बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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पिता हैं, भाई-बहनें हैं !"
दिन चढ़ता गया, श्यामल तटभूमि क्रमशः हमारे क़रीब आती गई। उस
श्यामलता के बीच मनुष्यों को काम करते देखकर हमने एक अनोखे आनन्द का
अनुभव किया। इन मनुष्यों को देखते ही मानो इनके परिवार-वर्ग को भी मैंने
देखा। उनके गृहस्थ-जीवन के सुख-दुःख को इनकी कर्म-प्रचेष्टा के साथ जड़ित
देखा। क्रमशः पुरुष के साथ नारी को भी चलते-फिरते देखा। छोटे-छोटे नद और
नदियाँ इस समुद्रगामी नदी में आकर सम्मिलित हुई हैं। इसके किनारे-किनारे
तटभूमि के प्रान्त में खेती दिखाई देने लगी। इन खेतों के बीच ग्राम बसे हुए थे।
अब भी नदी बहुत प्रसारित थी। तटभूमि घने वृक्षों से शोभायमान थी। नदी के
दोनों ओर हरियाली और बीच में पानी—यह दृश्य बड़ा मनोहर था। इस नद-
नदी-हरियाली परिवेष्टित ग्राम-जीवन को देखकर मन में अजीब प्रसन्नता होती
थी। कुछ दिनों से पारिवारिक जीवन से अलग होने के कारण मन में—अन्तःस्तल
में पारिवारिक जीवन के प्रति स्पृहा बनी हुई थी। इसके कारण, या सम्भव है
जन्मजन्मान्तर के संस्कार के कारण, पाँच साल के बाद जब मैंने स्त्री-पुरुष परि-
वेष्टित पुरुष को घर-गृहस्थी के काम में लगा हुआ देखा तो हृदय में एक उल्लास-
सा पैदा हुआ। सम्भव है, कौमार्य-जीवन व्यतीत करते-करते दाम्पत्य जीवन के
प्रेमास्वादन की अनिर्देश लिप्सा के कारण ही मैं चारों ओर की प्रकृति में इतना'
अनुभव कर रहा था।
दोपहर के बाद जब दिन ढलने को हुआ तो हमारा जहाज़ लोगों से भरपूर
तटभूमि से घिरी संकीर्ण नदी के भीतर से गुज़र रहा था। मैं और हेमचन्द्र पास-
पास खड़े थे। कारबार के सिलसिले से माल से लदी हुई बड़ी-बड़ी नौकाएँ इधर-
उधर आ-जा रही थी। अर्धनग्न मल्लाह इन नावों को खे रहे थे। कमर के नीचे
और घुटने के ऊपर तक ही वे कुछ कपड़े लपेटे हुए थे। सुबह से शाम तक कठिन
परिश्रम किया करते थे। इन्हें धूप और पानी की समान रूप से अवहेलना करनी
पड़ती थी।
इन अर्द्धनग्न मल्लाहों को देखकर हेमचन्द्र ने मुस्कराते हुए कहा कि देखो,
जेल में कैदियो को फिर भी कपड़ा तो पहनने को मिलता है, जेल के अन्दर धूप
और पानी में क़ैदियों से तो काम नही लिया जाता। काम करने की एक सीमा तो
है। लेकिन ये हमारे आज़ाद देशवासी अर्द्धनग्न अवस्था में किन कठिन परिश्रमों'
का सामना कर रहे है। बात तो सच थी, लेकिन मुझे वह पसन्द नहीं आई। मुझे
ऐसा लगा कि जेल के अधिकारीगणों के पक्ष में यह दलील दी जा रही है। अण्डमन
जेल के क्रूर एवं निर्लज्ज अधिकारीगणों के पक्ष में कोई बात सुन सकना मेरे लिए
सहज न था। मेरे दिल की बेचैनी ने मेरे चेहरे को अवश्य विकृत कर दिया होगा,
मानो मैंने अपने उस विकृत चेहरे को अपनी आँखों से देखा। मैंने उत्तर में हेमचन्द्र
से कहा कि अपनी स्वाधीन इच्छानुसार चाहे कितनी भी मुसीबत हम बर्दाश्त कर
लें, यह सब गवारा है, लेकिन जिस मुसीबत को झेलने के लिए मुझे मजबूर किया