बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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ने जो खुशी मनाई उस सिलसिले में बर्मा के तमाम राजबन्दियों को सरकार ने
छोड़ दिया। दूसरे मामूली कैदियों में से भी पुराने कैदियों को छोड़ दिया। यह
सब देखकर भारत के राजबन्दियों के मन में कुछ नाउम्मीदी अवश्य हो गई थी,
तथापि मेरे मन में सांत्वना बनी रही। आशा की छलना से संसार-भर के मनुष्यों
का निर्वाह होता है। मेरी आशा तो सत्य के आधार पर बनी हुई थी तथापि यह
भी सच है की कभी-कभी निराशा के अंकुर ने मुझे भी चंचल किया था। भागते
हुए पक्षियों की छाया की तरह यह दुर्भावना आई और चली गई। मैं अपने पढ़ने में
लगा रहा। उन दिनों मिल की लिखी हुई 'प्रिंसपल्स ऑफ़ पॉलिटिकल एकॉनमी'
पढ़ रहा था। किताब पढ़ चुका था। इतने में एक दिन करीब तीन बजे शाम को
रायटर का तार छपने के लिए आया। तार की अधूरी भाषा से जाहिर हो रहा
था कि बादशाह ने राजबन्दियों की रिहाई के बारे में कुछ ऐलान किया है। बस,
उस दिन से लिखना-पढ़ना चौपट हो गया। सिवा एक चर्चा के कि कब छूटेंगे,
कौन छूटेगा, क्या होगा, क्या न होगा, और कोई बातें ही न रही। खाते-पीते,
लेटते-जागते हर घड़ी वही चर्चा और वही चिंता। बारीन्द्र दौड़-धूप करके दफ्तर
से 'बंगाली' नाम के अखबार की एक प्रति ले आए, जिसमें बादशाह की घोषणा
छपी हुई थी। वह पढ़कर जैसे आशा का संचार हुआ, वैसे ही दूसरी तरफ इस
दुर्दमनीय सन्देह ने भी हम सबको बेचैन कर दिया कि बादशाह की घोषणा में
यह तो अवश्य था कि ज्यादा-से-ज्यादा राजबन्दियों को छोड़ दिया जाय, लेकिन
इसके साथ यह भी एक वाक्य था कि 'भारत के बड़े लाटसाहब जिस किसी को
भी ऐसा समझें कि उसके छोड़ने से अभी उपद्रव की सम्भावना है, तो उसे वे नहीं
भी छोड़ सकते हैं।' अब हम लोगों में धुकधुकी पैदा हुई। जाने लाटसाहब किसे
क्या समझें। दुःस्वप्न की भयानक छाया की तरह यह विभीषिका हम लोगों के मन
में हर घड़ी बनी रही। हम लोगों में से अब किसी को चैन न रहा। लेकिन मेरी
आशा अब और बलवती हो गई। जब मैं पहले-पहल कालेपानी में आया था और
यहाँ के राजबन्दियों के साथ मैंने अपने अदूर भविष्य में छूटने की भविष्यवाणी के
बारे में बात की थी, तो सबों ने मेरी हँसी उड़ाई थी एवं उपेन्द्र वगैरह ने यह
कहा था कि 'अंग्रेजों की हुकूमत रहते हुए तो तुम छूट नही सकते।' इस पर मैंने
कहा था कि 'यदि मेरे छूटने के लिए अंग्रेजी हुकूमत का अन्त होना आवश्यक है,
तो अंग्रेजी हुकूमत का अन्त अवश्य होगा, क्योंकि मुझे छूटना तो अवश्य है ही।'
अवश्य ही ये सब बातें हँसी-मजाक के तौर पर होती थीं। दिल बहलाने का यह
एक तरीका था। इसी सिलसिले में बारीन्द्र और उपेन्द्र ने उल्लासकर की कही
हुई एक बात सुनाई थी कि अब बड़े कठिन आदमियों से पाले पड़े हैं, ये हमारे हाड़
खाएँगे, मांस खाएँगे, चमड़े से डुगडुगी बजाएँगे। बादशाह का ऐलान होने के
बाद मैंने इन लोगों से कहा, 'कहो अब कैसी रही !' फिर कुछ दिन ऐसे ही बीते।
न कोई छूटा, न छाटा। न लिखने-पढ़ने में मन बहले और न काम करने में ही
दिल लगे। इतने में एक दिन बारीन्द्र ने आकर खबर सुनाई कि चीफ कमिश्नर