यह आत्म-चरित स्वयं विप्लववादियों और शासनारूढ़ पार्टी के
नेताओं के लिए एक सन्देश है—एक चुनौती है !
विप्लववादियों का इतिहास
विप्लववादियों का यह कर्तव्य है कि बिना किसी की प्रतीक्षा किए अखिल
भारतीय पैमाने पर विप्लववादियों के इतिहास का मसाला संग्रह कर दें और
केवल देशी भाषाओ मे ही नही, अंग्रेजी में भी उसे छपा दें। यह कैसे दुर्भाग्य की
बात है कि हमारे यहाँ कोई भी ऐसा स्थान नही जहाँ यह सब मसाला एकत्र
मिल सके ? सुना है कि पूना में श्री जी० वी० केतकर साहब ने बहुत कुछ मसाला
संग्रह किया है और नागपुर के श्री बाल शास्त्री हरदास ने मराठी और अंग्रेजी मे
एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ इस विषय पर लिखा है। अभी हाल में देवता स्वरूप भाई
परमानन्द के जामाता श्री धर्मवीर ने लाला हरदयालजी का एक खोजपूर्ण जीवन
चरित्र लिखा है और बंगाल .में तो अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं।
दक्षिण भारत के विप्लववादियो का वृतान्त यहाँ उत्तर भारत क पाठकों को
बहुत ही कम मालूम है। अभी उस दिन एक दक्षिण भारतीय ने हमसे कहा—
"क्या आप लोग यह समझ बैठे हैं कि क्रान्ति का सम्पूर्ण कार्य उत्तर भारत में ही
हुआ था?"
उनके इस कथन में व्यंग्य के साथ सत्य का अंश भी था। हम लोग चम्पाकर्मन
पिल्ले और श्री पिंगले को भूल ही गए ! कुछ दिन पूर्व सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी
डा० खानखोजे ने हमसे कहा था, "मुझे इस बात से अत्यन्त दुःख है कि सुप्रसिद्ध
क्रान्तिकारी आचारियर का स्वर्गवास बम्बई में अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में
हुआ। वह अपने कमरे मे कई दिन तक मरे हुए पड़े रहे और जब उनकी लाश से
बदबू निकलने लगी तब लोगों को पता चला कि कोई व्यक्ति मर गया है ! बम्बई
कारपोरेशन के नौकर उन्हें वहाँ से घसीट ले गए और इस प्रकार उस महान