बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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जिनके साथ मुझे चार दिन तीन रात हर घड़ी एक साथ रहना पड़ा, उनकी
मनोवृत्ति एवं मानसिक झुकाव के साथ मेरा कोई ऐक्य न था। सम्भवतः
हमारे हरएक की दुनिया अलग-अलग थी। हम अपनी दुनिया में विचरण कर
रहे थे, वे किसी और दुनिया में विचरण कर रहे होंगे। आपस में मौखिक बात-
चीत तो होती रही, हँसते भी थे लेकिन एक-दूसरे के हृदय को स्पर्श नहीं कर पा
रहे थे। यह अनैक्य की बात एक-दूसरे से छिपी हुई न थी; मानो हरएक के
दिल के सामने एक पर्दा पड़ा हुआ था और उसी पर्दे की आड़ में रहकर हम लोग
एक-दूसरे से बातचीत कर रहे थे।
ऐसी परिस्थिति से ऊबकर मैं कभी-कभी सिख भाइयों के पास जाता था।
लेकिन वहाँ भी दिल को तसल्ली नहीं मिलती थी; क्योंकि हम लोगों का मानसिक
विकास विभिन्न मार्ग से अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार विभिन्न ध्येय को लेते
हुए हुआ है। इतने आदमियों के साथ रहते हुए भी मैं यह अनुभव करता था
कि मैं कितना अकेला हूँ। क्या करता, मजबूरी थी। पाठक यह महसूस कर सकते
हैं कि मैं इस आनन्द के दिन कितना निरानन्द रहा !
इसी जहाज़ पर अण्डमन टापू के अंग्रेज़ डिप्टी-कमिश्नर एवं कई एक बंगाली
मैडीकल ऑफिसर हिन्दुस्तान वापस लौट रहे थे। वारीन्द्र वगैरह से इन लोगों
का परिचय था। इन लोगों से मिलने के बाद एक दफ़े वारीन्द्र हम लोगों के पास
आकर कहने लगे कि हिन्दुस्तान की हालत बहुत नाजुक है। अब यह नहीं पता
चलता कि कौन मित्र है और कौन शत्रु। स्कूल के हेड-मास्टर, टीचर, डॉक्टर और
छात्र इनमें सब खुफ़िया पुलिस के आदमी भरे पड़े हैं। पड़ोस में जो रहते हैं उनमें
कौन खुफ़िया पुलिस के हैं और कौन नहीं, यह कहना बहुत मुश्किल है। दूसरे मौके
पर डिप्टी-कमिश्नर लुइस साहब से मिलकर लौटने के बाद वारीन्द्र यह कहने लगे :
'भई, लुइस साहब बड़े भलेमानस हैं। उनसे बहुत देर तक बातचीत की। सुख-
दुःख की बातें पूछीं। कहाँ रहेंगे इत्यादि बातें होते-होते उल्लासकर की बात आई।
लुइस साहब ने अकपट हृदय से यह कहा कि 'उल्लासकर का मन बड़े ऊँचे स्वर
से बँधा हुआ था। इसी प्रकार से सिख राजबन्दियों के बारे में बातचीत हुई।
सिखों के साहस एवं उनकी विरोधी पक्ष के सामने खड़े होने की शक्ति की बहुत
प्रशंसा की।' ऐसा कहते हुए वारीन्द्र ने इस शुभ मुहूर्त्त में यह स्वीकार किया कि
जो राजबदीगण जेल-अधिकारियों के विरोध में सिर ऊँचा रखते हुए आत्म-सम्मान
के लिए हमेशा लड़ा करते थे, वे यथार्थ में वीर थे और सराहनीय थे। उनके
मुकाबले में वारीन्द्र ने अपनी कमजोरी स्वीकार की।
यहाँ पर उल्लासकर का कुछ परिचय दे देना आवश्यक है। इनके पिता
शिवपुर में इंजीनियंरिंग कॉलेज के प्रोफ़ेसर थे। वारीन्द्र वगैरह के दल में शामिल
होने के पहले ही उल्लासकर ने अपने घर में ही एक रसायनागार बना लिया था
और वहाँपर वह विस्फोटक पदार्थ के विषयों में परीक्षण किया करते थे। उल्लास-
कर बड़े विचारशील और आध्यात्मिक प्रकृति के मनुष्य थे। वारीन्द्र का दल