सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 34

32 / बन्दी जीवन
श्री दुबलिस से उनका घनिष्ठ सम्बन्ध तो था ही। हमें पता नहीं कि उन साथियों
ने जिनका उल्लेख इस आत्मचरित में आया है, श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल के
स्वर्गवास पर दो आंसू भी बहाए या नहीं। यदि नहीं, तो अब वे उनके संस्मरण
तो लिख ही सकते हैं।
सान्याल बाबू ने पं० जवाहरलाल से जो बातचीत की थी उसे 'बन्दी जीवन'
के तृतीय खण्ड में उद्धृत कर दिया है और वह विवरण निस्संदेह महत्त्वपूर्ण है।
विप्लव का प्रयास असफल क्यों ?
हमारा निजी खयाल है कि विप्लववाद असफल नही हुआ। हां, यह बात
दूसरी है कि हम लोग उस महान् कार्य को, जो विप्लववादियों ने किया था, भूल
गए। त्याग, विचारशीलता और व्यक्तित्व के महत्त्व के खयाल से विप्लववादियों
में कितने ही ऐसे थे, जिनका मुकाबला हमारे अधिकांश शासनारूढ़ महानुभाव
नही कर सकते, बल्कि यों कहना चाहिए कि कुछ अंशों में विप्लववादियों के ही
बलिदान के परिणामस्वरूप ही वे शासनारूढ़ हैं; और कुछ तो अपने को शहीद
आज़ाद आदि का साथी कहने की हिमाकत भी कर बैठते हैं ! यदि भारत का
सच्चा इतिहास कभी लिखा जाएगा तो उसमें विप्लववादियों को आज के नेताओं
से कहीं अधिक ऊँचा स्थान मिलेगा। वर्तमान नेताओं में से अधिकांश के नाम जब
विस्मृति के गर्त में कभी के विलीन हो चुके होंगे, तब चन्द्रशेखर आज़ाद और
भगतसिंह, शचीन्द्र सान्याल और यतीन्द्रनाथ के नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में
लिखे जाएँगे।
इस आत्मचरित के कई अंश बड़े भावपूर्ण हैं। अपनी माताओं के बारे में
उन्होंने बड़े भावपूर्ण ढंग से लिखा है और अपने भाइयों के बारे में बड़े प्रेम के
साथ। श्री सान्याल बाबू को इस बात का खेद था कि देश के अनेक नेता क्रान्ति-
कारियों को देश का शत्रु समझते थे और उनके हृदय में क्रान्तिकारियों के प्रति
बड़ी कटुता भी थी। वह लिखते हैं—"कभी तो ये नेतागण क्रान्तिकारी आन्दो-
लन को इनफेंटाइल अर्थात् बालकोचित कहकर निन्दा करते हैं और कभी क्रान्ति-
कारी आन्दोलन को फैसिस्ट कहकर अपनी जलन को शान्त करते हैं, और कभी
ऐसा भी कह देते हैं कि क्रान्तिकारी लोगों ने देश की प्रगति को पचास साल पीछे
हटा दिया है ! यह भी आक्षेप किया जाता है कि क्रान्तिकारी लोग ज़बरदस्ती,
असहाय, निर्दोष व्यक्तियों को शहीद बना देते हैं ! इस मनोवृत्ति के पीछे शान्त
युक्ति नहीं है और न इसके पीछे कोई ऐतिहासिक प्रेरणा ही है और सर्वोपरि
इसके पीछे देश-हित की कोई कल्याणमयी कामना भी नहीं है। वस्तुतः इस
मनोवृत्ति के पीछे अहंकार का एक उग्र रूप विद्यमान है।"
सान्याल बाबू एक विचारशील व्यक्ति थे। उन्होंने एक जगह लिखा है—
"हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन अथवा हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ के कार्यक्रम
को पूर्ण रूप से समझने के लिए दो बातों को जान लेने की विशेष आवश्यकता है।