बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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लगे और मैं सहम-सा गया। उस समय के इतने अत्याचारों की रोमांचकारी
कहानी मैंने सुनी जिसे यहाँ पर लिखने की हिम्मत मुझमें नहीं है, क्योंकि अदालत
के सामने इन सब बातों का सबूत मैं नहीं दे सकता।
जब मैं कालेपानी आया था तो प्रकृति विरूप थी। अगस्त का महीना था।
आँधी-पानी और बादल का गरजना, जहाज़ के नीचे की तह में बैठे-बैठे ऐसा
मालूम हो रहा था, मानो एक प्रलयकारी बाढ़ में दुनिया डूब रही है। अब
लौटते वक़्त प्रकृति शान्त थी, मानो हम सबके छूटने से चारों दिशाओं में
प्रफुल्लता छा रही हो। रात में तयहुआ कि प्रातःकाल यह देखना है कि समुद्र के
बीच से सूर्योदय कैसे होता है ! सोते-सोते जब पहले आँख खुली तो देखा कि
चारों दिशा में उषा की लाली स्मित ज्योति से उद्भासित हो रही थी। मैं उठ
खड़ा हुआ। समझा कि वक़्त आ गया है, सूर्योदय अब होने ही वाला है। देखा
कि हेमचन्द्र भी उठ बैठे हैं। मैंने औरों को भी जगाना चाहा, लेकिन हेमचन्द्र ने
कहा, अभी थोड़ा और देख लें कि सूर्योदय में कितनी देर है। हम दोनों डेक के
किनारे आकर खड़े हो गए। रेलिंग को पकड़कर क्षितिज की ओर टकटकी
लगाये ताकते रहे। नीचे समुद्र का पानी उच्छलित हो रहा था। हम लोगों में से
किसी के पास घड़ी तो थी ही नहीं। पता नहीं चल रहा था कि वक़्त कितना
हुआ। खड़े-खड़े हम लोग थक गए, लेकिन उषा के प्रकाश में कुछ अन्तर नहीं
हुआ। अब भी हमारे साथियों में से कोई जगा न था। मैं और हेमचन्द्र जहाज़
में इधर-उधर घूमने लगे ताकि किसी सूरत से पता चले कि वक़्त क्या है। शायद
स्टुअर्ड के पास से पता चला कि अभी तो तीन ही बजा है। दिल में आया अभी
थोड़ा और लेटे रहें, लेकिन हेमचन्द्र ने मुझे रोक लिया और दोनों डेक चेयर में
या शायद किसी और चीज़ पर बैठ गए। तीन बजे से क़रीब साढ़े पाँच बजे
तक यों ही बैठे रहे। आश्चर्य की बात तो यह थी कि समुद्र में उषा की स्थिति
तीन-तीन घण्टे तक क़रीब-क़रीब एक-सी रही। साढ़े चार या पाँच बजे से
मेरे दूसरे साथी भी पास आ गए। चारों दिशाओं में तो उजाला छा गया, लेकिन
जिस केन्द्र से चारों दिशा में यह ज्योति विकीर्ण हो रही थी उसका अभी भी कोई
पता न था। हम सब अस्थिर हो गए। केवल हर घड़ी यही सोचते रहे जाने
समुद्र में सूर्योदय कैसा होता है। यह इन्तज़ारी अब बुरी लगने लगी। लेकिन
जिस दृश्य को देखने के लिए घण्टो से बैठे है अब उस दृश्य को बिना देखे
जायें कैसे ? एकाएक सबका मन चंचल हो उठा और हाथ फैलाकर सबों ने
इशारा किया कि वह सूर्योदय का प्रारम्भ हुआ। सबों ने देखा एक ज्योतिपुंज
समुद्र से धीरे-धीरे उग रहा है। चारों दिशा में अथाह पानी और पानी। अनन्त
का आभास कुछ मिलने लगा। एक तरफ सूर्योदय हो रहा है दूसरी तरफ अनन्त
मानव मूर्त होकर दर्शनीय हो रहा है। मानो शान्त और अनन्त का मिलन हो
रहा हो। मस्तक के ऊपर अनन्त आकाश, नीचे अनन्त घटा के बीच एक हमारा
ही जहाज़ इच्छापूर्वक एक विशेष दिशा की तरफ असाध्य साधन करने की भाँति