बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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जाए वह चाहे कितनी भी थोड़ी हो, वह पहाड़-सी भारी मालूम होती है। मालूम
नही हेमचन्द्र ने इसके उत्तर में क्या कहा था। दिन ढलने लगा, नदी धीरे-धीरे
संकीर्ण होने लगी। मालूम होने लगा कि अब कलकत्ता निकट है। जन कोलाहल
से भरी विशाल नगरी की याद आते ही मन मे एक अजीब चंचलता पैदा हुई।
कहाँ शत्रु से घिरे अण्डमन के कारागार का जीवन और कहाँ लोगों से भरी-पूरी
बस्ती के बीच विशाल राजधानी, जहाँ की मधुर स्मृति कारागार की काल-कोठ-
रियों में हमें निरन्तर प्रलुब्ध करती रहती थी ! मुक्ति का पूरा आस्वाद पाने के
लिए मन व्यग्र हो उठा। यह हम जानते थे कि भारत में किसी को पता भी नहीं
है कि अण्डमन के राजबन्दी मुक्त होकर वापस आ रहे हैं। कलकत्ता के बन्दरगाह
में किसी भी सुपरिचित स्नेहातुर कमनीय मुख के देखने की आशा न थी। मुद्दत
के बाद घर लौट रहे हैं। असीम दुःख को झेलने के बाद स्नेहीजन परिवेष्टित
संसार में लौट रहे हैं। ऐसे अवसर पर दिल चाहता था कि स्वदेश की भूमि पर
सर्वप्रथम क़दम रखते समय किसी स्नेही से मुलाकात हो जाए, लेकिन यह दुराशा
मात्र थी। जेल में रहते समय जब हम दिल बहलाने के लिए बातें किया करते थे,
तो एक दिन उपेन्द्रनाथ ने यह दृश्य खींचकर हम लोगों का मन बहलाया था कि
मानो हम लोग छूट रहे हैं। श्वेत ऐरावत आकर सूंड उठाकर गंध पुष्प-माल्य उठा
रहा है और देवबालाएँ वस्त्रालंकार से सुशोभित होकर शंख-निनाद से हम लोगों
का स्वागत करने के लिए चारों दिशाओं में खड़ी हैं। कल्पना ही से जब काम
लेना है तो फिर कमी भला किसी भी बात की क्यों रखें। वंचित जन इसी तरह से
दिल बहलाव करते हैं। आज जब जीते-जी दूमरे जन्म के आस्वादन का समय
आया एवं बहुवांछित कलकत्ता महानगरी समीपवर्ती हो आई तो उल्लास के
साथ मन मे एक विषाद की छाया भी थी। मन में तीव्र वासना थी कि जहाज़
से उतरते वक़्त किसी स्नेही से मुलाकात हो, लेकिन हम जानते थे यह नहीं
होने का।