बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकालेपानी से विदाई / 201
रात जहाज़ में रहना पड़ा था। अब वापस जाने के वक़्त भी चार दिन और तीन
रात जहाज़ पर रहना पड़ा। आकाश साफ़ था। नभ-मण्डल में कोई चंचलता न
थी। जहाँ तक मुझे याद है पंजाब के मार्शल-लॉ के क़ैदियों को हम लोगों से अलग
रखा गया था और सम्भवतः उनके पैरों में बेड़ियाँ भी थीं और शायद उनसे यह
भी कहा गया था कि पंजाब में ले जाए जाकर ही वे लोग छोड़े जाएँगे। लेकिन
मुझे ये सब बातें अब ठीक याद नहीं हैं। सम्भव है, मैं कुछ ग़लती कर रहा होऊँ।
यह ठीक याद है कि हम चार आदमी एक तरफ़ थे और मार्शल-लॉ के क़ैदी दूसरी
तरफ़ थे। हम लोगों की रिहाई के सर्टिफिकेटों में चाल-चलन के कॉलम में 'फेयर'
लिखा हुआ था, यानी न ज्यादा अच्छा और न ज्यादा खराब । और रिहाई के
कारण के कॉलम में यह लिखा था कि 'बादशाह के ऐलान के सिलसिले में रिहा
किए जा रहे हैं।' एक और लक्ष्य करने की बात यह थी कि रिहाई के सिलसिले में
यह लिखा था, 'कारसपांडेन्स एण्डिंग इन ए टेलीग्राम' अर्थात् चिट्ठी-पत्र व्यवहार
के बाद आखिर में तार आया तब छूटे। मेरे जीवन की यह एक ख़ूबी है कि आज
तक जीवन-भर मेरा कोई काम निर्विघ्न रूप से सहज सरल तरीके से कभी भी
नही हुआ। मुझे हमेशा कठिन-से-कठिन बाधाओं का सामना करना पड़ा है।
छूटते वक़्त भी आखिरकार तार आया तब छूटे। आखिर शादी के सिलसिले में
भी मुझे कोसों पैदल चलना पड़ा, तब जाकर कहीं लडकी को देखना नसीब हुआ।
इसी तरह से इस जीते-जी पुनर्जन्म के बाद फिर जब मैंने यात्रा प्रारम्भ की तो
पग-पग पर मुझे कठिन बाधाओं का सामना करना पड़ा।
अंग्रेजों के बच्चों को मैंने जहाज़ पर इधर-उधर निस्संकोच घूमते हुए देखा।
जहाज़ के बिलकुल एक किनारे से ऊपर के डेक से नीचे की डेक में जाने की एक
सीढ़ी थी। थोड़ी-सी ही असावधानी के कारण बच्चे इस सीढ़ी से गिरकर अथाह
समुद्र मे जा गिर सकते थे, लेकिन निस्संकोच ये बच्चे नीचे से ऊपर और ऊपर से
नीचे आया-जाया करते थे, कूदा-फाँदा करते थे। इनकी देखभाल के लिए कोई
साथ न रहता था। इस दृश्य ने मेरे मन पर अपनी गम्भीर छाप लगा दी। मैं
हैरान रह गया कि कैसे इनके माँ-बाप निश्चिन्त होकर चैन से अलग बैठे होंगे।
क्या हम भारतवासी इस प्रकार ऐसे अवसर पर बेफ़िक्र बैठे रह सकते हैं ? मैं अपने
को काफ़ी हिम्मत वाला समझता हूँ, लेकिन मेरे लिए आज भी ऐसा सम्भव नही
है। एक और भी दृश्य आज भी मुझे याद है। मैं उस वक़्त छात्र था। बनारस के
क्वीन्स कॉलेज में पढता था। करीब तीन-चार बजे शाम को कॉलेज के प्रांगण मे
होताहुआ कही जा रहाथा। सामने देखा कि कॉलेज के प्रिंसिपल मिन्सेण्ट साहब एक
प्रोफ़ेसर के साथ जा रहे हैं। प्रिंसिपल साहब का एक शिशु-सन्तान ज़मीन पर खेल
रहा था। पास ही आया बैठी थी। वह शिशु पेड़ पर चढ़ने को गया। आया ने
रोका तो प्रिंसिपल साहब ने आया को समझाया कि बच्चों को उनकी गतिविधि में
कभी रोका न करो। पेड़ पर चढ़ना चाहता है, तो चढ़ने दो। तुम देखती रहो कि
वह गिर न पड़े।