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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

196 / बन्दी जीवन

ने जो खुशी मनाई उस सिलसिले में बर्मा के तमाम राजबन्दियों को सरकार ने
छोड़ दिया। दूसरे मामूली कैदियों में से भी पुराने कैदियों को छोड़ दिया। यह
सब देखकर भारत के राजबन्दियों के मन में कुछ नाउम्मीदी अवश्य हो गई थी,
तथापि मेरे मन में सांत्वना बनी रही। आशा की छलना से संसार-भर के मनुष्यों
का निर्वाह होता है। मेरी आशा तो सत्य के आधार पर बनी हुई थी तथापि यह
भी सच है की कभी-कभी निराशा के अंकुर ने मुझे भी चंचल किया था। भागते
हुए पक्षियों की छाया की तरह यह दुर्भावना आई और चली गई। मैं अपने पढ़ने में
लगा रहा। उन दिनों मिल की लिखी हुई 'प्रिंसपल्स ऑफ़ पॉलिटिकल एकॉनमी'
पढ़ रहा था। किताब पढ़ चुका था। इतने में एक दिन करीब तीन बजे शाम को
रायटर का तार छपने के लिए आया। तार की अधूरी भाषा से जाहिर हो रहा
था कि बादशाह ने राजबन्दियों की रिहाई के बारे में कुछ ऐलान किया है। बस,
उस दिन से लिखना-पढ़ना चौपट हो गया। सिवा एक चर्चा के कि कब छूटेंगे,
कौन छूटेगा, क्या होगा, क्या न होगा, और कोई बातें ही न रही। खाते-पीते,
लेटते-जागते हर घड़ी वही चर्चा और वही चिंता। बारीन्द्र दौड़-धूप करके दफ्तर
से 'बंगाली' नाम के अखबार की एक प्रति ले आए, जिसमें बादशाह की घोषणा
छपी हुई थी। वह पढ़कर जैसे आशा का संचार हुआ, वैसे ही दूसरी तरफ इस
दुर्दमनीय सन्देह ने भी हम सबको बेचैन कर दिया कि बादशाह की घोषणा में
यह तो अवश्य था कि ज्यादा-से-ज्यादा राजबन्दियों को छोड़ दिया जाय, लेकिन
इसके साथ यह भी एक वाक्य था कि 'भारत के बड़े लाटसाहब जिस किसी को
भी ऐसा समझें कि उसके छोड़ने से अभी उपद्रव की सम्भावना है, तो उसे वे नहीं
भी छोड़ सकते हैं।' अब हम लोगों में धुकधुकी पैदा हुई। जाने लाटसाहब किसे
क्या समझें। दुःस्वप्न की भयानक छाया की तरह यह विभीषिका हम लोगों के मन
में हर घड़ी बनी रही। हम लोगों में से अब किसी को चैन न रहा। लेकिन मेरी
आशा अब और बलवती हो गई। जब मैं पहले-पहल कालेपानी में आया था और
यहाँ के राजबन्दियों के साथ मैंने अपने अदूर भविष्य में छूटने की भविष्यवाणी के
बारे में बात की थी, तो सबों ने मेरी हँसी उड़ाई थी एवं उपेन्द्र वगैरह ने यह
कहा था कि 'अंग्रेजों की हुकूमत रहते हुए तो तुम छूट नही सकते।' इस पर मैंने
कहा था कि 'यदि मेरे छूटने के लिए अंग्रेजी हुकूमत का अन्त होना आवश्यक है,
तो अंग्रेजी हुकूमत का अन्त अवश्य होगा, क्योंकि मुझे छूटना तो अवश्य है ही।'
अवश्य ही ये सब बातें हँसी-मजाक के तौर पर होती थीं। दिल बहलाने का यह
एक तरीका था। इसी सिलसिले में बारीन्द्र और उपेन्द्र ने उल्लासकर की कही
हुई एक बात सुनाई थी कि अब बड़े कठिन आदमियों से पाले पड़े हैं, ये हमारे हाड़
खाएँगे, मांस खाएँगे, चमड़े से डुगडुगी बजाएँगे। बादशाह का ऐलान होने के
बाद मैंने इन लोगों से कहा, 'कहो अब कैसी रही !' फिर कुछ दिन ऐसे ही बीते।
न कोई छूटा, न छाटा। न लिखने-पढ़ने में मन बहले और न काम करने में ही
दिल लगे। इतने में एक दिन बारीन्द्र ने आकर खबर सुनाई कि चीफ कमिश्नर

रिहाई की सूचना / 197
के पास मेरे भाई का एक तार आया है जिसमे पूछा गया है कि क्या राजबन्दी
शचीन्द्रनाथ छूट गए ? फिर आशा और निराशा के झूले मे हम लोग झूलने लगे ।
फिर कही कुछ नही । शायद इस दर्मियान एक सिख राजबन्दी छूट गया । मैं
अस्पताल मे चला गया । गाखिर अम्पताल मे ही मुझे यह बात बहुवाछित शुभ-
सवाद मिला ।

2
कालेपानी से विदाई
जहाज़ की इन्तज़ारी करते-करते वे बीस दिन भी बीत गए। जहाज़ में चढने
के दिन जितने क़रीब आए, उतने ही एक आनन्द के साथ एक उतनी ही काली
छाया भी मन को घेरे रहती थी। हर घड़ी मेरे मन में यही ख्याल बना रहता
था कि कैसे मैं अपने साथियों को इस संकटपूर्ण स्थान में असहाय अवस्था में छोड़-
कर जाऊँ ! सबसे मैंने यह वादा किया कि देश में पहुँचते ही उन लोगों को छुड़ाने
के लिए मैं भरसक प्रयत्न करूँगा। मानो, मेरे पास यही एक बात थी जिससे मैं
अपने साथियों को सांत्वना दे सकता था।
इस समय भाई परमानन्द एकाएक कोठरी में बन्द कर दिये गए थे। यह
वही परमानन्द है, जो आजकल हिन्दू महासभा के महा कट्टर नेता है। सुनने में
आया था कि पंजाब के अखबारों में परमानन्दजी की धर्मपत्नी ने परमानन्दजी
के बारे में कुछ छपवाया था। इसी कारण से उन्हें कालेपानी में दिन-रात कोठरी
मे बन्द कर दिया गया था। अपने साथियों से मैंने यह भी वादा किया कि भाई
परमानन्दजी के बारे में भी देश वापस लौटकर मैं जो कुछ कर सकूँगा, करूँगा।
एक दिन प्रातःकाल जाने की तैयारी होने लगी। मैंने यह अच्छी तरह से देखा
कि पंजाब के मार्शल-लॉ के अठारह बन्दी एवं वारीन्द्र और हेमचन्द्र तथा उपेन्द्र
खुशी से फूले नही समा रहे थे। मुझे तो अपने आंसू पीकर हट जाना पड़ा। मानो
बादल उमड रहे हो, पानी गिरने ही वाला है। जेल से छूटने पर जो कपडे दिए
जाते है, वे हमे दिये गए। वारीन्द्र ने अपने छूटने की आशा में पहले ही कुछ कपड़े
मँगा लिये थे। उसमे से मुझे उन्होंने एक धोती और एक कोट दिया। मेरा ख्याल
है कि उन्होने मुझे तीन रुपये भी दिए थे। बाकी खर्च तो सरकार का ही था।
छूटते समय भी दो-दो करके हम सब छूटनेवालों को कतार में खड़ा कर दिया
गया। छूटने के दिन भी डिसिप्लिन के साथ फाटक की तरफ चले। जिस दिन मैं
कालेपानी आया था, उस दिन भी मुंह पर हंसी थी, जी में रुआंसा था। आज
छूटने के दिन भी मुंह पर हँसी थी, जी में रुआंसा था। मुझे खूब याद है जिस
दिन सर्वप्रथम मैं कालेपानी पहुँचा उस दिन मेरे मन में क्या भावनाएं थी। एक

कालेपानी से विदाई | 199

तो मुझे दृढ़ विश्वास था कि मैं जल्दी छूट जाऊँगा, इसलिए मेरे दिल में वेदना का
असर ज्यादा न था। दूसरी बात यह थी कि मेरे मन में यह आशा थी कि बारीन्द्र,
उपेन्द्र इत्यादि जो बहुत-से राजबन्दी पहले ही से कालेपानी में हैं, वे अवश्य ही
दूसरे आनेवाले राजबन्दियों के लिए रास्ता साफ़ कर रहे होंगे। इसलिए मुसीबत
को सामने देखते हुए भी उस दिन मन ज्यादा चंचल नहीं हुआ था। लेकिन दो-
चार दिन में ही मेरा यह माया-जाल छिन्न-भिन्न हो गया। जितने दिन बीतते
गए, रुआँस भी बढ़ती गई। आज छूटने के दिन रोने की तबीयत हो रही थी
और हर्ष जी में छिपा हुआ था। जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे ही हर्ष की
मात्रा बढ़ती गई और निरानन्द का भाव लुप्त होता गया। लेकिन छूटने के दिन
सचमुच आँसुओं को रोकना एक मुसीबत हो गई।
फाटक के बाहर आते ही पंजाब के सिख राजबन्दीगण गगनभेदी निनाद से
दस दिशा कम्पित करके 'सत्य श्री अकाल' के नारे लगाने लगे। एक ने कहा—'जो
बोले सो निहाल' और सबों ने प्रत्युत्तर में एक स्वर से कहा—'सत्य श्री अकाल'।
फाटक के अन्दर तक कठिन डिसिप्लिन था। फाटक के बाहर भी एक प्रकार से
जेलखाना ही था। लेकिन जब ये नारे लगने लगे, तो जेलखाने के अधिकारीगण
ताकते ही रह गए। लेकिन जितने जोरों से यह नारे लगने लगे उतने ही तीव्र रूप
से मेरे हृदय को यह आघात लगने लगा कि जेल के अन्दर जितने राजबन्दी इस
घड़ी बन्द हैं और जो कोठरियों में पड़े हुए हैं उनके हृदयों पर इस निनाद का क्या
असर पड़ता होगा ! हर एक नारे के साथ मेरे रोएँ-रोएँ खड़े हो जाते थे। सुबह का
समय था, चारों दिशा मे शान्ति विराज रही थी। दिग्दिगन्त-व्यापी समुद्र फैला
हुआ था और उसके बीच में छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हरे पेड़ और पौधे से भरी हुईं
अपूर्व शोभा दे रही थी। सिख लोगों के लगाये हुए नारे चारों दिशाओं में गूँज रहे
थे। लेकिन क़तार अभी बनी हुई थी और वैसे ही पूर्ववत् हम लोग जोड़े-जोड़े से
खड़े हुए थे। जब कई बार नारे लग गए तो हम लोग आगे बढ़े। नारों की जगह
अब पंजाबी भाषा में गाने होने लगे। उसकी एक कड़ी मुझे आज भी याद है—
'चिड़ियों से मैं बाज लड़ाऊँ, तभी गोविन्दसिंह नाम धराऊँ।' पहले की ही तरह
से दो-तीन आदमी इस गाने की एक कड़ी को शुरू करते; बाद को तमाम
आदमी उसे दुहराते। अब तो मेरी आँखों मे आँसू भर आए। अभी तक एक भावना
दिल मे दबी हुई थी, अब वह उमड़ पडी। अण्डमन में रहते हुए प्रत्येक दिन मैने
जी-जान लड़ाकर यह प्रयत्न किया था कि छूटने के बाद फिर से राजनीति मे काम
करने के लिए अपने को सर्व प्रकार से उपयुक्त बनाऊँगा। जिस दिन मुझे मुक्ति
का संवाद मिला, उस दिन एक क्षण के लिए मेरे दिल मे यह खयाल हुआ कि जिसके
लिए मैंने आज तक तैयारी की है वह समय आज आ गया। क्या मैं अब उस दिन
के लिए तैयार हूँ ? सिखों के ये गाने सुनकर कल्पना के नेत्रों से हम मुगल-जमाने
के दृश्य देखने लगे। गुरु गोविन्दसिंह ने चिड़ियों से बाज को परास्त किया था।
आज इस नवीन युग मे एक नवीन गुरु गोविन्दसिंह की आवश्यकता है। मैंने मन-

200 / बन्दी जीवन
ही-मन यह सोचा कि जो नई ज़िम्मेदारी मेरे सिर पर आ रही है, क्या मैं उसके
लिए तैयार हूँ ? मेरा जीवन तो खतम हो ही गया; इस पुनर्जन्म के बाद से क्या
अपनी ज़िन्दगी पर मेरा व्यक्तिगत अधिकार है ? क्या मेरा जीवन अब समाज के
कामों में ही न्योछावर न होना चाहिए ? इस भावना ने मुझे उस घड़ी उतावला
कर दिया। हम लोग समुद्र के किनारे आ पहुँचे । समुद्र के पानी को स्पर्श करते
ही मैंने ऐसा समझा कि यही पानी मेरी प्रिय मातृभूमि का भी स्पर्श कर रहा
है। उसे स्पर्श करके मानो मैंने मातृभूमि का भी स्पर्श कर लिया। मैंने ऐसी
कल्पना की कि मानो इस समुद्र का पानी आँचल की तरह बिछा हुआ है। उसका
एक छोर भारतवर्ष को और दूसरा छोर मुझे स्पर्श कर रहा है। नाव पर सवार
होकर कुछ दूर जाने के बाद जहाज़ मिला। वारीन्द्र वगैरह के कुछ पुराने मिलने-
वाले केला आदि फल-मूल भेंट करने के लिए ले आए थे ।
जब कालेपानी आए थे, तो जहाज़ में जिस जगह माल इत्यादि लादा जाता
है, उसी सबसे नीचे की तह में हम मनुष्यों को बे-जानदार वस्तुओं की तरह लादा
गया था; तिस पर भी पैरों में बेड़ियाँ भी पड़ी थी और संगीन लिये हुए
सिपाहियो का पहरा था। आज मुक्ति के दिन ऐसा नही हुआ। हम लोग जाकर
डेक पर बैठे। पैरों में बेड़ियाँ न थी, न कोई पहरे का इन्तजाम। अब मालूम होने
लगा कि हम लोग सचमुच छूट रहे है। दिल में आया, क्या इधर-उधर जा सकते
हैं, घूम-घामकर कुछ देख सकते हैं ? तो देखा कि कोई मना करनेवाला नही है।
स्वाधीनता पाने की यह प्रथम अनुभूति थी। जहाज़ में इधर-उधर जाकर मैं घूमने
लगा। इधर देखा, उधर देखा, कहाँ पर कैसे आदमी सवार हैं, इंजिन किधर है,
खाना पकाने की जगह कहाँ है और कहाँ स्नानागार और शौचागार है। आनन्द
की मात्रा बढ़ने लगी और सोचा, अब छूट गए। अब खाने-पीने की फिक्र हुई।
हिन्दुओं के लिए खाने का कोई इन्तज़ाम न था। या तो चना-चबेना चबाकर रहो
या जहाज़ के मुसलमान खलासियों के हाथ का पका हुआ भोजन खाओ। वारीन्द्र
घूम-घामकर जहाज़ के स्टुअर्ड के साथ खाने-पीने का कुछ बन्दोबस्त कर आए।
इस इन्तजाम मे हम चार आदमी शामिल थे—वारीन्द्र, उपेन्द्र, हेमचन्द्र और मै।
यहाँ पर यह बतला देना आवश्यक है कि खाने-पीने की छुआछूत में हम लोगों ने
कभी भी कोई परहेज नहीं किया। हाँ, अवश्य ही गो-मांस आज तक नही खाया।
लेकिन जब विचार करने बैठते हैं तो कबूतर के मांस मे और बछड़े के मांस में क्या
अन्तर होगा, यह समझ में नहीं आता। यह तो समझ में आता है कि नीति की
दृष्टि से किसी भी प्रकार के मांस का खाना अनुचित है, अन्याय है, अशोभन है और
सम्भव है कि बहुत-से अवसरों पर हानिकारक भी है। लोभ के वश में आकर
आजन्म के अभ्यास के कारण एवं संग-सोहबत की वजह से अक्सर मांस खा लेता
हूँ। ओर कभी-कभी दूसरे प्रकार के संग-सोहबत के कारण मैंने कई दफ़ा मांस
खाना छोड़ भी दिया और फिर शुरु भी कर दिया।
जब कालेपानी को आए थे तो बरसात का मौसम था। चार दिन और तीन

कालेपानी से विदाई / 201

रात जहाज़ में रहना पड़ा था। अब वापस जाने के वक़्त भी चार दिन और तीन
रात जहाज़ पर रहना पड़ा। आकाश साफ़ था। नभ-मण्डल में कोई चंचलता न
थी। जहाँ तक मुझे याद है पंजाब के मार्शल-लॉ के क़ैदियों को हम लोगों से अलग
रखा गया था और सम्भवतः उनके पैरों में बेड़ियाँ भी थीं और शायद उनसे यह
भी कहा गया था कि पंजाब में ले जाए जाकर ही वे लोग छोड़े जाएँगे। लेकिन
मुझे ये सब बातें अब ठीक याद नहीं हैं। सम्भव है, मैं कुछ ग़लती कर रहा होऊँ।
यह ठीक याद है कि हम चार आदमी एक तरफ़ थे और मार्शल-लॉ के क़ैदी दूसरी
तरफ़ थे। हम लोगों की रिहाई के सर्टिफिकेटों में चाल-चलन के कॉलम में 'फेयर'
लिखा हुआ था, यानी न ज्यादा अच्छा और न ज्यादा खराब । और रिहाई के
कारण के कॉलम में यह लिखा था कि 'बादशाह के ऐलान के सिलसिले में रिहा
किए जा रहे हैं।' एक और लक्ष्य करने की बात यह थी कि रिहाई के सिलसिले में
यह लिखा था, 'कारसपांडेन्स एण्डिंग इन ए टेलीग्राम' अर्थात् चिट्ठी-पत्र व्यवहार
के बाद आखिर में तार आया तब छूटे। मेरे जीवन की यह एक ख़ूबी है कि आज
तक जीवन-भर मेरा कोई काम निर्विघ्न रूप से सहज सरल तरीके से कभी भी
नही हुआ। मुझे हमेशा कठिन-से-कठिन बाधाओं का सामना करना पड़ा है।
छूटते वक़्त भी आखिरकार तार आया तब छूटे। आखिर शादी के सिलसिले में
भी मुझे कोसों पैदल चलना पड़ा, तब जाकर कहीं लडकी को देखना नसीब हुआ।
इसी तरह से इस जीते-जी पुनर्जन्म के बाद फिर जब मैंने यात्रा प्रारम्भ की तो
पग-पग पर मुझे कठिन बाधाओं का सामना करना पड़ा।
अंग्रेजों के बच्चों को मैंने जहाज़ पर इधर-उधर निस्संकोच घूमते हुए देखा।
जहाज़ के बिलकुल एक किनारे से ऊपर के डेक से नीचे की डेक में जाने की एक
सीढ़ी थी। थोड़ी-सी ही असावधानी के कारण बच्चे इस सीढ़ी से गिरकर अथाह
समुद्र मे जा गिर सकते थे, लेकिन निस्संकोच ये बच्चे नीचे से ऊपर और ऊपर से
नीचे आया-जाया करते थे, कूदा-फाँदा करते थे। इनकी देखभाल के लिए कोई
साथ न रहता था। इस दृश्य ने मेरे मन पर अपनी गम्भीर छाप लगा दी। मैं
हैरान रह गया कि कैसे इनके माँ-बाप निश्चिन्त होकर चैन से अलग बैठे होंगे।
क्या हम भारतवासी इस प्रकार ऐसे अवसर पर बेफ़िक्र बैठे रह सकते हैं ? मैं अपने
को काफ़ी हिम्मत वाला समझता हूँ, लेकिन मेरे लिए आज भी ऐसा सम्भव नही
है। एक और भी दृश्य आज भी मुझे याद है। मैं उस वक़्त छात्र था। बनारस के
क्वीन्स कॉलेज में पढता था। करीब तीन-चार बजे शाम को कॉलेज के प्रांगण मे
होताहुआ कही जा रहाथा। सामने देखा कि कॉलेज के प्रिंसिपल मिन्सेण्ट साहब एक
प्रोफ़ेसर के साथ जा रहे हैं। प्रिंसिपल साहब का एक शिशु-सन्तान ज़मीन पर खेल
रहा था। पास ही आया बैठी थी। वह शिशु पेड़ पर चढ़ने को गया। आया ने
रोका तो प्रिंसिपल साहब ने आया को समझाया कि बच्चों को उनकी गतिविधि में
कभी रोका न करो। पेड़ पर चढ़ना चाहता है, तो चढ़ने दो। तुम देखती रहो कि
वह गिर न पड़े।

202 / बन्दी जीवन
जिनके साथ मुझे चार दिन तीन रात हर घड़ी एक साथ रहना पड़ा, उनकी
मनोवृत्ति एवं मानसिक झुकाव के साथ मेरा कोई ऐक्य न था। सम्भवतः
हमारे हरएक की दुनिया अलग-अलग थी। हम अपनी दुनिया में विचरण कर
रहे थे, वे किसी और दुनिया में विचरण कर रहे होंगे। आपस में मौखिक बात-
चीत तो होती रही, हँसते भी थे लेकिन एक-दूसरे के हृदय को स्पर्श नहीं कर पा
रहे थे। यह अनैक्य की बात एक-दूसरे से छिपी हुई न थी; मानो हरएक के
दिल के सामने एक पर्दा पड़ा हुआ था और उसी पर्दे की आड़ में रहकर हम लोग
एक-दूसरे से बातचीत कर रहे थे।
ऐसी परिस्थिति से ऊबकर मैं कभी-कभी सिख भाइयों के पास जाता था।
लेकिन वहाँ भी दिल को तसल्ली नहीं मिलती थी; क्योंकि हम लोगों का मानसिक
विकास विभिन्न मार्ग से अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार विभिन्न ध्येय को लेते
हुए हुआ है। इतने आदमियों के साथ रहते हुए भी मैं यह अनुभव करता था
कि मैं कितना अकेला हूँ। क्या करता, मजबूरी थी। पाठक यह महसूस कर सकते
हैं कि मैं इस आनन्द के दिन कितना निरानन्द रहा !
इसी जहाज़ पर अण्डमन टापू के अंग्रेज़ डिप्टी-कमिश्नर एवं कई एक बंगाली
मैडीकल ऑफिसर हिन्दुस्तान वापस लौट रहे थे। वारीन्द्र वगैरह से इन लोगों
का परिचय था। इन लोगों से मिलने के बाद एक दफ़े वारीन्द्र हम लोगों के पास
आकर कहने लगे कि हिन्दुस्तान की हालत बहुत नाजुक है। अब यह नहीं पता
चलता कि कौन मित्र है और कौन शत्रु। स्कूल के हेड-मास्टर, टीचर, डॉक्टर और
छात्र इनमें सब खुफ़िया पुलिस के आदमी भरे पड़े हैं। पड़ोस में जो रहते हैं उनमें
कौन खुफ़िया पुलिस के हैं और कौन नहीं, यह कहना बहुत मुश्किल है। दूसरे मौके
पर डिप्टी-कमिश्नर लुइस साहब से मिलकर लौटने के बाद वारीन्द्र यह कहने लगे :
'भई, लुइस साहब बड़े भलेमानस हैं। उनसे बहुत देर तक बातचीत की। सुख-
दुःख की बातें पूछीं। कहाँ रहेंगे इत्यादि बातें होते-होते उल्लासकर की बात आई।
लुइस साहब ने अकपट हृदय से यह कहा कि 'उल्लासकर का मन बड़े ऊँचे स्वर
से बँधा हुआ था। इसी प्रकार से सिख राजबन्दियों के बारे में बातचीत हुई।
सिखों के साहस एवं उनकी विरोधी पक्ष के सामने खड़े होने की शक्ति की बहुत
प्रशंसा की।' ऐसा कहते हुए वारीन्द्र ने इस शुभ मुहूर्त्त में यह स्वीकार किया कि
जो राजबदीगण जेल-अधिकारियों के विरोध में सिर ऊँचा रखते हुए आत्म-सम्मान
के लिए हमेशा लड़ा करते थे, वे यथार्थ में वीर थे और सराहनीय थे। उनके
मुकाबले में वारीन्द्र ने अपनी कमजोरी स्वीकार की।
यहाँ पर उल्लासकर का कुछ परिचय दे देना आवश्यक है। इनके पिता
शिवपुर में इंजीनियंरिंग कॉलेज के प्रोफ़ेसर थे। वारीन्द्र वगैरह के दल में शामिल
होने के पहले ही उल्लासकर ने अपने घर में ही एक रसायनागार बना लिया था
और वहाँपर वह विस्फोटक पदार्थ के विषयों में परीक्षण किया करते थे। उल्लास-
कर बड़े विचारशील और आध्यात्मिक प्रकृति के मनुष्य थे। वारीन्द्र का दल

कालेपानी से विदाई / 203
इनके दल में शामिल होने से बहुत पुष्ट हो गया था। मुक़दमे के दौरान में बयान
देते समय उल्लासकर ने यह कहकर गौरव अनुभव किया था कि 'अमुक बम ने
अमुक स्थान पर जो भैरव-लीला दिखाई थी, वह मेरे ही हाथ का बना हुआ था।'
एक अदालत के कमरे में एक राष्ट्रीय संगीत गाकर उल्लासकर ने सबको मुग्ध
कर दिया था। प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता स्व० विपिनचन्द्र की एक कन्या के साथ
उनका प्रणय हो गया था और विवाह की बात स्थिर हो चुकी थी, परन्तु इस
बीच में अलीपुर षड्यन्त्र के मामले में उल्लासकर गिरफ़्तार हो गए और उन्हें
सज़ा हो गई। विपिनपाल की लड़की ने आज तक शादी नहीं की। जब तक
उल्लासकर जेल में थे तब तक तो कोई बात ही नहीं थी। जेल में उल्लासकर का
मस्तिष्क विकृत हो गया है, यह जानकर तब उसने शादी न करना ही उचित
समझा। जहाँ तक मुझे मालूम है, उस लड़की ने फिर शादी नहीं की।
अण्डमन के जेल में रहते हुए उल्लासकर एक दिन कहने लगे कि आखिर
क्यों मैं जेल की मशक्कत करूँ। एक बागी के लिए जेल में भी बगावत का रास्ता
अख्तियार करना ही मुनासिब और इज्जत का रास्ता है। इस तरह से जेल में
कई बार क़ानून तोड़कर उल्लासकर ने तरह-तरह की सजायें पाईं। एक दफ़े
जेल के बाहर कड़ी धूप में ईंट की भट्ठी में काम करते समय पहले की तरह काम
करने से इनकार कर दिया। उल्लासकर और उनके कुछ साथियों को जेल में ले
आया गया और तनहा कोठरी में दीवाल में लगे हुए लोहे के छल्ले से हथकड़ी में
बाँधकर इन्हें खड़ा कर दिया गया। इसे जेल मे खड़ी हथकड़ी कहा करते हैं। क़ानूनन
यह एक दिन में आठ घण्टे तक ही लगाई जाती है एवं लगातार सात दिन से
अधिक ऐसी खड़ी हथकड़ी लगाने का हुक्म नही है। लेकिन जेल के अधिकारी-
गण जब किसी क़ैदी को सताना चाहते है तो इन सब क़ानूनों की पाबन्दी नही
की जाती। दफ़्तर के कागज़ात मे कार्रवाई क़ानून के हिसाब से सही तौर से
रखी जाती है, लेकिन अमल में कुछ और ही होता है। अगर कोई क़ैदी अदालत
के सामने यह सब बातें साबित करना चाहे तो यह गैरमुमकिन-सी बात है,
क्योकि जेल के अधिकारियो के खिलाफ कोई गवाह नही मिल सकता। खैर, जो
कुछ हो, उल्लासकर को खड़ी हथकड़ी की हालत मे ही एक सौ तीन या एक सौ
चार डिग्री बुखार आ गया। फिर भी वे खड़ी हथकड़ी मे ही रखे गए। इस
हालत मे वे बेहोश हो गये। बेहोशी की हालत मे वे अस्पताल भेजे गए एवं जब
उन्हें होश आया तो देखा गया कि वे पागल हो गए हैं। यही उल्लासकर कहा
करते थे कि भाई अब ऐसे आदमियो के पाले पड़े हैं कि ये हाड खाएँगे, मांस
खाएँगे, चमड़ी से डुगडुगी बजाएँगे। अण्डमन के डिप्टी-कमिश्नर लुइस साहब
उल्लासकर के विषय में बहुत ऊँचे खयाल रखते थे।
जब वारीन्द्र ने आकर लुइस साहब की बातें सुनाई और इस सिलसिले में
उल्लासकर का जिक्र आया तो मुझे उल्लासकर के बारे मे ऊपर लिखी बातें
मालूम हुईं। ये सब बातें सुनकर पिछले दिनों के वे नज़ारे आँखों के सामने घूमने

204 / बन्दी जीवन
लगे और मैं सहम-सा गया। उस समय के इतने अत्याचारों की रोमांचकारी
कहानी मैंने सुनी जिसे यहाँ पर लिखने की हिम्मत मुझमें नहीं है, क्योंकि अदालत
के सामने इन सब बातों का सबूत मैं नहीं दे सकता।
जब मैं कालेपानी आया था तो प्रकृति विरूप थी। अगस्त का महीना था।
आँधी-पानी और बादल का गरजना, जहाज़ के नीचे की तह में बैठे-बैठे ऐसा
मालूम हो रहा था, मानो एक प्रलयकारी बाढ़ में दुनिया डूब रही है। अब
लौटते वक़्त प्रकृति शान्त थी, मानो हम सबके छूटने से चारों दिशाओं में
प्रफुल्लता छा रही हो। रात में तयहुआ कि प्रातःकाल यह देखना है कि समुद्र के
बीच से सूर्योदय कैसे होता है ! सोते-सोते जब पहले आँख खुली तो देखा कि
चारों दिशा में उषा की लाली स्मित ज्योति से उद्भासित हो रही थी। मैं उठ
खड़ा हुआ। समझा कि वक़्त आ गया है, सूर्योदय अब होने ही वाला है। देखा
कि हेमचन्द्र भी उठ बैठे हैं। मैंने औरों को भी जगाना चाहा, लेकिन हेमचन्द्र ने
कहा, अभी थोड़ा और देख लें कि सूर्योदय में कितनी देर है। हम दोनों डेक के
किनारे आकर खड़े हो गए। रेलिंग को पकड़कर क्षितिज की ओर टकटकी
लगाये ताकते रहे। नीचे समुद्र का पानी उच्छलित हो रहा था। हम लोगों में से
किसी के पास घड़ी तो थी ही नहीं। पता नहीं चल रहा था कि वक़्त कितना
हुआ। खड़े-खड़े हम लोग थक गए, लेकिन उषा के प्रकाश में कुछ अन्तर नहीं
हुआ। अब भी हमारे साथियों में से कोई जगा न था। मैं और हेमचन्द्र जहाज़
में इधर-उधर घूमने लगे ताकि किसी सूरत से पता चले कि वक़्त क्या है। शायद
स्टुअर्ड के पास से पता चला कि अभी तो तीन ही बजा है। दिल में आया अभी
थोड़ा और लेटे रहें, लेकिन हेमचन्द्र ने मुझे रोक लिया और दोनों डेक चेयर में
या शायद किसी और चीज़ पर बैठ गए। तीन बजे से क़रीब साढ़े पाँच बजे
तक यों ही बैठे रहे। आश्चर्य की बात तो यह थी कि समुद्र में उषा की स्थिति
तीन-तीन घण्टे तक क़रीब-क़रीब एक-सी रही। साढ़े चार या पाँच बजे से
मेरे दूसरे साथी भी पास आ गए। चारों दिशाओं में तो उजाला छा गया, लेकिन
जिस केन्द्र से चारों दिशा में यह ज्योति विकीर्ण हो रही थी उसका अभी भी कोई
पता न था। हम सब अस्थिर हो गए। केवल हर घड़ी यही सोचते रहे जाने
समुद्र में सूर्योदय कैसा होता है। यह इन्तज़ारी अब बुरी लगने लगी। लेकिन
जिस दृश्य को देखने के लिए घण्टो से बैठे है अब उस दृश्य को बिना देखे
जायें कैसे ? एकाएक सबका मन चंचल हो उठा और हाथ फैलाकर सबों ने
इशारा किया कि वह सूर्योदय का प्रारम्भ हुआ। सबों ने देखा एक ज्योतिपुंज
समुद्र से धीरे-धीरे उग रहा है। चारों दिशा में अथाह पानी और पानी। अनन्त
का आभास कुछ मिलने लगा। एक तरफ सूर्योदय हो रहा है दूसरी तरफ अनन्त
मानव मूर्त होकर दर्शनीय हो रहा है। मानो शान्त और अनन्त का मिलन हो
रहा हो। मस्तक के ऊपर अनन्त आकाश, नीचे अनन्त घटा के बीच एक हमारा
ही जहाज़ इच्छापूर्वक एक विशेष दिशा की तरफ असाध्य साधन करने की भाँति

कालेपानी से विदाई | 205

इस अनन्त दिशा को पार करने की अदम्य चेष्टा कर रहा है और दूसरी तरफ ज्योति-
पुंज की गति से भी यह प्रतीत होता था कि अनन्त के साथ शान्त का मिलन है।
और हम नितान्त दिशाहीन होकर भटक नहीं रहे हैं।
सूर्य का उदय अब प्रत्यक्ष हो रहा था। अर्धगोलाकार ज्योतिपुंज समुद्र के
ऊपर दिखाई दे रहा है। लेकित स्थल देश में सूर्यास्त के समय जैसे मनोहर रूप
में अवर्णनीय लालित्य के साथ सूर्य दिखाई देता है, समुद्र के बीच सूर्योदय के
समय वह लालित्य न था। उस दिन आकाश में एकदम मेघ न थे। सम्भव है,
इसीलिए सूर्य की किरणों से कोई रंग बिखर नहीं रहा था। समुद्र के बीच सूर्यो-
दय के समय एकमात्र विचित्र बात हम लोगों ने यह देखी थी कि अचानक वह
ज्योतिर्पिंड जो अभी तक वृत्ताकार पानी के ऊपर दिखाई दे रहा था, मानो
एकाएक पानी से कूदकर अलग हो गया और आकाश में सूर्य के रूप में दिखाई
देने लगा। इस विचित्र कूदने को छोड़कर समुद्र में सूर्योदय के वक्त और कोई
ऑब्जैक्टिव ब्यूटी हम लोगों ने नहीं दिख पाई। कुछ ने तो कहा कि यही समुद्र
में सूर्योदय की ब्यूटी है। वृथा तीन घंटे बरबाद हुए।
हम सब अपनी जगह पर चले आए और हँसी-दिल्लगी में वक्त बिताने लगे।
खाने-पीने की कोई खास चीज तो मिलने को थी नहीं और न पल्ले पैसा ही था।
आकाश की तरफ या क्षितिज की तरफ देखने से यह पता नहीं चलता था
कि हमारा जहाज़ किसी तरफ अग्रसर हो रहा है या नहीं। लेकिन नीचे पानी
की तरफ देखने से प्रतीत होता था कि किसी अज्ञात दिशा की तरफ हमारा
जहाज़ आगे बढ़ रहा है। अनन्त समुद्र में एकमात्र अपने ही जहाज़ को पानी के
ऊपर तैरते देखकर जैसे एक ओर अनन्त का अर्थ अनुभव करते थे, वैसे ही दूसरी
ओर मेरे मन मे एक असहायता की भावना एक प्रकार की अव्यक्त आशंका की
सृष्टि करती थी। मै जहाज़ के पीछे की तरफ चला गया। उस निर्जन स्थान में
अकेले खड़े होकर मैं देखता था कि कैसे हमारा जहाज़ अथाह समुद्र पर तुच्छ-
सा विक्षोभ पैदा करके समुद्र पर पानी का रास्ता बनाता चला जा रहा है। मन
में आया कि यदि हम गिर जाएँ तो क्या कोई सहायता हमें मिल सकती है !
थोड़ी देर में फिर वही बात याद आई कि मेरा जीवन तो समाप्त हो चुका था,
मेरी इस नई जिन्दगी पर मेरा क्या अधिकार है ? दिवा-स्वप्न देखने लगा। क्या
फिर देश-सेवा के कार्य मे निर्भीकता के साथ अपने जीवन को लगा पाऊँगा ?
मुझे याद आया कि मेरी माता विधवा है और मैं आज तक किसी भी प्रकार से
जननी को लौकिक दृष्टि से सुखी नहीं कर पाया। क्या अब लौटकर अपनी माता
के लिए कुछ कर पाऊँगा ? अब तो माताजी शादी के लिए अवश्य कहेंगी। शादी
मैं अवश्य करूँगा, लेकिन शादी करने के बाद क्या मैं फिर त्याग के रास्ते को ग्रहण
कर सकूँगा ? इन्ही सब भावनाओ मे मैं तल्लीन था। जब मैंने एकाएक सिर
उठाया तो देखा कि हेमचन्द्र मेरे पास खड़े हुए हैं। उनके आग्रह करने से मैंने
अपने मन की सब बातें बताईं।

हेमचन्द्र कानूनगो एक अति भद्रेश सज्जन थे। जब जेल में आए होंगे तब
वह अवश्य जवान रहे होंगे। लेकिन जिस दिन मैंने प्रथम बार अण्डमन की जेल
में क़दम रखा था उस दिन जब मैने दूर से हेमचन्द्र को एक स्टूल पर बैठे देखा
उस दिन का दृश्य मैं कभी नहीं भूल सकता। दाढ़ी के बाल आधे से ज्यादा सफ़ेद
हो गए हैं, छाती तक बाल लटक रहे हैं, आंख में चश्मा है और रंग गंदुमी। मैं
यह सोचने लगा कि भारत के स्वाधीनता संग्राम में इन सज्जन ने अपने बाल
सफेद कर लिये, सालों से जेल में पड़े हुए हैं, मुखमंडल चिन्तनशील गम्भीरता-
मंडित दिखाई दे रहा है, एकाग्र चित्त से कोई किताब पढ़ रहे हैं।
कालेपानी में आकर एक नवीन युवक दत्तचित्त होकर उन्हें इस तरह से
टकटकी लगाकर देख रहा है, हेमचन्द्र को इस बात की कोई ख़बर नही। अपने
देश से सहस्रों मील की दूरी पर समुद्र-परिवेष्टित एक छोटे-से टापू के कारागार
में एक प्रौढ़ के साथ एक नौजवान का इस परिस्थिति मे मिलना आज भी मुझे
याद है। ये वही हेमचन्द्र हैं जो अपनी जायदाद बेचकर फ्रांस चले गये थे बम
इत्यादि बनाना सीखने के लिए। जिस समय हेमचन्द्र इस वैप्लविक मनोवृत्ति
को लेकर फ्रांस गए थे उस समय भारत के राष्ट्रीय क्षेत्र में किसी नेता ने भी
यह कल्पना नहीं कर पाई थी कि भारत के नौजवानों में देश को स्वाधीन करने
की इतनी प्रबल आग्रहपूर्ण क्रांतिकारी भावनाएं तीव्र रूप से फैल रही हैं।
आज वही हेमचन्द्र बारह साल जेल-जीवन व्यतीत करने के बाद घर वापस
जा रहे हैं। घर में उनके स्त्री है एवं एक पुत्र। बारह साल मे अण्डमन मे उन्होने
जितनी पुस्तकें एकत्रित की थी अपने पुत्र के लिए आज वे सब पुस्तकें अपने साथ
लिये जा रहे हैं। जो युवक काले पानी मे कदम रखते ही उनको देखकर दंग रह
गया था, आज मुक्ति पाने के दिन जहाज़ मे वे उसके ही पास आकर मित्र की
तरह खडे हुए हैं और भविष्य की आशा और आकाक्षाओं की बातें पूछ रहे है।
दिन यो ही बीत गया। आज जहाज़ पर आखिरी रात थी। हम सब
मातृभूमि के क़रीब आ गए हैं। बहुवांछित तटभूमि अभी दिखलाई नही दी है।
सम्भव है, कल दिखलाई दे। जहाज़ मे बिजली की बत्तियां काफ़ी जल रही थी।
चारों दिशाओ में अंधकार छा रहा था। आकाश मे नक्षत्र चमक रहे थे। क्षितिज
स्पष्ट रूप से दिखाई नही दे रहा था। अनन्त गगन-मण्डल अतल समुद्र मे समा
गया था। या यों कहिए कि सीमाहीन समुद्र असीम गगन मे समा गया था। इस
असीमता के बीच में जल के बुदबुदों की तरह हमारा जहाज़ समुद्र की लहरों के
ऊपर भासमान था। तारो की वजह से अधकार समुद्र के बीच भयानक मालूम हो
रहा था। मैं डेक पर रेलिग के किनारे खड़ा था। नीचे समुद्र की लहरें उमड रही
थी। अगर जहाज़ पर बिजली की बत्तियां न होती तो नीचेकी लहरें बिलकुल न
दिखाई देती लेकिन बिजली की बत्तियो की रोशनी के कारण नीचे लहरों का
भीषण रूप मैंने देखा। यह दृश्य भी भूलना सम्भव नही। भयानां भय भीषणं
भीषणानाम् इस श्लोक की पंक्तियां सुनी ही थी। अब यह दृश्य आँखों देखने

कालेपानी से विदाई / 207
का अवसर आया। छोटी-सी बत्ती के सहारे गहन अंधकार ने मानो आँखों के
सामने रूप ग्रहण किया हो। अंधकार का भी रूप होता है, यह पहले-पहल ही
अनुभव किया। लहरें उमड़ रही हैं, लेकिन वह पानी नहीं मालूम हो रहा है।
यदि हम अचानक पानी में गिर पड़ें तो किस अनिर्देश्य अज्ञात कराल लोक में
जा पहुँचेंगे इसका कोई ठीक-ठिकाना नहीं है। काल की कराल छाया मानो उन
लहरों के रूप में उमड़ रही है। अंधकार को भी देखा जा सकता है। जिन्होंने
देखा है वे ही स्वीकार कर सकते हैं, दूसरे नहीं।
सम्भव है रात को किसी समय पाइलट हमारे जहाज में सवार हो गया हो।
प्रातःकाल सुदूर में एक रेखा की तरह स्वदेश भूमि को देख पाता था, ऐसा मुझे
ख्याल है। नदी और समुद्र के संगम-स्थल को किस समय मैंने पार किया था,
यह मुझे ठीक याद नहीं। अभी भी समुद्र था या नदी आ गई थी, मैं इसको भी
ठीक नहीं कह सकता था।
चौथे दिन समुद्री पक्षियों को समुद्र में मछली का शिकार करते हुए देखा।
एकाध बार मछलियों को भी थोड़ी दूर तक उड़ते हुए देखा था। ये समुद्री पक्षी
जिन्हें अंग्रेजी में सीराल्जं कहते हैं, अण्डमन टापू से दो सौ मील की दूरी तक
दिखाई दिए, और इधर भी भारत की तटभूमि से सौ मील की दूरी पर दिखाई
दिए होंगे। अब मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है लेकिन जहाँ तक मैं स्मरण कर सकता
हूँ, ये समुद्री पक्षी बीच समुद्र में नहीं दिखाई दिए थे। यूरोपियन पुरुष और
स्त्रियाँ इन पक्षियों के खाने के लिए कुछ फेंक दिया करते थे। समुद्री पक्षी इसलिए
जहाज के आस-पास खूब उड़ा करते थे। इन साहबों की बदौलत इन पक्षियों
की लीलाएं देखकर हम भी आनन्द-उपभोग करते थे।
हेमचन्द्र ने कहा कि हम लोग रात में गंगासागर संगम पार कर चुके हैं।
प्रातःकाल में भी बहुत दूर पर जो क्षीण रेखा दिखाई दे रही थी, इसमें सन्देह
है कि यथार्थ में वह रेखा तटभूमि की द्योतक थी या नहीं। हम लोगों में
बात छिड़ी कि जाने कितने दिनों में हममें जहाज चलाने वाले आदमी पाइलट
इत्यादि पैदा होंगे। जितना दिन चढ़ता गया उतनी ही तटभूमि की रेखा निकट-
वर्ती होती गई। वह दृश्य बड़ा मनोहर था। अब स्पष्ट रूप से तटभूमि दिखलाई
देने लगी थी, लेकिन इधर पानी का प्रसार समुद्रवत् ही था। एक तरफ जल
का अनन्त प्रसार, दूसरी तरफ तटभूमि का इंगित; यह सान्त और अनन्त का
सम्मेलन बहुत ही हृदयग्राही होता है। केवल अनन्त से हमारा काम नहीं चलता
और न केवल सान्त से ही हम तुष्ट रह सकते हैं। अनन्त समुद्र में भी आसमान
व जहाज मेरे साथी थे; जहाज के निवासी भी साथी थे, सम्भव है इसलिए वहाँ
पर सान्त और अनन्त का मिलन रहा। लेकिन निरे अनन्त में जी घबरा जाता
है। सम्भव है मुझमें अभी भी वासनाएं प्रबल हैं इसलिए अभी केवल अनन्त से
जी घबराता है। एक दफा श्री रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानन्द को कुछ
अनुभव कराया था। स्वामी विवेकानन्द घबराकर कहने लगे, "अभी मेरे माता-

208 / बन्दी जीवन
पिता हैं, भाई-बहनें हैं !"
दिन चढ़ता गया, श्यामल तटभूमि क्रमशः हमारे क़रीब आती गई। उस
श्यामलता के बीच मनुष्यों को काम करते देखकर हमने एक अनोखे आनन्द का
अनुभव किया। इन मनुष्यों को देखते ही मानो इनके परिवार-वर्ग को भी मैंने
देखा। उनके गृहस्थ-जीवन के सुख-दुःख को इनकी कर्म-प्रचेष्टा के साथ जड़ित
देखा। क्रमशः पुरुष के साथ नारी को भी चलते-फिरते देखा। छोटे-छोटे नद और
नदियाँ इस समुद्रगामी नदी में आकर सम्मिलित हुई हैं। इसके किनारे-किनारे
तटभूमि के प्रान्त में खेती दिखाई देने लगी। इन खेतों के बीच ग्राम बसे हुए थे।
अब भी नदी बहुत प्रसारित थी। तटभूमि घने वृक्षों से शोभायमान थी। नदी के
दोनों ओर हरियाली और बीच में पानी—यह दृश्य बड़ा मनोहर था। इस नद-
नदी-हरियाली परिवेष्टित ग्राम-जीवन को देखकर मन में अजीब प्रसन्नता होती
थी। कुछ दिनों से पारिवारिक जीवन से अलग होने के कारण मन में—अन्तःस्तल
में पारिवारिक जीवन के प्रति स्पृहा बनी हुई थी। इसके कारण, या सम्भव है
जन्मजन्मान्तर के संस्कार के कारण, पाँच साल के बाद जब मैंने स्त्री-पुरुष परि-
वेष्टित पुरुष को घर-गृहस्थी के काम में लगा हुआ देखा तो हृदय में एक उल्लास-
सा पैदा हुआ। सम्भव है, कौमार्य-जीवन व्यतीत करते-करते दाम्पत्य जीवन के
प्रेमास्वादन की अनिर्देश लिप्सा के कारण ही मैं चारों ओर की प्रकृति में इतना'
अनुभव कर रहा था।
दोपहर के बाद जब दिन ढलने को हुआ तो हमारा जहाज़ लोगों से भरपूर
तटभूमि से घिरी संकीर्ण नदी के भीतर से गुज़र रहा था। मैं और हेमचन्द्र पास-
पास खड़े थे। कारबार के सिलसिले से माल से लदी हुई बड़ी-बड़ी नौकाएँ इधर-
उधर आ-जा रही थी। अर्धनग्न मल्लाह इन नावों को खे रहे थे। कमर के नीचे
और घुटने के ऊपर तक ही वे कुछ कपड़े लपेटे हुए थे। सुबह से शाम तक कठिन
परिश्रम किया करते थे। इन्हें धूप और पानी की समान रूप से अवहेलना करनी
पड़ती थी।
इन अर्द्धनग्न मल्लाहों को देखकर हेमचन्द्र ने मुस्कराते हुए कहा कि देखो,
जेल में कैदियो को फिर भी कपड़ा तो पहनने को मिलता है, जेल के अन्दर धूप
और पानी में क़ैदियों से तो काम नही लिया जाता। काम करने की एक सीमा तो
है। लेकिन ये हमारे आज़ाद देशवासी अर्द्धनग्न अवस्था में किन कठिन परिश्रमों'
का सामना कर रहे है। बात तो सच थी, लेकिन मुझे वह पसन्द नहीं आई। मुझे
ऐसा लगा कि जेल के अधिकारीगणों के पक्ष में यह दलील दी जा रही है। अण्डमन
जेल के क्रूर एवं निर्लज्ज अधिकारीगणों के पक्ष में कोई बात सुन सकना मेरे लिए
सहज न था। मेरे दिल की बेचैनी ने मेरे चेहरे को अवश्य विकृत कर दिया होगा,
मानो मैंने अपने उस विकृत चेहरे को अपनी आँखों से देखा। मैंने उत्तर में हेमचन्द्र
से कहा कि अपनी स्वाधीन इच्छानुसार चाहे कितनी भी मुसीबत हम बर्दाश्त कर
लें, यह सब गवारा है, लेकिन जिस मुसीबत को झेलने के लिए मुझे मजबूर किया

कालेपानी से विदाई / 209

जाए वह चाहे कितनी भी थोड़ी हो, वह पहाड़-सी भारी मालूम होती है। मालूम
नही हेमचन्द्र ने इसके उत्तर में क्या कहा था। दिन ढलने लगा, नदी धीरे-धीरे
संकीर्ण होने लगी। मालूम होने लगा कि अब कलकत्ता निकट है। जन कोलाहल
से भरी विशाल नगरी की याद आते ही मन मे एक अजीब चंचलता पैदा हुई।
कहाँ शत्रु से घिरे अण्डमन के कारागार का जीवन और कहाँ लोगों से भरी-पूरी
बस्ती के बीच विशाल राजधानी, जहाँ की मधुर स्मृति कारागार की काल-कोठ-
रियों में हमें निरन्तर प्रलुब्ध करती रहती थी ! मुक्ति का पूरा आस्वाद पाने के
लिए मन व्यग्र हो उठा। यह हम जानते थे कि भारत में किसी को पता भी नहीं
है कि अण्डमन के राजबन्दी मुक्त होकर वापस आ रहे हैं। कलकत्ता के बन्दरगाह
में किसी भी सुपरिचित स्नेहातुर कमनीय मुख के देखने की आशा न थी। मुद्दत
के बाद घर लौट रहे हैं। असीम दुःख को झेलने के बाद स्नेहीजन परिवेष्टित
संसार में लौट रहे हैं। ऐसे अवसर पर दिल चाहता था कि स्वदेश की भूमि पर
सर्वप्रथम क़दम रखते समय किसी स्नेही से मुलाकात हो जाए, लेकिन यह दुराशा
मात्र थी। जेल में रहते समय जब हम दिल बहलाने के लिए बातें किया करते थे,
तो एक दिन उपेन्द्रनाथ ने यह दृश्य खींचकर हम लोगों का मन बहलाया था कि
मानो हम लोग छूट रहे हैं। श्वेत ऐरावत आकर सूंड उठाकर गंध पुष्प-माल्य उठा
रहा है और देवबालाएँ वस्त्रालंकार से सुशोभित होकर शंख-निनाद से हम लोगों
का स्वागत करने के लिए चारों दिशाओं में खड़ी हैं। कल्पना ही से जब काम
लेना है तो फिर कमी भला किसी भी बात की क्यों रखें। वंचित जन इसी तरह से
दिल बहलाव करते हैं। आज जब जीते-जी दूमरे जन्म के आस्वादन का समय
आया एवं बहुवांछित कलकत्ता महानगरी समीपवर्ती हो आई तो उल्लास के
साथ मन मे एक विषाद की छाया भी थी। मन में तीव्र वासना थी कि जहाज़
से उतरते वक़्त किसी स्नेही से मुलाकात हो, लेकिन हम जानते थे यह नहीं
होने का।

3
मातृभूमि की गोद में
हम उम्मीद किए थे कि शाम से पहले ही कलकत्ता पहुँच जाएंगे। लेकिन
कलकत्ता पहुँचने में संध्या बीत गई। अभी भी दुःख का अन्त न हुआ था। जहाज़ से
उतरते-उतरते एक घंटा से भी अधिक समय लग गया। उतरने के बाद फिर वही
जोड़े-जोड़े खड़े कर दिये गए। और फिर दो-तीन मील दूर एक थाने में पैदल
जाना पड़ा। अण्डमन जाते वक्त भी इसी तरह सुबह प्रेजीडेन्सी जेल से जहाज़
तक जोड़े-जोड़े बेड़ियां पहने मार्च करके आना पड़ा था। टाल्स्टाय के रिसरेक्शन
ग्रन्थ में क़ैदियों के दल का पैदल सफर करने का एक ऐसा ही हृदय-विदारक दृश्य
आया है। आज छूटने के दिन भी फिर जहाज़ से थाने की तरफ जोड़े-जोड़े से
जाना पड़ा। उधर सौभाग्य से वारीन्द्र, उपेन्द्र और हेमचन्द्र अर्थात् भारत के
सर्वप्रथम बम केस के राजबन्दियों से मिलने के लिए सी० आई० डी० के अफ़सर
आये हुए थे। उन्होंने इन्हें सीधे घर जाने की अनुमति दे दी। हमेशा की तरह मेरे
दुर्भाग्य ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। मटिया बुर्ज के थाने के विशाल प्रांगण में हम
सब मुक्त क़ैदी एकत्र किए गए। अब फिर शक होने लगा कि हम सचमुच मुक्त
हुए हैं या नहीं। लेकिन किसी ने कोई रोक-टोक नही की। इससे हमने अनुमान
किया कि यह सब मामूली अनुशासन की कार्रवाई है। थाने के बाहर बढ़े तो किसी
ने रोका नहीं। आगे और बढ़े, इस तरह से बढ़ते-बढ़ते थोड़ी दूर तक और चले
गए, सोचा अब कुछ खाएँ। पुलिस की तरफ से कोई व्यवस्था दिखलाई नही दी ।
वारीन्द्र ने मुझे तीन रुपये दिए थे, उसी में से कुछ खर्च करके खाया-पिया ।
कलकत्ता के पास जाकर भी कलकत्ता में नहीं जाने पाए । खाने के लिए बहुत रद्दी
चीज़ मिली । मन में लग रहा था कि दौड़कर कलकत्ता चले जाएँ । लेकिन फिर
डर यह हो रहा था कि कही आसमान से गिरकर खजूर पर न अटक जाएँ । रात
तो किसी सूरत से बिताई । मालूम हुआ दूसरे दिन लाल दिग्घी थाने में जाकर
रेलवे इत्यादि का खर्च मिलेगा तब कही जाकर पुलिस के पंजे से ठीक-ठीक छुटकारा
मिलेगा ।
प्रातःकाल होते ही बहुवांछित जनकोलाहलपूर्ण भारतवर्ष की राजधानी
महानगरी कलकत्ता में प्रवेश करने की प्रबल इच्छा हुई। पूछताछ करने पर मालूम
हुआ कि मिटियाबुर्ज के थाने से लालदिग्घी थाने में जाना पड़ेगा। अभी जाने में

मातृभूमि की गोद में / 211

कम-से-कम दो-तीन घंटे की देरी है। यह जानकर कि यदि मैं फिलहाल मिटिया-
बुर्ज थाने से चला जाऊँ और सीधा लालदिग्गी थाने में जाकर वहाँ फिर मुक्त
क़ैदियों के दल में सम्मिलित हो जाऊँ तो पुलिस को आपत्ति न होगी, मैंने सीधा
ट्राम का रास्ता लिया। ट्राम में चढ़कर कालीघाट आ पहुँचा। कालीघाट में मेरे
चचेरे भाई रहते थे। लेकिन मैंने सबसे पहले बी० सी० चटर्जी बैरिस्टर के यहाँ
जाने का निश्चय किया।
बंगाल एवं यू० पी० में चटर्जी साहब ने बहुत-से राजनीतिक षड्यन्त्रों के
मामले में पैरवी की थी। आप प्रसिद्ध नेता सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के दामाद थे।
क्रांतिकारियों के साथ आप विशेष सहानुभूति रखते थे। बनारस षड्यन्त्र केस में
भी आपने पैरवी की थी। इस सिलसिले में चटर्जी साहब को घनिष्ठ रूप में
जानने का मौका मिला था। राजनैतिक क्षेत्र में आप अरविन्द की नीति के पक्ष-
पाती थे। बंग-विच्छेद के बाद बंगाल में जो अग्निमय युग आया था उस ज़माने
में अरविन्द एवं विपिनचन्द्र पाल के संचालन में 'वन्देमातरम्' नाम का एक
प्रसिद्ध दैनिक पत्र निकला करता था। हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में
इस पत्र का विशेष स्थान है। इस पत्र में अरविन्द के सहयोगी के रूप में श्री बी०
सी० चटर्जी भी लिखा करते थे। कलकत्ता हाईकोर्ट में जितने वकील-बैरिस्टर थे
उनमें सी० आर० दास, बी० सी० चटर्जी एवं एस० एन० हलदार प्रमुख थे।
बी० सी० चटर्जी साहब ने हम लोगों से अनुरोध किया था कि हम लोग डकैती
करना छोड़ दें। हम लोगों के लिए जितने रुपयों की आवश्यकता होगी, सब वे
संग्रह करके देंगे। लेकिन थोड़े ही दिनों बाद आपने हमसे कह दिया था कि
'भाई, तुम लोग जो चाहो सो करो, रुपया कोई देता नहीं है। हमने आशा की
थी कि हम काफ़ी रुपयों की मदद तुम्हें दे सकेंगे, लेकिन हम निराश हो गए हैं।
अब तुम्हें अधिकार है जो ठीक समझो, सो करो।' क्रांतिकारियों के साथ ये इतनी
गहरी सहानुभूति रखते थे, अतः मुक्ति पाने पर कलकत्ते में क़दम रखते ही आज
सीधा मैं उन्हीं बी० सी० चटर्जी के मकान की तरफ रवाना हो गया। मुझे उनके
स्थान का ठीक पता नहीं था। कालीघाट में ट्राम से उतरकर मैंने एक युवक से
बी० सी० चटर्जी का पता पूछा। सौभाग्य से इस युवक ने मेरे साथ बहुत सहानु-
भूति दिखाई। लेकिन जितनी आशा थी उतनी सहानुभूति नहीं मिली। पहले
तो इस युवक ने मुझे यों ही समझा के टालना चाहा कि अमुक रास्ते पर जाने
पर गन्तव्य स्थान को पहुँच जाऊँगा। लेकिन जब मैंने बतलाया कि मैं अभी सीधा
कालेपानी से आ रहा हूँ, यदि आप कृपापूर्वक मेरे साथ हो लें और बी० सी०
चटर्जी साहब का मकान दिखला दें तो मैं बहुत अनुगृहीत हूँगा। इस पर पहले तो
वह युवक हिचकिचाया, लेकिन मेरे अनुरोध करने पर वह मेरे साथ हो लिया।
कालीघाट से बालीगंज तक एवं पुनः बालीघाट से कालीघाट तक इस बेचारे ने
मेरा साथ नहीं छोड़ा। कालीघाट से बालीगंज काफ़ी दूर था।
प्रथम साक्षात में चटर्जी साहब ने मुझे नहीं पहचाना, लेकिन एक-दो क्षणों के

212 / बन्दी जीवन
बाद ही वे कुर्सी से कूदकर खड़े हो गए और दौड़कर मेरे गले से लग गए । फिर
हमें प्रेम और आदर के साथ अपने पास बैठाया और टेबुल पर से मेरी ही लिखित
एक चिट्ठी उठाकर मुझे दिखलाई । यह चिट्ठी मैंने अण्डमन से अपने भाई को
लिखी थी । मैंने देखा कि इस चिट्ठी में कई स्थान पर स्याही से कुछ लाइनें इस
प्रकार लीप-पोत दी गई थीं कि पढ़ी नहीं जा सकती थीं। इस चिट्ठी में और
बातों के साथ मैंने यह भी लिखा था कि भारत में अब नया शासन-विधान
प्रचलित होनेवाला है । अधिकारीगण यह कह रहे हैं कि भारत को अपनी राज-
नीतिक उन्नति के लिए पर्याप्त अवसर दिया जाएगा। यदि यह बात सच है, यदि
इंग्लैंड एवं फ्रांस की तरह हमें भी अपनी उन्नति के लिए उचित मौका मिले तो
ऐसा कौन पागल होगा जो कि खामखा खून-खराबी के रास्ते को ही ग्रहण करेगा
और यों ही अपनी जान को जोखिम में डालकर बन्दूक और तलवार के रास्ते को
अख्तियार करेगा। क्रान्तिकारीगण सचमुच पागल तो हैं नहीं। यदि अधिकारी-
गणों का कहना दिली हक़ीक़त है तो उन्हें अवश्य राजबन्दियों को छोड़ देना
चाहिए । इस चिट्ठी को मेरे भाई साहब ने बी० सी० चटर्जी के पास भेज दिया
था। बी० सी० चटर्जी साहब ने यह चिट्ठी दिखलाकर मुझसे यह कहा कि
उन्होंने इस चिट्ठी को अपने ससुर श्री सुरेन्द्रनाथ बनर्जी को दे दिया था । उन्होंने
असेम्बली में इस चिट्ठी के आधार पर राजबन्दियों को छोड़ने के लिए जोरदार
अपील की थी एवं अनेक राज-पुरुषों को यह चिट्ठी दिखलाई भी थी। बी० सी०
चटर्जी ने यह भी कहा कि वे स्वयं मांटेग्यू साहब से इस सम्बन्ध में मिले भी थे ।
उनके मुंह से मैंने यह भी सुना कि जिस समय वे मैनपुरा केस की पैरवी कर रहे
थे, उसी समय सम्राट् की घोषणा का पत्र प्रकाशित हुआ, जिसमें राजबन्दियों को
छोड़ने की इच्छा प्रकट की गई थी । सी० आई० डी० के डिप्टी-इंस्पेक्टर जनरल
सैण्ड्स साहब भी उस समय चटर्जी साहब के पास ही थे । सैण्ड्स साहब ने चटर्जी
साहब से कहा कि शचीन्द्र की माता से माफी की दरखास्त दिलवा दें और इस
पर उन्होंने स्वयं सिफारिश कर देने को कहा । चटर्जी साहब ने तार से मेरे मामा
को इस बात की इत्तिला दी । मामा ने माताजी के मार्फत दरखास्त दिलवाई ।
सैण्ड्स साहब ने इस दरखास्त पर सिफारिश लिख दी । यह इसी सब का परिणाम
हुआ कि मैं कारावास से मुक्त हो गया और बी० सी० चटर्जी से यह सब सुनने
का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ ।
बी० सी० चटर्जी ने मुझे तेईस साल की अवस्था में देखा था । अब जब मैं
लौटकर आया तो मेरी अवस्था अट्ठाईस साल की थी । बाल बहुत बड़े-बड़े हो
रहे थे । बकरे की दाढ़ी की तरह मेरी दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी । इसीलिए प्रथम
दर्शन में तो चटर्जी साहब मुझे पहचान नहीं पाए थे । चटर्जी साहब ने चाहा कि
मेरे भाई को तार द्वारा मेरी रिहाई का संवाद भेज दें। मैंने मना किया । मैंने
चाहा कि अचानक घर में जाकर खड़ा हो जाऊँ । बहुत हर्ष के साथ चटर्जी साहब
से विदाई ली । एक मुक्त डेटेन्यू भी चटर्जी साहब के पास बैठे थे, उनसे भी

मातृभूमि की गोद में / 213
विदाई ली। पुनः अपने उस अपरिचित युवक के साथ कालीघाट में वापस लौट
आए। रास्ते में मैंने इस युवक के साथ राजनैतिक मामलों पर बातचीत की।
कलकत्ता में क़दम रखने के बाद रंगरूट भरती करने की मेरी यह सर्वप्रथम चेष्टा
थी। कालीघाट में मेरे चचेरे भाई रहते थे। मुझे पता था कि वह कहाँ रहते थे।
चटर्जी साहब के यहाँ से लौटने के बाद मैं सीधा भाई के पास नहीं आया। मैं तो
सबसे पहले इस युवक का ही घर देखने चला गया, तब कहीं बाद को भाई के पास
आया। लेकिन दुःख के साथ बताना पड़ता है कि रंगरूट्टी का मेरा यह प्रथम प्रयत्न
विफल रहा। यह युवक मेरे काम में शामिल नहीं हुआ। इस वक़्त तो मैंने सिर्फ़ इस
युवक का केवल घर ही देख लिया एवं थोड़ी-बहुत राजनीतिक आलोचनाएँ कीं।
बाद को मैं जब कलकत्ता आया तो मैंने फिर इनका पीछा किया एवं कुछ दिनों
तक यह प्रयत्न करता रहा कि यह युवक मेरे प्रभाव के अंदर आ जाय। लेकिन
मैं जैसा पहले कह चुका हूँ, इस प्रयत्न में मैं असफल ही रहा।
इस युवक के घर होते हुए भाईसाहब के घर आया। दरवाजे पर खड़े होकर
मैं यह पूछ रहा था कि अब भी मेरे भाईसाहब उसी मकान में रहते हैं या नहीं।
जंगले से उचककर भाईसाहब ने मुझे देखा एवं देखकर बोल पड़े, “शचीन्द्र ! आ
गए हो ! आओ, भीतर आओ।” भाईसाहब बार-बार मेरे मुंह की तरफ ताकने
लग गए। हँसकर मैंने कहा, “हजामत बहुत दिनों से नहीं बनी है।” नाई आया,
हजामत बनी। भाईसाहब ने कहा कि बनारस से मेरे छोटे भाई मुझे ले जाने के
लिए कलकत्ता आए थे। उन्हें पता ही नहीं चला कि जहाज कहाँ पर आया था।
बेचारे नाउम्मेद होकर वापस चले गए। नहाया-धोया। अब कुछ मालूम पड़ा कि
मैं छूट गया हूँ। क़ैद होने के बाद आज सर्वप्रथम मैंने घर का भोजन किया। पाँच
साल लगातार क़ैद का भोजन करते हुए भी रुचि नहीं बदली। नित्य प्रतिदिन
खाते-खाते भी यह आदत नहीं पड़ी कि जेलखाने के भोजन के प्रति भी रुचि हो
जाय। इससे यह प्रमाणित होता है कि स्थूल रूप से किसी काम को बराबर
करने ही से कहीं आदत नहीं बना करती, अच्छे भोजन के लिए हर घड़ी जी में
चाह बनी रहती थी। इसलिए वासना की तृप्ति न होने के कारण स्थूल व्यवहार
का कोई असर स्वभाव पर नहीं पड़ा। यथार्थ में वासना-जगत् में कोई परिवर्तन
हुए बिना शारीरिक या स्थूल व्यवहार का कोई असर मनुष्य-जीवन पर नहीं
होता। इस प्रकार हम यह थोड़ा-बहुत अनुभव कर सकते हैं कि जगत् प्रधानतः
वासनात्मक है। पाँच साल के बाद आज महत् तृप्तिपूर्वक भोजन किया। भाई ने
कहा कि घर को तार द्वारा मेरे छूटने का संवाद दे दूँ। इस वक़्त ठीक याद नहीं
है कि तार किसने भेजा था—चटर्जी साहब ने या इन्हीं भाई साहब ने। सम्भव
है कि भाईसाहब ने ही भेजा हो, क्योंकि शायद ऐसा हुआ हो कि मेरे छोटे भाई
का कलकत्ता आना और अकेले वापस चले जाने का असर.मेरे ऊपर हुआ था।
भाई साहब ने मुझे समझाया कि जो कुछ होना था.सो हो गया, अब मैं दत्तचित्त
होकर गृहस्थी के काम में लग जाऊँ। उम्र काफ़ी हो चुकी है। इस वक़्त की

214 / बन्दी जीवन
अवहेलना से बाद में पछताना पड़ेगा।
खाने-पीने के बाद कुछ आराम करके लालदिग्घी पहुँच गए। इतने में एक
मोटरकार थाने के प्रांगण में आई। इसमें कलकत्ता के सुपरिचित बैरिस्टर आई०
वी० सेन एवं बी० के० लाहिड़ी थे। ये आए थे बारीन्द्र वगैरह की खोज में।
संवाद-पत्र में पढ़ा होगा कि बारीन्द्र वगैरह छूट गए हैं। मैंने इनको बतलाया कि
वे तो कल रात ही अपने-अपने ठिकाने पहुँच गए होंगे। मुझे इस वक़्त याद नहीं
है कि आई० वी० सेन आए थे कि जे० एम० सेन गुप्ता । बी० के० लाहिड़ी ने
मेरे परिवार के साथ अपना कुछ रिश्ता बतलाया। बारीन्द्र को न पाकर इन्होंने
मुझसे ही अनुरोध किया कि कलकत्ता में एक खिलाफ़त कान्फ्रेंस हो रही है और
मुझे वहाँ चलना होगा। मैं जी में जरा-सा घबराया, सोचा कि आज ही तो कल-
कत्ता में पहले दिन क़दम रखा है ! अभी भी पुलिस के पंजे से छुटकारा नही
पाया है और लालदिग्घी थाने के प्रांगण के अन्दर ही राजनीतिक कान्फ्रेंस मे जाने
का यह साग्रह अनुरोध ! यह सच है कि बिना किसी प्रकार की शर्तें लगाये हुए ही
मुझे छोड़ दिया गया था। मुक्ति पाने का जो सर्टिफिकेट मुझे मिला था उसमें
एक स्थान पर ऐसा लिखा था कि अपने स्थान पर पहुँचते ही ज़िला-कलेक्टर को
हम इत्तिला दे दें कि कालेपानी से लौट आए हैं। अतः मैंने बैरिस्टर साहबों से
कहा कि अभी हम थाने मे ही हैं, ऐसी हालत मे कान्फ्रेंस में जाने से कोई हर्ज तो
नही है ? कान्फ्रेंस में मेरे लिए जाना क्या कोई विशेष आवश्यक बात है ? परन्तु
गुप्ता साहब तथा लाहिड़ी साहब ने इस पर भी विशेष आग्रह किया कि मैं कान्फ्रेंस
में अवश्य चलूँ, तो मैं तैयार हो गया। मुझे उन्होंने मोटर में बैठा लिया और
कान्फ्रेंस के पंडाल मे हाज़िर कर दिया। कान्फ्रेंस के बाद मै मौलाना शौकतअली
से मिलने गया। गिरफ़्तार होने के पहले मेरे आदमी मौलाना शौकतअली एवं
मौलाना मोहम्मदअली के पास क्रान्तिकारी उद्योग के सम्बन्ध मे पहुँचे थे।
इसलिए मौलाना मोहम्मदअली तथा मौलाना शौकतअली साहब मुझे जानते थे।
शौकतअली साहब ने मुझसे अनुरोध किया कि अब मैं खुले मैदान कूद पड़ूँ।
चोरी छिपकर काम का अब प्रयोजन नही है। मैंने शान्तिपूर्वक सब सुन लिया।
वहाँ से विदा होकर पंजाब-कैम्प में आए। विशेष अनुरोध पर मुझे यहाँ कुछ
खाना पड़ा। अच्छी-अच्छी चीजें देखकर लोभ तो बहुत हो रहा था, लेकिन जी
मे डर रहा था कि ऐसा खाना खा लूं तो सम्भव है, हज़म न कर पाऊँ। अभी तक
एक प्रकार का भोजन खाते आए थे जिसमें तेल तो नाम के लिए होता भी था
परन्तु घी की तो सुगन्ध भी न होती थी। इस चहल-पहल से लौटकर फिर वही
निरानन्दमय अशुभ थाने के प्रांगण मे लौट आया। अब भी नाम वगैरह लिखे
जाने एवं राह के खर्च मिलने में काफ़ी देर थी। ये घड़ियां मुझे बहुत ही नागवार
गुज़री। पुलिस की परछाईं से भी मुझे घिन थी। पुलिस के द्वारा जीवन में बहुत-
कुछ दुख पाया था सम्भवतः इसीलिए पुलिसवालों की हवा से भी चिढ़ पैदा हो
गई थी। कालेपानी के पाँच साल काटने में जितनी भी पीड़ा मालूम हुई हो उसके

मातृभूमि की गोद में / 215

मुकाबले में लालदिग्घी के पाँच घंटे बहुत भारी प्रतीत हुए। आखिर इसका भी
अन्त हुआ। पुलिस वाले हमें फिर हावड़ा स्टेशन ले गए। खैरियत यह थी कि
अब की जोड़ा-जोड़ा नहीं जाना पड़ा। चालीस-पचास मुक्त बन्दियों के लिए
कागजात के आधार पर पुलिसवालों ने टिकट कटवाया। स्टेशन पर टिकट देने
वाली ऐंग्लो-इण्डियन मेमसाहिबा टिकट देते-देते चिढ़ गईं और अपशब्द कहने
लगीं। मैं सामने ही खड़ा था। सम्भव है, मुस्कराता रहा होऊँ। दिल में तो मैं
हँसता ही था और सोच रहा था चलो मेरी भी गिनती बदमाशों में हो गई। मैं
डर रहा था कि कहीं पुलिस घर तक मेरे साथ न चले। लेकिन जब टिकट मेरे
हाथ में देकर पुलिसवाले चले गए तो मानो मनों बोझ सिर से उतर गया। रेल के
छोटे-से डिब्बे में तो अवश्य रहे, लेकिन मैंने यही सर्वप्रथम यथार्थ स्वच्छन्दता
अनुभव की। मानो मैं जहाँ-तहाँ विचरने लग गया हूँ। रेल की रफ़्तार मुझे धीमी
मालूम पड़ी। तूफ़ान में सवार होकर यदि मैं घर पहुँच सकता तो मानो जी को
कुछ तसल्ली होती। रात कैसे बीती, मुझे याद नहीं। जाड़े के दिन थे। मेरे
पास न कोई बिस्तरा था न पहनने के गर्म कपड़े। वारीन्द्र का दिया हुआ एक कोट
और एक धोती और कुछ पैसे मेरे पास थे। जेल के दिये हुए कुछ कपड़े भी
साथ थे।
मुझे खूब याद है, भोर होते ही मैं बनारस पहुँचा। असल में छूटने का जो
आनन्द है वह मुझे बनारस पहुँचने पर ही मिला। मेरे लिए बनारस से प्रिय भूमि
संसार में और कोई नहीं है। मेरी यह जन्मभूमि है; शिशु-अवस्था मैंने यहाँ पर
कैसे बिताई, मुझे वह याद नहीं और बाल्यावस्था मैंने यहाँ बिताई नहीं, लेकिन
जीवन का जो श्रेष्ठ अंश है, जो मधुरतम भाग है, अपनी वही किशोरावस्था मैंने
बनारस ही में बितायी है। इसलिए मेरे जीवन की मधुरतम स्मृति बनारस के वायु-
मण्डल में, बनारस की भूमि के प्रति रज-कण में अनन्तकाल के लिए विजड़ित
है। स्टेशन से जब घर की तरफ चला तो प्रति क्षण आनन्द की मात्रा बढ़ती
गई। लेकिन जिस क्षण मैंने इक्के से उतरकर गली के भीतर क़दम रखा तो मुझे
ऐसा मालूम पड़ा कि क़दम के नीचे की भूमि भी मानो कठिन एवं स्थिर नहीं है
मानो वह भूमि भी आनन्द के स्पर्श से चंचल हो रही थी, हिल-डुल रही थी। मैं
चलकर घर नहीं आया बल्कि दौड़ता हुआ घर पहुँचा। क्या हृदयावेग की
आकर्षण शक्ति धरित्री की मध्याकर्षण शक्ति ही की तरह है कि अण्डमन से जब
चले तब से लेकर घर पहुँचने तक यह आकर्षण का वेग बढ़ता ही गया और घर के
पास आकर आखिर मुझे दौड़ना ही पड़ा। मकान के नीचे के कमरे का जंगला
खुला हुआ था। मैं मुहूर्त्त-भर जंगले के सामने आकर खड़ा हो गया। कई एक
युवक वहाँ लेटे हुए थे। इनमें मेरे दो भाई रवीन्द्र और जितेन्द्र भी थे। रवीन्द्र
मुझे देखते ही हर्षोत्फुल्ल स्वर से नाति-उच्च कण्ठ से चिल्ला उठे, “अरे, दादा
हैं।” रवीन्द्र बिस्तरे से ऐसे उचक पड़े मानो नीचे से किसी ने जोर का धक्का
देकर उन्हें ऊपर फेंक दिया हो। घूमकर दरवाजे होते हुए अन्दर आए एवं हरएक