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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 408 में से

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पृष्ठ 202

200 / बन्दी जीवन
ही-मन यह सोचा कि जो नई ज़िम्मेदारी मेरे सिर पर आ रही है, क्या मैं उसके
लिए तैयार हूँ ? मेरा जीवन तो खतम हो ही गया; इस पुनर्जन्म के बाद से क्या
अपनी ज़िन्दगी पर मेरा व्यक्तिगत अधिकार है ? क्या मेरा जीवन अब समाज के
कामों में ही न्योछावर न होना चाहिए ? इस भावना ने मुझे उस घड़ी उतावला
कर दिया। हम लोग समुद्र के किनारे आ पहुँचे । समुद्र के पानी को स्पर्श करते
ही मैंने ऐसा समझा कि यही पानी मेरी प्रिय मातृभूमि का भी स्पर्श कर रहा
है। उसे स्पर्श करके मानो मैंने मातृभूमि का भी स्पर्श कर लिया। मैंने ऐसी
कल्पना की कि मानो इस समुद्र का पानी आँचल की तरह बिछा हुआ है। उसका
एक छोर भारतवर्ष को और दूसरा छोर मुझे स्पर्श कर रहा है। नाव पर सवार
होकर कुछ दूर जाने के बाद जहाज़ मिला। वारीन्द्र वगैरह के कुछ पुराने मिलने-
वाले केला आदि फल-मूल भेंट करने के लिए ले आए थे ।
जब कालेपानी आए थे, तो जहाज़ में जिस जगह माल इत्यादि लादा जाता
है, उसी सबसे नीचे की तह में हम मनुष्यों को बे-जानदार वस्तुओं की तरह लादा
गया था; तिस पर भी पैरों में बेड़ियाँ भी पड़ी थी और संगीन लिये हुए
सिपाहियो का पहरा था। आज मुक्ति के दिन ऐसा नही हुआ। हम लोग जाकर
डेक पर बैठे। पैरों में बेड़ियाँ न थी, न कोई पहरे का इन्तजाम। अब मालूम होने
लगा कि हम लोग सचमुच छूट रहे है। दिल में आया, क्या इधर-उधर जा सकते
हैं, घूम-घामकर कुछ देख सकते हैं ? तो देखा कि कोई मना करनेवाला नही है।
स्वाधीनता पाने की यह प्रथम अनुभूति थी। जहाज़ में इधर-उधर जाकर मैं घूमने
लगा। इधर देखा, उधर देखा, कहाँ पर कैसे आदमी सवार हैं, इंजिन किधर है,
खाना पकाने की जगह कहाँ है और कहाँ स्नानागार और शौचागार है। आनन्द
की मात्रा बढ़ने लगी और सोचा, अब छूट गए। अब खाने-पीने की फिक्र हुई।
हिन्दुओं के लिए खाने का कोई इन्तज़ाम न था। या तो चना-चबेना चबाकर रहो
या जहाज़ के मुसलमान खलासियों के हाथ का पका हुआ भोजन खाओ। वारीन्द्र
घूम-घामकर जहाज़ के स्टुअर्ड के साथ खाने-पीने का कुछ बन्दोबस्त कर आए।
इस इन्तजाम मे हम चार आदमी शामिल थे—वारीन्द्र, उपेन्द्र, हेमचन्द्र और मै।
यहाँ पर यह बतला देना आवश्यक है कि खाने-पीने की छुआछूत में हम लोगों ने
कभी भी कोई परहेज नहीं किया। हाँ, अवश्य ही गो-मांस आज तक नही खाया।
लेकिन जब विचार करने बैठते हैं तो कबूतर के मांस मे और बछड़े के मांस में क्या
अन्तर होगा, यह समझ में नहीं आता। यह तो समझ में आता है कि नीति की
दृष्टि से किसी भी प्रकार के मांस का खाना अनुचित है, अन्याय है, अशोभन है और
सम्भव है कि बहुत-से अवसरों पर हानिकारक भी है। लोभ के वश में आकर
आजन्म के अभ्यास के कारण एवं संग-सोहबत की वजह से अक्सर मांस खा लेता
हूँ। ओर कभी-कभी दूसरे प्रकार के संग-सोहबत के कारण मैंने कई दफ़ा मांस
खाना छोड़ भी दिया और फिर शुरु भी कर दिया।
जब कालेपानी को आए थे तो बरसात का मौसम था। चार दिन और तीन